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जंतर-मंतर प्रदर्शन में शामिल होने की मिली सजा? असिस्टेंट प्रोफेसर की नौकरी गई

यूपी बरेली जिले के असिटेंट प्रोफेसर दिल्ली के जंतर मंतर में छात्रों के आंदोलन में शामिल होने गए थे। वापस आने पर कॉलेज ने उनको नौकरी से निकाल दिया। पीड़ित ने डीएम से गुहार लगाई है।

dr mohit Bhardwaj

असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. मोहित भारद्वाज। Photo Credit Social Media

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लखनऊ। दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों के आंदोलन में शामिल होने के बाद उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के एक असिस्टेंट प्रोफेसर की सेवा समाप्त किए जाने का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। गन्ना उत्पादक (स्नातकोत्तर) महाविद्यालय, बहेड़ी के कॉमर्स विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. मोहित भारद्वाज ने आरोप लगाया है कि आंदोलन में शामिल होने की वजह से कॉलेज प्रबंधन ने उन्हें बिना नोटिस, बिना विभागीय जांच और बिना सक्षम प्राधिकारी की स्वीकृति के नौकरी से हटा दिया।

 

उन्होंने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच, सेवा बहाली और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग करते हुए जिलाधिकारी को प्रार्थना-पत्र सौंपा है।


जंतर-मंतर से लौटे तो थमा दिया गया निष्कासन पत्र

 

डॉ. मोहित भारद्वाज का आरोप है कि वह छात्रों के समर्थन में दिल्ली के जंतर-मंतर पर आयोजित आंदोलन में शामिल होने जा रहे थे। उन्होंने दावा किया कि उन्हें घर पर नजरबंद करने की कोशिश की गई, लेकिन वह छत के रास्ते निकलकर दिल्ली पहुंचे और प्रदर्शन में शामिल हुए। उनका कहना है कि अगले दिन बरेली लौटते ही कॉलेज प्रबंधन ने उन्हें सेवा समाप्ति का पत्र थमा दिया। जब उन्होंने कारण पूछा तो कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया।

 

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'बिना नोटिस और सुनवाई के हुई कार्रवाई'

 

डॉ. भारद्वाज ने आरोप लगाया कि उन्हें न तो कोई कारण बताओ नोटिस दिया गया, न विभागीय जांच कराई गई और न ही अपना पक्ष रखने का अवसर मिला। उन्होंने इसे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों और उत्तर प्रदेश उच्च शिक्षा विभाग की स्ववित्तपोषित महाविद्यालयों से संबंधित नियमों का खुला उल्लंघन बताया है।

 

नियुक्ति से लेकर चरित्र प्रमाणपत्र तक का दिया हवाला

 

डॉ. भारद्वाज के मुताबिक उनकी नियुक्ति 20 जून 2024 को महात्मा ज्योतिबा फुले रुहेलखंड विश्वविद्यालय की स्वीकृति के बाद हुई थी और उन्होंने 11 जुलाई 2024 को कार्यभार ग्रहण किया। उन्होंने बताया कि कॉलेज ने उन्हें 30 जून 2027 तक वैध पहचान पत्र जारी किया था। इतना ही नहीं, 20 मई 2026 को उत्कृष्ट कार्य और आचरण के लिए चरित्र प्रमाणपत्र भी दिया गया था। ऐसे में अचानक सेवा समाप्ति को उन्होंने दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई बताया है।

 

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डीएम से लगाई न्याय की गुहार

 

प्रोफेसर ने जिलाधिकारी से मामले की उच्चस्तरीय जांच कराने, जांच पूरी होने तक सेवा समाप्ति आदेश पर रोक लगाने, सेवा बहाल करने, बकाया वेतन और अन्य सेवा लाभ दिलाने की मांग की है। साथ ही नियमों का उल्लंघन करने वाले अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई और मुख्यमंत्री से हस्तक्षेप कर न्याय दिलाने की अपील भी की है।फिलहाल इस मामले में कॉलेज प्रबंधन की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।

 

ऐसे में अब प्रशासन की जांच और कॉलेज प्रबंधन के पक्ष पर सभी की नजरें टिकी हैं। यदि प्रोफेसर के आरोप सही पाए जाते हैं तो यह मामला प्रदेश में उच्च शिक्षा संस्थानों में कर्मचारियों के अधिकारों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं पर भी बड़ा सवाल खड़ा कर सकता है।


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