भारतीय जनता पार्टी ने आगामी पंजाब विधानसभा चुनाव के लिए प्रचार अभियान और संगठन का काम शुरू कर दिया है। पार्टी ने अपनी रणनीति बना ली है और केंद्रीय नेताओं के राज्य में दौरे भी शुरू हो गए हैं। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने हाल ही में पंजाब का दौरा किया और चुनाव की रणनीति पर मंथन किया। इस दौरान पार्टी के नेताओं ने कई मुद्दों को उठाया और बताया जा रहा है कि बंदी सिखों की रिहाई भी इन मुद्दों में शामिल था। भारतीय जनता पार्टी के लिए यह एक अहम मुद्दा है और पंजाब की राजनीति के सबसे संवेदनशील मुद्दों में से एक।
बंदी सिखों के मुद्दे का पंजाब में राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव काफी अहम है। यही कारण है कि भारतीय जनता पार्टी के भीतर बंदी सिखों की रिहाई का मुद्दा प्रमुखता से उभर रहा है। इस पर पार्टी लाइन तय करने के लिए राज्य के नेता पार्टी हाईकमान से दिशा-निर्देश चाहते हैं। पंजाब की राजनीति में लंबे समय से यह मुद्दा काफी अहम बना हुआ है।
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कौन हैं बंदी सिख?
'बंदी सिंख' उन सिख कैदियों को कहा जाता है जिन्हें पंजाब में उग्रवाद में शामिल होने के लिए दोषी ठहराया गया था। आज भी कई बंदी सिख देश की अलग-अलग जेलों में बंद हैं। 1990 के दशक की शुरुआत में ही पंजाब में आतंकवाद पर काबू पा लिया गया था और अब 30 साल से भी ज्यादा समय हो चुका है। ऐसे में इन सिख कैदियों को छोड़े जाने की मांग की जा रही है। सिखों की रिहाई की मांग कर रहे लोगों और संगठनों का आरोप है कि कई कैदियों को सजा पूरी होने के बाद भी रिहा नहीं किया जा रहा है।
कैसे मिल सकती है रिहाई?
बंदी सिखों को 1980 और 1990 के दशक में पंजाब में चले उग्रवाद और अशांति के दौरान कई गंभीर आपराधिक मामलों में जेल भेजा गया था। इनमें से कई पर हत्या, पुलिस या सुरक्षा बलों पर हमले, बम धमाके, हथियारों की तस्करी, राज्य के खिलाफ युद्ध छेड़ने, साजिश रचने और आतंकवाद से जैसे गंभीर आरोप लगे थे, जिनके तहत TADA, UAPA, IPC और अन्य कड़े कानूनों में मुकदमे चले। कई सिख कैदी ऐसे हैं जो 1990 के दशक से अब तक जेल में बंद हैं। सिखों की रिहाई की मांग कर रहे लोगों का तर्क है कि कई ऐसे भी हैं जिनकी सजा की न्यूनतम अवधि पूरी हो चुकी है लेकिन रिमिशन (Remission) यानी सजा में छूट, राज्य-केंद्र के बीच असहमति या प्रशासनिक देरी के कारण वे अब तक जेल में हैं।
क्यों नहीं हो रही रिहाई?
बंदी सिखों को रिहा करने से पहले यह समझना होगा कि यह किन मामलों में जेल में बंद हैं। इन कैदियों पर हत्या, देश के खिलाफ साजिश और आतंकवाद के आरोप हैं। TADA, UAPA, IPC और अन्य कड़े कानूनों में मुकदमों में कई को दोषी माना गया है। तीन दशक से ज्यादा समय से जेल में बंद बंदी सिखों की रिहाई इसलिए नहीं हो पा रही है क्योंकि इसके रास्ते में कानूनी प्रक्रिया, सरकारी मंजूरियां हैं।
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, कई बंदी सिख अपनी न्यूनतम सजा पूरी कर चुके हैं लेकिन उनकी रिहाई के लिए सजा में छूट पर फैसला केंद्र और संबंधित राज्य सरकारों को मिलकर करना होता है और यही प्रक्रिया सबसे ज्यादा अटकी हुई है। कुछ मामलों में फाइलें लंबे समय से राज्य गृह विभाग, केंद्र सरकार या राष्ट्रपति के पास लंबित हैं, जबकि कुछ कैदियों पर पुराने या जुड़े हुए मामलों का हवाला देकर निर्णय टाल दिया जाता है।
कट्टरपंथ को बढ़ावा मिलने का खतरा
पंजाब की राजनीति में धार्मिक कट्टरपंथ भी एक बड़ा मुद्दा है। बंदी सिखों की रिहाई से धार्मिक कट्टरपंथ फिर से बढ़ना शुरू हो सकता है। यह मुद्दा राजनीतिक रूप से संवेदनशील माना जाता है, इसलिए सरकारें कानून-व्यवस्था और सुरक्षा का तर्क देकर कोई तेज फैसला लेने से बचती रही हैं। केंद्र सरकार को राज्य की कानून व्यवस्था खराब होने और शांति भंग होने का डर भी रहता है। यही कारण है कि बंदी सिखों की रिहाई की गुंजाइश के बावजूद उनकी रिहाई पर अब तक ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं।
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क्या बीजेपी करेगी रिहा?
बंदी सिखों की रिहाई का मामला पंजाब में एक बड़ा मसला है, जिसे लगातार अन्य राजनीतिक पार्टियां खासकर कांग्रेस और शिरोमणि अकाली दल प्रमुखता से संसद तक उठाते रहे हैं। पश्चिम बंगाल में जीत के बाद भारतीय जनता पार्टी अब पंजाब में सरकार बनाने की कोशिश कर रही है। ऐसे में इन मुद्दों पर पार्टी का स्टैंड लेना अब जरूरी माना जा रहा है, खासकर तब जब तमाम राजनीतिक दल इनकी रिहाई के पक्ष में हैं। कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि कानूनी प्रावधानों के तहत भारतीय जनता पार्टी कुछ बंदी सिखों को रिहाई दे सकती है। शिरोमणि अकाली दल ने भी बीजेपी के साथ गठबंधन के लिए इसे एक मुख्य शर्ते के रूप में सामने रखा था।