BJP-कांग्रेस, AAP, सब रिहाई चाह रहे फिर जेल में क्यों बंद हैं बंदी सिख?
पंजाब की राजनीति में बंदी सिखों की रिहाई एक संवेदनशील मुद्दा बन चुका है। लगभग सभी राजनीतिक दल बंदी सिखों की रिहाई का समर्थन कर चुके हैं लेकिन फिर भी इन्हें रिहाई नहीं मिल रही।

सांकेतिक तस्वीर, Photo Credit: Sora
पंजाब में की रजानिति में एक मुद्दा ऐसा है जिसे हर राजनीतिक पार्टी हल करना चाहती है लेकिन हल नहीं कर पा रही है। लंबे समय से बंदी सिंखों की रिहाई के लिए पंजाब की सड़कों पर विरोध प्रदर्शन से लेकर विधानसभा से संसद तक बंदी सिंहों की रिहाई के लिए आवाज उठती रही है। पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार तो केंद्र सरकार पर इन सिख कैदियों को जानबूझकर जेल में बंद रखने का आरोप लगा रही है। पंजाब के सभी राजनीतिक दल बंदी सिखों की रिहाई की मांग कर रहे हैं लेकिन फिर भी क्या कारण हैं जो उनकी रिहाई को रोक रहे हैं।
'बंदी सिंख' उन सिख कैदियों को कहा जाता है जिन्हें पंजाब में उग्रवाद में शामिल होने के लिए दोषी ठहराया गया था। आज भी कई बंदी सिख देश की अलग-अलग जेलों में बंद हैं। 1990 के दशक की शुरुआत में ही पंजाब में आतंकवाद पर काबू पा लिया गया था और अब 30 साल से भी ज्यादा समय हो चुका है। ऐसे में इन सिख कैदियों को छोड़े जाने की मांग की जा रही है। सिखों की रिहाई की मांग कर रहे लोगों और संगठनों का आरोप है कि कई कैदियों को सजा पूरी होने के बाद भी रिहा नहीं किया जा रहा है।
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जेल में क्यों बंद हैं?
बंदी सिखों को 1980 और 1990 के दशक में पंजाब में चले उग्रवाद और अशांति के दौरान कई गंभीर आपराधिक मामलों में जेल भेजा गया था। इनमें से कई पर हत्या, पुलिस या सुरक्षा बलों पर हमले, बम धमाके, हथियारों की तस्करी, राज्य के खिलाफ युद्ध छेड़ने, साजिश रचने और आतंकवाद से जैसे गंभीर आरोप लगे थे, जिनके तहत TADA, UAPA, IPC और अन्य कड़े कानूनों में मुकदमे चले। कुछ मामलों में अदालतों ने उन्हें आजीवन कारावास या लंबी सजा सुनाई। कई सिख कैदी ऐसे हैं जो 1990 के दशक से अब तक जेल में बंद हैं।
सिखों की रिहाई की मांग कर रहे लोगों का तर्क है कि कई ऐसे भी हैं जिनकी सजा की न्यूनतम अवधि पूरी हो चुकी है लेकिन रिमिशन (Remission) यानी सजा में छूट, राज्य-केंद्र के बीच असहमति या प्रशासनिक देरी के कारण वे अब तक जेल में हैं।
राजनीतिक दलों का स्टैंड
पंजाब की राजनीति में बंदी सिखों की रिहाई का मुद्दा बेहद संवेदनशील मुद्दा है। इस मुद्दे से बहुसंख्यक सिख समुदाय की भावनाएं जुड़ी हुई हैं। पंजाब में कोई भी राजनीतिक दल सिख कैदियों की रिहाई का विरोध नहीं कर रहा। शिरोमणि अकाली दल के नेता तो खुले तौर पर बंदी सिखों की रिहाई के लिए किए गए प्रदर्शनों में शामिल होते रहे हैं। हाल ही में पार्टी की एकमात्र सांसद हरसिमरत कौर बादल ने कहा था कि अगर बीजेपी, अकाली दल से गठबंधन करना चाहती है तो उन्हें बंदी सिखों को रिहा करना होगा।
भारतीय जनता पार्टी के स्थानीय नेता भी खुलकर बंदी सिखों की रिहाई की मांग करते रहे हैं। हालांकि, पार्टी का आधिकारिक स्टैंड है कि बंदी सिखों की रिहाई किसी राजनैतिक फैसले से नहीं बल्कि संवैधानिक प्रक्रिया और कोर्ट के नियमों के तहत होनी चाहिए। पंजाब बीजेपी के कार्यकारी अध्यक्ष अश्वनी शर्मा ने स्पष्ट कहा है कि इस मुद्दे को संविधान के प्रावधानों और कोर्ट के निर्णयों के अनुसार ही हल किया जाएगा।
2019 में बीजेपी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने बंदी सिखों की रिहाई को लेकर एक नोटिफिकेशन जारी किया था। यह नोटिफिकेशन गुरु नानक देव जी के 550वें प्रकाश पर्व पर जारी किया गया था। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, इस नोटिफिकेशन में आठ बंदी सिखों को रिहा करने और बलवंत सिंह राजोआना की मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदलने का प्रस्ताव था। हालांकि, इस नोटिफिकेशन को पूरी तरह से लागू नहीं किया गया। बलवंत सिंह राजोआना की मौत की सजा को आजीवन कारावास की सजा में बदलने की प्रक्रिया अभी सुप्रीम कोर्ट में मंजूरी के लिए पेंडिंग है।
पंजाब बीजेपी के सीनियर नेता रवनीत बिट्टू के दादा और पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या के मामले में बलवंत सिंह राजोआना को सजा हुई है। उनके अलावा छह अन्य लोगों को बेअंत सिंह की हत्या के आरोप में सजा हुई है। हालांकि, रवनीत सिंह बिट्टू ने 2025 बंदी सिखों की रिहाई का विरोध ना करने की बात कही थी। बीजेपी के कई अन्य नेता भी बंदी सिखों की रिहाई की मांग कर चुके हैं। इससे पहले केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत पंजाब आकर बंदी सिखों की रिहाई के लिए सिग्नेचर कैंपेन में सिग्नेचर कर चुके हैं।
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कांग्रेस अकाली दल का दोहरा चेहरा
शिरोमणि अकाली दल पंजाब और केंद्र में बीजेपी के साथ सरकार में रहा है। उस समय अकाली दल ने मुखर होकर बंदी सिखों की रिहाई की मांग नहीं की थी लेकिन 2020 में बीजेपी से अलग होने के बाद से अकाली दल मुखर होकर बंदी सिखों को रिहा करने की मांग कर रहे हैं। अकाली दल के नेता बंदी सिखों की रिहाई के लिए आयोजित किए गए विरोध प्रदर्शनों में भी शामिल हुए।
2014 से पहले केंद्र और सालों तक पंजाब में सरकार चलाने वाली कांग्रेस के कई नेता भी बंदी सिखों की रिहाई की मांग करते हैं। कांग्रेस बीजेपी पर बंदी सिखों की रिहाई के लिए दबाव बनाती है लेकिन कांग्रेस पर सवाल उठते हैं कि उन्होंने अपने कार्यकाल में बंदी सिखों को क्यों रिहा नहीं किया।
कांग्रेस और अकाली दल ही नहीं आम आदमी पार्टी भी बंदी सिखों की रिहाई की मांग कर रही है। हालांकि, पंजाब सरकार ने इस दिशा में कोई ठोस कदम अब तक नहीं उठाया है। पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान का कहना कि बंदी सिखों की रिहाई का अहम फैसला केंद्र सरकार को करना है।
क्यों नहीं हो रही रिहाई?
बंदी सिखों की रिहाई की मांग तो हर पार्टी के नेता कर रहे हैं। कुछ मुखर होकर मांग कर रहे हैं तो कुछ कानूनी प्रक्रिया के तहत रिहाई करने की मांग कर रहे हैं लेकिन अभी तक सभी बंदी कैदियों को रिहा नहीं किया गया है। इसके पीछे कई कारण हैं। बंदी सिखों को रिहा करने से पहले यह समझना होगा कि यह किन मामलों में जेल में बंद हैं। इन कैदियों पर हत्या, देश के खिलाफ साजिश और आतंकवाद के आरोप हैं। TADA, UAPA, IPC और अन्य कड़े कानूनों में मुकदमों में कई को दोषी माना गया है। तीन दशक से ज्यादा समय से जेल में बंद बंदी सिखों की रिहाई इसलिए नहीं हो पा रही है क्योंकि इसके रास्ते में कानूनी प्रक्रिया, सरकारी मंजूरियां हैं।
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, कई बंदी सिख अपनी न्यूनतम सजा पूरी कर चुके हैं लेकिन उनकी रिहाई के लिए सजा में छूट पर फैसला केंद्र और संबंधित राज्य सरकारों को मिलकर करना होता है और यही प्रक्रिया सबसे ज्यादा अटकी हुई है। कुछ मामलों में फाइलें लंबे समय से राज्य गृह विभाग, केंद्र सरकार या राष्ट्रपति के पास लंबित हैं, जबकि कुछ कैदियों पर पुराने या जुड़े हुए मामलों का हवाला देकर निर्णय टाल दिया जाता है।
इसके अलावा, यह मुद्दा राजनीतिक रूप से संवेदनशील माना जाता है, इसलिए सरकारें कानून-व्यवस्था और सुरक्षा का तर्क देकर कोई तेज फैसला लेने से बचती रही हैं। केंद्र सरकार को राज्य की कानून व्यवस्था खराब होने और शांति भंग होने का डर भी रहता है। यही कारण है कि बंदी सिखों की रिहाई की गुंजाइश के बावजूद उनकी रिहाई पर अब तक ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं।
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