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सम्राट कैबिनेट में बड़े चेहरे कैसे हो गए आउट? आखिरी वक्त में पलटा खेल

सम्राट चौधरी की कैबिनेट में जातीय संतुलन, क्षेत्रीय समीकरण और सहयोगी दलों की संतुष्टि को प्राथमिकता दी गई है।

Samrat chaudhary cabinet

सम्राट चौधरी के साथ मंगल पांडे।

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संजय सिंह, पटना। सम्राट चौधरी के मंत्रिमंडल विस्तार ने जहां कई नए चेहरों को सत्ता के गलियारे तक पहुंचाया, वहीं कुछ ऐसे नाम भी रहे जिनकी चर्चा शपथ ग्रहण से पहले सबसे ज्यादा थी, लेकिन ऐन मौके पर उनकी उम्मीदों पर विराम लग गया। राजधानी पटना के गांधी मैदान में हुए भव्य समारोह में 32 मंत्रियों ने शपथ ली, मगर राजनीतिक गलियारों में चर्चा उन नेताओं की ज्यादा रही जो ‘रेस’ में आगे होकर भी मंत्री नहीं बन सके।

 

एनडीए ने इस विस्तार में जातीय संतुलन, क्षेत्रीय समीकरण और सहयोगी दलों की संतुष्टि को प्राथमिकता दी। यही वजह रही कि कई पुराने और अनुभवी नेताओं को भी जगह नहीं मिली, जबकि कुछ नए चेहरों को संगठन और भविष्य की राजनीति को ध्यान में रखते हुए मौका दे दिया गया।

 

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मैथिली ठाकुर और मंगल पांडेय की चर्चा

बीजेपी खेमे में सबसे अधिक हैरानी मंगल पांडेय को लेकर हुई। पूर्व स्वास्थ्य मंत्री रहे मंगल पांडेय का नाम मंत्रिमंडल विस्तार से पहले लगभग तय माना जा रहा था। संगठन और सरकार दोनों में लंबे अनुभव के बावजूद उनका नाम अंतिम सूची से गायब रहा। राजनीतिक जानकार इसे पार्टी की नई सामाजिक रणनीति और पीढ़ीगत बदलाव से जोड़कर देख रहे हैं। इसी तरह दरभंगा की अलीनगर सीट से विधायक बनीं मैथिली ठाकुर को लेकर भी महिला प्रतिनिधित्व के आधार पर काफी चर्चा थी। माना जा रहा था कि बीजेपी युवा महिला चेहरों को आगे बढ़ाने के संदेश के तहत उन्हें मौका दे सकती है, लेकिन फिलहाल उन्हें इंतजार करना पड़ेगा।

 

पूर्व मंत्री नीरज सिंह बबलू भी इस बार कैबिनेट में जगह नहीं बना सके। राजपूत समाज से पहले ही कई नेताओं को प्रतिनिधित्व मिलने के कारण उनका दावा कमजोर पड़ गया। वहीं पूर्व मंत्री जीवेश मिश्रा ने भी मंत्री बनने के लिए लगातार सक्रियता दिखाई, लेकिन अंतिम क्षणों में उनकी राजनीतिक दौड़ काम नहीं आई।

जेडीयू के युवा चेहरे भी रह गए पीछे

जेडीयू में इस बार युवा चेहरों को मौका मिलने की अटकलें तेज थीं। खासकर चेतन आनंद का नाम सबसे ज्यादा चर्चा में रहा। बाहुबली नेता आनंद मोहन के बेटे चेतन आनंद को लेकर माना जा रहा था कि पार्टी उन्हें नई पीढ़ी के चेहरे के रूप में आगे बढ़ा सकती है। लेकिन अंततः उन्हें कैबिनेट में स्थान नहीं मिला। गायघाट विधायक कोमल सिंह, इस्लामपुर विधायक रोहेल रंजन और पूर्व विधानसभा अध्यक्ष सदानंद सिंह के बेटे शुभेंदु मुकेश भी मंत्री बनने से चूक गए। इन नेताओं को लेकर पार्टी के अंदर सकारात्मक संकेत जरूर थे, लेकिन सीटों की सीमित संख्या और सामाजिक समीकरणों ने उनके रास्ते रोक दिए।

 

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नए चेहरों पर दांव, अनुभव पर भी भरोसा

जेडीयू ने इस बार नए और पुराने चेहरों के मिश्रण के जरिए संतुलन साधने की कोशिश की। पहली बार निशांत कुमार को मंत्री बनाया गया, जबकि डॉ. श्वेता गुप्ता और बुलो मंडल को भी मौका मिला। वहीं श्रवण कुमार, मदन सहनी, लेसी सिंह और अशोक चौधरी जैसे अनुभवी चेहरों पर नेतृत्व ने फिर भरोसा जताया। मंत्रिमंडल विस्तार के बाद साफ संकेत मिला है कि एनडीए अब 2029 की राजनीति को ध्यान में रखकर सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन साधने की रणनीति पर आगे बढ़ रहा है। ऐसे में जिन नेताओं को इस बार मौका नहीं मिला, उनकी उम्मीदें भविष्य के विस्तार या संगठन में बड़ी जिम्मेदारी पर टिकी रहेंगी।


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