हिमाचल प्रदेश में नए जिलों के गठन को लेकर सियासत तेज हो गई है। पूर्व मंत्री एवं जसवां-परागपुर के विधायक बिक्रम ठाकुर ने मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि दस चुनावी गारंटियों को पूरा करने में विफल रही कांग्रेस सरकार अब नए जिलों के गठन की चर्चा के जरिए जनता का ध्यान बुनियादी मुद्दों से भटकाने का प्रयास कर रही है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि सरकार वास्तव में नए जिले बनाने को लेकर गंभीर थी तो सत्ता में आने के चार साल बाद ही इस विषय की याद क्यों आई?
निकाय चुनाव में हार के बाद उठाया जिलों का मुद्दा
बिक्रम ठाकुर ने कहा कि स्थानीय निकाय एवं पंचायती राज चुनावों में कांग्रेस को मिली हार के बाद सरकार नए जिलों के गठन जैसे संवेदनशील विषय को चर्चा में ला रही है। उनके अनुसार अगले विधानसभा चुनाव से पहले इस तरह के मुद्दों को उठाना सरकार की राजनीतिक रणनीति का हिस्सा प्रतीत होता है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार बेरोजगारी, महंगाई, विकास कार्यों में देरी और चुनावी गारंटियों की स्थिति पर उठ रहे सवालों से बचना चाहती है।
उन्होंने कहा कि नए जिलों का गठन अपने आप में गलत नहीं है। जिन क्षेत्रों में भौगोलिक परिस्थितियों, जनसंख्या, दूरी और प्रशासनिक जरूरतों के आधार पर अलग जिले की मांग उठ रही है, वहां सरकार को गंभीरता से विचार करना चाहिए। लेकिन इसके लिए स्पष्ट नीति, ठोस आधार और समयबद्ध कार्ययोजना जरूरी है। केवल आयोग बनाने की चर्चा करना या संभावनाएं जताकर जनता में उम्मीदें जगाना पर्याप्त नहीं है।
चार साल में क्यों नहीं तैयार हुई कार्ययोजना?
बिक्रम ठाकुर ने कहा कि मुख्यमंत्री को स्पष्ट करना चाहिए कि प्रदेश में नए जिलों के गठन की आवश्यकता का आकलन करने के लिए पिछले चार वर्षों में सरकार ने क्या कदम उठाए। क्या विभिन्न क्षेत्रों से प्राप्त मांगों का व्यवस्थित अध्ययन किया गया? क्या प्रशासनिक सुविधाओं, भौगोलिक परिस्थितियों और वित्तीय संसाधनों को लेकर कोई रिपोर्ट तैयार की गई? यदि ऐसा कोई काम हुआ है तो सरकार को उसके निष्कर्ष जनता के सामने रखने चाहिए।
उन्होंने कहा कि यदि अब इस दिशा में प्रक्रिया शुरू करने की बात हो रही है तो सरकार को यह भी बताना चाहिए कि आयोग या समिति का गठन कब होगा, उसे अपनी रिपोर्ट देने के लिए कितना समय मिलेगा और उसकी सिफारिशों पर निर्णय लेने की समयसीमा क्या होगी। बिना स्पष्ट समयसीमा के घोषणाएं करना जनता को अनिश्चितता में रखने के समान है।
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दस गारंटियों पर जवाबदेही से नहीं बच सकती सरकार
भाजपा विधायक ने कहा कि कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव के दौरान प्रदेश की जनता से अनेक वादे किए थे। महिलाओं को आर्थिक सहायता देने, युवाओं को रोजगार उपलब्ध करवाने और अन्य गारंटियों को पूरा करने के सवाल आज भी राजनीतिक बहस के केंद्र में हैं। ऐसे में मुख्यमंत्री को नए वादों और घोषणाओं की चर्चा करने से पहले अपनी सरकार के अब तक के कार्यकाल का हिसाब देना चाहिए।
उन्होंने सवाल किया कि महिलाओं को आर्थिक सहायता देने की गारंटी कितनी पूरी हुई, युवाओं को रोजगार देने के वादे पर सरकार की वास्तविक उपलब्धि क्या है और चुनाव के दौरान किए गए अन्य वादों को पूरा करने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं? उन्होंने कहा कि नई घोषणाओं से पुराने वादों की जवाबदेही समाप्त नहीं हो जाती।
नए जिले बनाने हैं तो खर्च और संसाधनों का हिसाब भी दे सरकार
बिक्रम ठाकुर ने कहा कि हिमाचल प्रदेश पहले ही वित्तीय चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसे में नए जिलों के गठन पर चर्चा करते समय सरकार को प्रशासनिक ढांचे के विस्तार, अधिकारियों एवं कर्मचारियों की तैनाती, कार्यालयों, भवनों और अन्य सुविधाओं पर होने वाले संभावित खर्च का आकलन भी सार्वजनिक करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि नए जिले बनाने का निर्णय केवल राजनीतिक घोषणा के आधार पर नहीं लिया जा सकता। इसके लिए प्रशासनिक जरूरतों, जनता को मिलने वाली सुविधाओं और राज्य की आर्थिक स्थिति के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। सरकार को बताना चाहिए कि वह इस प्रक्रिया के लिए वित्तीय संसाधन कहां से जुटाएगी और इससे आम लोगों को क्या ठोस लाभ मिलेगा।
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बुनियादी समस्याओं पर भी जवाब दे सरकार
बिक्रम ठाकुर ने आरोप लगाया कि प्रदेश के कई क्षेत्रों में सड़कें, स्वास्थ्य सुविधाएं, शिक्षा व्यवस्था और विकास कार्यों की स्थिति चिंता का विषय है। युवाओं को रोजगार और आम लोगों को बेहतर सरकारी सेवाओं की जरूरत है। उन्होंने कहा कि सरकार को इन समस्याओं के समाधान के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए, न कि नए राजनीतिक मुद्दों के जरिए जनता का ध्यान दूसरी ओर मोड़ना चाहिए। उन्होंने कहा कि नए जिलों की मांग करने वाले क्षेत्रों के लोगों की भावनाओं को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। यदि सरकार वास्तव में इस मांग को पूरा करने की इच्छुक है तो उसे स्पष्ट मानदंड तय करके प्रक्रिया आगे बढ़ानी चाहिए। अन्यथा चुनाव के नजदीक इस विषय पर चर्चा शुरू करने से लोगों की उम्मीदें बढ़ेंगी और बाद में निराशा हाथ लग सकती है।