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गुरुद्वारे के प्रबंधन पर कानून ला रही थी महाराष्ट्र सरकार, क्यों लिया यू टर्न?

महाराष्ट्र सरकार ने तख्त श्री हजूर साहिब (नांदेड़) के प्रबंधन बोर्ड को लेकर महाराष्ट्र सरकार ने प्रस्तावित कानून को विधानसभा में पेश ना करने का फैसला कर लिया है। सिख समुदाय के लोगों ने इसका विरोध किया था।

SRI HAZUR SAHIB

हजूर साहिब, Photo Credit:

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तख्त श्री हजूर साहिब (नांदेड़) के प्रबंधन बोर्ड को लेकर महाराष्ट्र सरकार की ओर से लाए गए कानून पर सिख समुदाय के भारी विरोध किया। इसके बाद अब महाराष्ट्र सरकार ने 'नांदेड़ सिख गुरुद्वारा सचखंड श्री हजूर अचलनगर साहिब एक्ट, 1956' में बदलाव करने वाले प्रस्तावित कानून को फिलहाल पूरी तरह टाल दिया है। इसे सिख समुदाय की जीत माना जा रहा है। इसी तरह पंजाब में भी बेअदबी को लेकर लाए गए कानून का श्री अकाल तख्त साहिब ने विरोध किया था, जिसके बाद अब पंजाब सरकार भी बैकफुट पर नजर आ रही है। श्री हजूर साहिब सिख धर्म के पांच तख्तों में से एक है और इसका प्रबंधन सिख समुदाय ही करता है। 

महाराष्ट्र सरकार ने तख्त श्री हजूर साहिब, नांदेड़ के हर तरह के विकास और समय के हिसाब से प्रशासनिक सुधारों के नाम पर गुरुद्वारा बोर्ड के सदस्यों की संख्या बढ़ाने और कुछ नए नियम लागू करने का प्रस्ताव तैयार किया था। इस फैसले को लेने से पहले सिख समुदाय से बातचीत नहीं की गई। इसके साथ ही सिख समुदाय का कहना था कि सरकार गुरुद्वारे पर ज्यादा कंट्रोल करने की कोशिश कर रही है।

 

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सरकार के दखल का विरोध

इस गुरुद्वारे का प्रबंधन सिख समाज खुद करता है और इसके लिए एक बोर्ड का गठन किया गया है। प्रस्तावित संसोधन को लेकर सिख समुदाय में चिंता थी कि इस संसोधन के जरिए गुरुद्वारा बोर्ड के प्रबंधन में सरकारी दखल बढ़ सकता है और बोर्ड सरकार पर निर्भर हो सकता है।

 

विवाद का एक बड़ा कारण यह भी है कि इस कानून में शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC), चीफ खालसा दीवान और सिख सांसदों जैसे पारंपरिक और धार्मिक प्रतिनिधियों की भूमिका बोर्ड में बेहद सीमित करने का प्रावधान था। सिख समुदाय का कहना है कि धार्मिक स्थलों का प्रबंधन पूरी तरह से सिख संगत और उनकी चुनी हुई संस्थाओं के हाथ में होना चाहिए, न कि सरकार के नियंत्रण में। इसी को  लेकर विवाद जारी था।

विरोध के बाद पीछे हटी सरकार

इस प्रस्तावित बदलाव को लेकर दुनियाभर के सिख समुदाय में काफी विरोध देखने को मिला।  इससे पहले 2024 में भी महाराष्ट्र सरकार ने 1956 के अधिनियम में संशोधन की कोशिश की थी, जिसका चौतरफा विरोध हुआ था। अब जब सरकार ने फिस से वही कोशिश की तो मामला और भी गंभीर हो गया। सिख समुदाय से जुड़े तमाम संगठनों ने इसका विरोध किया। पंजाब के राजनीतिक दलों ने भी इसको लेकर चिंता जाहिर की और महाराष्ट्र के सीएम से बात की। सरकार पर दबाव बढ़ने के बाद यह फैसला वापस लिया गया। महाराष्ट्र सरकार के मंत्री ने जानकारी दी कि यह कानून अब विधानसभा में पेश नहीं किया जाएगा। 

 

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पंजाब बीजेपी भी असहज

पंजाब में सबसे ज्यादा सिख आबादी है और अगले कुछ ही महीनों में राज्य में आम चुनाव होने हैं। ऐसे में महाराष्ट्र सरकार का यह फैसला पंजाब में भारतीय जनता पार्टी के लिए काफी असहज स्थिति पैदा कर गया। पंजाब बीजेपी ने इस मामले में महाराष्ट्र के सीएम को लेटर भी लिखा। पंजाब बीजेपी के बड़े नेता और राज्यसभा सांसद तरुण चुघ ने बातचीत से आपसी सहमति की उम्मीद जताई। उन्होंने कहा, 'प्रस्तावित बिल को रोकने और पूरी चर्चा शुरू करने का महाराष्ट्र सरकार का फैसला लोकतांत्रिक परिपक्वता, संवेदनशीलता और सिख समुदाय के प्रति सम्मान दिखाता है। आपसी सहमति से एक हल निकलेगा जो पूरे सिख समुदाय की उम्मीदों को दिखाएगा और तख्त श्री हजूर साहिब की इज्जत, परंपराओं और शान को बनाए रखेगा।' 


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