उत्तर प्रदेश में वाहन फिटनेस व्यवस्था में बड़े फर्जीवाड़े का खुलासा हुआ है। बिजनौर स्थित एक ऑटोमेटेड टेस्टिंग स्टेशन (एटीएस) से 10,056 वाहनों को बिना टेस्टिंग सेंटर पहुंचे ही फिटनेस प्रमाणपत्र जारी कर दिए गए। मामला सामने आने के बाद परिवहन आयुक्त ने एटीएस का पंजीकरण निरस्त कर दिया है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि कथित फर्जी फिटनेस प्रमाणपत्र के सहारे हजारों वाहन अब भी सड़कों पर दौड़ रहे हैं, जिससे सड़क सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
जांच के अनुसार बिजनौर स्थित मेसर्स एफएस ट्रेडर्स द्वारा संचालित निजी एटीएस ने इसी वर्ष जनवरी से मार्च के बीच 10,056 वाहनों को बिना भौतिक परीक्षण के ही फिटनेस प्रमाणपत्र जारी कर दिए। पूरे मामले का खुलासा तब हुआ, जब लखनऊ के दो वाहनों की फिटनेस बिना सेंटर पहुंचे ही जारी होने की शिकायत मिली।
शिकायत के बाद बरेली परिक्षेत्र के उप परिवहन आयुक्त की अध्यक्षता में गठित जांच समिति ने 23 अप्रैल को अपनी रिपोर्ट में कई गंभीर अनियमितताओं की पुष्टि की। इसके बाद एटीएस संचालक महफूज अहमद को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया और जवाब संतोषजनक न मिलने पर परिवहन आयुक्त आशुतोष निरंजन ने एटीएस का पंजीकरण प्रमाणपत्र निरस्त कर दिया।
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सड़कों पर दौड़ रहे 'फर्जी फिटनेस' वाले वाहन
एटीएस का लाइसेंस रद्द होने के बावजूद उन 10 हजार से अधिक वाहनों पर अब तक व्यापक कार्रवाई नहीं हुई है, जिन्हें कथित रूप से बिना परीक्षण फिटनेस प्रमाणपत्र जारी किए गए थे। ऐसे वाहनों के सड़क पर चलने से दुर्घटना का खतरा बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
यूपी में पहले भी सामने आ चुके हैं ऐसे मामले
यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले झांसी के एटीएस में अनियमितताओं के आरोप में 10 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जा चुकी है, जबकि फिरोजाबाद का एटीएस भी बंद किया जा चुका है। प्रदेश में अब तक ऐसे तीन एटीएस पर कार्रवाई हो चुकी है। परिवहन विभाग के लिए यह लगातार चिंता का विषय बनता जा रहा है।
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27 जिलों में 34 एटीएस, निगरानी पर उठे सवाल
उत्तर प्रदेश के 27 जिलों में फिलहाल 34 ऑटोमेटेड टेस्टिंग स्टेशन संचालित हैं। अकेले लखनऊ में बीकेटी क्षेत्र में दो एटीएस काम कर रहे हैं। बिजनौर प्रकरण के बाद पूरे एटीएस नेटवर्क की निगरानी व्यवस्था और पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं। माना जा रहा है कि परिवहन विभाग अब अन्य केंद्रों का भी रिकॉर्ड खंगाल सकता है।
बिजनौर एटीएस का लाइसेंस रद्द कर कार्रवाई तो हो गई, लेकिन बिना जांच फिटनेस पाने वाले हजारों वाहनों की दोबारा जांच कब होगी? यदि ऐसे वाहन तकनीकी रूप से असुरक्षित पाए जाते हैं तो उनकी जिम्मेदारी किसकी होगी? यही सवाल अब परिवहन विभाग और सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़ा है।