उत्तर प्रदेश में स्कूली बच्चों की सुरक्षा को लेकर परिवहन विभाग इन दिनों 15 दिन का विशेष स्कूल वाहन जांच अभियान चला रहा है। स्कूल बसों, वैन और अन्य वाहनों की फिटनेस, परमिट और सुरक्षा मानकों की जांच की जा रही है। अब प्रदेश की वाहन फिटनेस व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। वजह यह है कि यूपी के 48 जिलों में अब तक ऑटोमेटेड व्हीकल फिटनेस सेंटर शुरू ही नहीं हो सके हैं।
ऐसे में जिन वाहनों की आधुनिक मशीनों से जांच होनी चाहिए, उनकी फिटनेस कई जगह कथित तौर पर केवल चार तस्वीरें अपलोड कर प्रमाणित की जा रही है।
मोटर वाहन नियमों के अनुसार बस, ट्रक, स्कूल वाहन, ऑटो और अन्य व्यावसायिक वाहनों की फिटनेस कंप्यूटरीकृत मशीनों से होनी चाहिए। इन मशीनों पर ब्रेक, स्टीयरिंग, सस्पेंशन, हेडलाइट, पॉल्यूशन, इंजन, व्हील अलाइनमेंट और अन्य सुरक्षा मानकों की तकनीकी जांच होती है। जांच के बाद ही वाहन को सड़क पर चलने योग्य घोषित किया जाता है।
कैसे बन रहे हैं सर्टिफिकेट?
जिन जिलों में ऑटोमेटेड फिटनेस सेंटर नहीं हैं, वहां कथित तौर पर वाहन की आगे, पीछे और दोनों तरफ से चार तस्वीरें लेकर उन्हें विभागीय पोर्टल पर अपलोड किया जाता है। इसके बाद कार्यालय में बैठे अधिकारी दस्तावेजों और तस्वीरों के आधार पर फिटनेस प्रमाणपत्र जारी कर देते हैं।
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क्या तस्वीरें बता सकती हैं ब्रेक और स्टीयरिंग की हालत?
परिवहन विशेषज्ञों का कहना है कि केवल फोटो देखकर यह तय नहीं किया जा सकता कि वाहन के ब्रेक सही हैं या नहीं, स्टीयरिंग सुरक्षित है या नहीं, सस्पेंशन ठीक है या वाहन सड़क पर चलने के लिए तकनीकी रूप से फिट है। यही वजह है कि इस व्यवस्था को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं।
दलालों का नेटवर्क सक्रिय, वसूली के आरोप
परिवहन विभाग की इस व्यवस्था को लेकर पहले भी कई शिकायतें सामने आ चुकी हैं। आरोप है कि कई जगह वाहन मालिकों को सीधे कार्यालय के बजाय दलालों के माध्यम से काम कराने के लिए मजबूर किया जाता है।
सूत्रों के मुताबिक छोटे वाहनों से लेकर बस और ट्रकों तक की फिटनेस के नाम पर 2 हजार रुपये से लेकर 10 हजार रुपये तक वसूले जाने के आरोप लगते रहे हैं। अगर ये आरोप सही हैं तो यह व्यवस्था की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। इन आरोपों पर विभाग की ओर से आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।
सरकार का फोकस सड़क सुरक्षा पर लेकिन व्यवस्था अधूरी
प्रदेश सरकार लगातार सड़क दुर्घटनाओं में कमी लाने और सुरक्षित परिवहन व्यवस्था को प्राथमिकता देने की बात करती रही है। स्कूल वाहनों की विशेष जांच मुहिम भी इसी दिशा में उठाया गया कदम है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक सभी जिलों में आधुनिक फिटनेस सेंटर शुरू नहीं होंगे, तब तक फिटनेस जांच की विश्वसनीयता पर सवाल बने रहेंगे।
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इन जिलों में शुरू हो चुके हैं फिटनेस सेंटर
परिवहन विभाग के अनुसार लखनऊ, कानपुर नगर, गाजियाबाद, गौतमबुद्ध नगर (नोएडा), मेरठ, आगरा, प्रयागराज, वाराणसी, गोरखपुर, बरेली, मुरादाबाद, झांसी, अलीगढ़, मथुरा, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, अयोध्या, आजमगढ़, गाजीपुर और रायबरेली सहित कुछ जिलों में ऑटोमेटेड फिटनेस सेंटर संचालित हैं।
48 जिलों में इंतजार, उठ रहे जवाबदेही के सवाल
प्रदेश के शेष 48 जिलों में अभी भी ऑटोमेटेड फिटनेस सेंटर शुरू नहीं हो सके हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जिन वाहनों की मशीनों से तकनीकी जांच अनिवार्य है, उनकी फिटनेस आखिर किस आधार पर प्रमाणित की जा रही है? सड़कों पर दौड़ रहे हजारों व्यावसायिक और स्कूली वाहनों की सुरक्षा को लेकर यह मुद्दा अब गंभीर बहस का विषय बनता जा रहा है। सरकार ने स्कूल वाहनों के खिलाफ अभियान जरूर शुरू किया है, लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब फिटनेस जांच की बुनियादी व्यवस्था ही पूरे प्रदेश में उपलब्ध नहीं है, तो सड़कों पर दौड़ रहे वाहनों की सुरक्षा की गारंटी कौन देगा?