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यूपी में अब ड्राइविंग टेस्ट फ्री नहीं, देना होगा यूजर चार्ज

UP में ड्राइविंग लाइसेंस के लिए टेस्ट देने वाले आवेदकों को सरकारी फीस के अलावा एडीटीसी का ट्रैक इस्तेमाल करने के लिए यूजर चार्ज देना होगा।

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प्रतीकात्मक फोटो। (Photo Credit: Chat GPT)

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उत्तर प्रदेश में ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने और दलालों के जरिए होने वाली वसूली पर अंकुश लगाने की दिशा में परिवहन विभाग ने एक नई व्यवस्था लागू करने की तैयारी की है। अब ड्राइविंग टेस्ट देने वाले आवेदकों को निर्धारित सरकारी फीस के अलावा ट्रैक इस्तेमाल करने के लिए यूजर चार्ज भी देना होगा।

 

प्रस्तावित दरों के मुताबिक दोपहिया वाहन चालकों से 50 रुपये, हल्के मोटर वाहनों से 100 रुपये और भारी वाहनों से 150 रुपये लिए जाएंगे। इस व्यवस्था का उद्देश्य ड्राइविंग टेस्ट की प्रक्रिया को व्यवस्थित करना, ट्रैक के संचालन से जुड़े खर्च की भरपाई करना और लाइसेंस बनवाने के नाम पर आवेदकों से मनमानी रकम वसूलने वाले बिचौलियों पर लगाम लगाना है।

प्रदेश में ड्राइविंग लाइसेंस के लिए ऑटोमेटेड ड्राइविंग टेस्टिंग सेंटर (एडीटीसी) संचालित किए जा रहे हैं। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, प्रदेश के 20 जिलों में 32 एडीटीसी केंद्र चल रहे हैं। इन केंद्रों पर ड्राइविंग टेस्ट के लिए विशेष ट्रैक बनाए गए हैं, जहां निर्धारित मानकों के अनुसार वाहन चलाकर आवेदकों की ड्राइविंग क्षमता का परीक्षण किया जाता है।


नई व्यवस्था लागू होने के बाद टेस्ट देने वाले आवेदकों को ट्रैक के इस्तेमाल के लिए निर्धारित यूजर चार्ज देना होगा। इस शुल्क की पूरी राशि संबंधित एडीटीसी संचालक के खाते में जाएगी। इससे ट्रैक के संचालन और रखरखाव की व्यवस्था को आर्थिक आधार मिलेगा। शासन स्तर पर इस व्यवस्था को लागू करने की तैयारी लगभग पूरी होने की जानकारी दी गई है।

सरकारी फीस और यूजर चार्ज अलग-अलग

ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने की प्रक्रिया में सरकारी फीस के अलावा अब ट्रैक इस्तेमाल करने का शुल्क भी देना पड़ सकता है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक लर्नर लाइसेंस की सरकारी फीस 350 रुपये और स्थायी ड्राइविंग लाइसेंस की फीस 1,000 रुपये बताई गई है। इस तरह इन दोनों मदों में कुल 1,350 रुपये का सरकारी शुल्क बनता है। इसके अतिरिक्त लाइसेंस बनवाने की प्रक्रिया में एजेंट या दलाल के माध्यम से जाने पर आवेदकों का कुल खर्च 4,000 से 6,000 रुपये तक पहुंचने की बात भी सामने आती रही है।

 

नई व्यवस्था में यूजर चार्ज की राशि वाहन की श्रेणी के अनुसार तय की गई है। दोपहिया वाहनों के लिए 50 रुपये, हल्के मोटर वाहनों के लिए 100 रुपये और भारी वाहनों के लिए 150 रुपये प्रस्तावित हैं। यह शुल्क सरकारी लाइसेंस फीस से अलग होगा। आवेदकों को भुगतान से पहले लागू दरों और अन्य सरकारी शुल्कों की पुष्टि संबंधित परिवहन कार्यालय या एडीटीसी केंद्र से कर लेनी चाहिए।

 

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टेस्ट में पास होने के लिए तय मानकों पर चलाना होगा वाहन

एडीटीसी में ड्राइविंग टेस्ट के दौरान आवेदकों की क्षमता का आकलन निर्धारित ट्रैक पर किया जाता है। इसमें वाहन को नियंत्रित तरीके से चलाना, निर्धारित रास्ते और मोड़ों पर वाहन संभालना तथा संबंधित श्रेणी के अनुसार जरूरी ड्राइविंग कौशल दिखाना शामिल है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, भारी और हल्के वाहनों के लिए अलग-अलग समय मानक तय हैं। भारी वाहनों के लिए पैरलल पार्किंग में 60 सेकंड और हल्के वाहनों के लिए 45 सेकंड निर्धारित हैं।

 

आठ के आकार का ट्रैक बनाने में भारी वाहनों को 75 सेकंड और हल्के वाहनों को 45 सेकंड मिलते हैं। ग्रेडिएंट यानी चढ़ान वाले टेस्ट में भारी वाहनों के लिए 60 सेकंड और हल्के वाहनों के लिए 45 सेकंड का समय निर्धारित है। रिवर्स एस यानी पीछे की ओर एस आकार में वाहन चलाने के टेस्ट में भारी वाहनों को 120 सेकंड और हल्के वाहनों को 50 सेकंड मिलते हैं। दोपहिया वाहन चालकों को ड्राइविंग टेस्ट के लिए 90 सेकंड का समय दिए जाने की जानकारी भी दी गई है। इन परीक्षणों का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि लाइसेंस पाने वाला व्यक्ति सड़क पर वाहन चलाने के लिए जरूरी कौशल रखता हो।

 

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दो बार फेल होने पर छह हजार रुपये की ट्रेनिंग

ड्राइविंग टेस्ट में असफल होने वाले आवेदकों के लिए भी नियम महत्वपूर्ण हैं। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, एडीटीसी में टेस्ट में असफल होने के सात दिन बाद दोबारा परीक्षा देने का अवसर मिलता है। दो बार फेल होने पर आवेदक को ड्राइविंग प्रशिक्षण लेना अनिवार्य होगा। प्रशिक्षण पूरा करने के बाद प्रमाणपत्र हासिल करने के लिए 6,000 रुपये का शुल्क निर्धारित होने की जानकारी दी गई है। इस व्यवस्था का उद्देश्य केवल लाइसेंस जारी करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि आवेदक वाहन चलाने के जरूरी नियमों और तकनीकों को समझे। बिना पर्याप्त कौशल के लाइसेंस हासिल करने से सड़क दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ सकता है। ऐसे में प्रशिक्षण की अनिवार्यता को सड़क सुरक्षा से जोड़कर देखा जा रहा है।

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