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सीड बिल 2025 क्या है जिसके कारण फिर से प्रदर्शन करने लगे किसान? बारीकी से समझिए

पंजाब के किसानों ने शुक्रवार को चंडीगढ़ कूच की कोशिश की लेकिन पुलिस ने उन्हें बोर्डर पर ही रोक दिया। किसान सरकार की ओर से प्रस्तावित सीड बिल 2025 का विरोध कर रहे हैं।

Farmer Protest

किसानों का प्रदर्शन, Photo Credit: AI

पंजाब में किसान आंदोलन एक बार फिर तेज होता दिखाई दे रहा है। 15 मई को चंडीगढ़ की सीमा पर किसानों और पुलिस के बीच टकराव देखने को मिला, जब संयुक्त किसान मोर्चा से जुड़े किसान संगठन अपनी मांगों को लेकर राजभवन की ओर मार्च कर रहे थे। किसानों को रोकने के लिए पुलिस ने बैरिकेडिंग, पानी की बौछार और आंसू गैस का इस्तेमाल किया। इस प्रदर्शन में एमएसपी की कानूनी गारंटी, बिजली संशोधन बिल और बीज कानून 2025 सबसे बड़ी मांगों में शामिल रहे। किसानों ने सरकार को अब 20 मई तक का समय दिया है और उसके बाद आंदोलन करने की चेतावनी दी है। 

 

किसान संगठनों का कहना है कि प्रस्तावित बीज कानून खेती और किसानों की पारंपरिक व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है और इससे खेती में कंपनियों का दखल बढ़ जाएगा। अब सवाल यह है कि आखिर बीज कानून 2025 है क्या और किसान इसका विरोध क्यों कर रहे हैं। बीज कानून 2025 केंद्र सरकार की तरफ से तैयार किया गया एक प्रस्तावित कानून है, जिसका उद्देश्य देश में बीजों की गुणवत्ता, बिक्री, उत्पादन और वितरण को नियंत्रित करना बताया जा रहा है। यह कानून पुराने 'सीड्स एक्ट 1966' की जगह लेने के लिए तैयार किया गया है। सरकार का कहना है कि पिछले कई दशकों में खेती और बीज बाजार में बड़े बदलाव हुए हैं, इसलिए नए नियमों की जरूरत महसूस हुई। इसी वजह से कृषि मंत्रालय ने ड्राफ्ट सीड्स बिल 2025 को सार्वजनिक सुझावों के लिए जारी किया। 

 

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बिल में सरकरा ने क्या दावा किया?

सरकार के अनुसार, इस बिल का मुख्य मकसद किसानों को नकली और खराब गुणवत्ता वाले बीजों से बचाना है। प्रस्तावित कानून में कहा गया है कि बाजार में बिकने वाले सभी बीजों का रजिस्ट्रेशन जरूरी होगा। बीज कंपनियों, बीज प्रोसेसिंग यूनिट, डीलर और नर्सरी को भी रजिस्ट्रेशन कराना होगा। इसके अलावा बीज पैकेट पर उसकी गुणवत्ता, अंकुरण क्षमता और प्रदर्शन से जुड़ी जानकारी देना जरूरी होगा ताकि किसान को सही जानकारी मिल सके। 

किसानों को क्या डर?

इस कानून में सरकार को कुछ विशेष परिस्थितियों में बीजों की कीमत कंट्रोल करने का अधिकार भी दिया गया है। साथ ही नकली या घटिया बीज बेचने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई और जुर्माने का प्रावधान रखा गया है लेकिन किसान संगठनों को इस कानून के कई हिस्सों पर गंभीर आपत्ति है। 

 

किसानों का सबसे बड़ा डर यह है कि इससे बीज बाजार पर प्राइवेट और बहुराष्ट्रीय कंपनियों का कंट्रोल बढ़ सकता है। किसान नेताओं का कहना है कि भारत में लाखों किसान सालों से अपने खेतों के बीज बचाकर रखते हैं, उन्हें अगली फसल में इस्तेमाल करते हैं और गांवों में एक दूसरे से बीजों का भी इस्तेमाल करते हैं। किसानों को आशंका है कि नए नियमों के कारण पारंपरिक बीज व्यवस्था कमजोर हो सकती है और धीरे धीरे किसान कंपनियों पर निर्भर हो जाएंगे। 

देसी बीजों को लेकर चिंताएं

किसान संगठनों का आरोप है कि बीजों के अनिवार्य रजिस्ट्रेशन और नियमन से छोटे किसानों और स्थानीय बीज विक्रेताओं पर दबाव बढ़ेगा। उनका कहना है कि देश में कई पारंपरिक और देसी बीज किस्में हैं जिन्हें गांव स्तर पर किसान ही बचाकर रखते आए हैं। यदि नियम बहुत सख्त हुए तो इन देसी बीजों का इस्तेमाल कम हो सकता है और कृषि जैव विविधता पर असर पड़ सकता है। 

 

किसानों की एक और चिंता यह है कि कंपनियों के बीज महंगे हो सकते हैं। किसान संगठनों का कहना है कि अगर धीरे धीरे किसान अपने पारंपरिक बीज छोड़कर बाजार आधारित बीजों पर निर्भर हो गए तो खेती की लागत बढ़ जाएगी। इससे छोटे किसानों पर आर्थिक दबाव बढ़ सकता है। किसान नेताओं का आरोप है कि कानून की संरचना ऐसी है जिससे कंपनियों की भूमिका मजबूत होती दिखाई देती है।

सरकार ने क्या बताया?

हालांकि, सरकार ने साफ कहा है कि यह कानून किसानों के अधिकार खत्म नहीं करता। सरकार का दावा है कि किसान पहले की तरह अपने खेत के बीज बचा सकेंगे, बो सकेंगे, अदला बदली कर सकेंगे और बेच भी सकेंगे। सरकार ने यह भी कहा है कि पारंपरिक और किसान आधारित बीज किस्मों को कानून से बाहर रखा गया है और किसानों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए प्लांट वैरायटी और फार्मर्स राइट्स एक्ट 2001 जैसे कानून पहले से मौजूद हैं। 

 

इसके बावजूद किसान संगठनों को भरोसा नहीं है। उनका कहना है कि कानून का ढांचा धीरे धीरे खेती को कॉरपोरेट मॉडल की तरफ ले जा सकता है। किसान नेताओं ने आरोप लगाया है कि इससे राज्यों की शक्तियां भी कमजोर हो सकती हैं और खेती से जुड़े फैसलों का नियंत्रण ज्यादा केंद्रीकृत हो जाएगा। यही कारण है कि पंजाब समेत कई राज्यों में किसान संगठन लगातार बीज कानून 2025 को वापस लेने की मांग कर रहे हैं। 

 

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पंजाब में हलचल

पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने भी हाल ही में केंद्र सरकार से मुलाकात के दौरान प्रस्तावित सेंट्रल सीड कमेटी में पंजाब को प्रतिनिधित्व देने और राज्य स्तरीय समितियों की शक्तियां बनाए रखने की मांग की थी। इससे यह साफ है कि राज्य सरकारों के स्तर पर भी इस कानून को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। फिलहाल बीज कानून 2025 अभी ड्राफ्ट और चर्चा के चरण में है। सरकार लगातार कह रही है कि किसानों और सभी पक्षों से सुझाव लिए जा रहे हैं। अगले साल की शुरुआत में पंजाब विधानसभा चुनाव है और कंद्र की सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी को इससे नुकसान हो सकता है। 

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