अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा में ढालपुर का नजारा केवल सजे-धजे रथों, देव धुनों और सैकड़ों देवी-देवताओं के आगमन तक सीमित नहीं है। यहां देव संस्कृति की ऐसी परंपराएं भी जीवंत हैं, जिनमें आस्था के साथ अनुशासन, समर्पण और सदियों पुरानी मान्यताओं की झलक मिलती है। उत्सव के सात दिनों के दौरान देवी-देवताओं की दिनचर्या से जुड़ी हर गतिविधि निर्धारित देव नियमों के अनुसार होती है। इसी परंपरा का एक अनूठा पहलू है देवी-देवताओं के स्नान के लिए प्राकृतिक जलस्रोतों से पवित्र जल लाना।
आधुनिक सुविधाओं के दौर में जहां पानी के लिए नल और अन्य साधन सहज उपलब्ध हैं, वहीं कुल्लू दशहरा में देवी-देवताओं के स्नान के लिए प्राकृतिक जलस्रोतों के पानी को प्राथमिकता देने की परंपरा निभाई जाती है। इसके लिए पुजारियों को सुबह होने से पहले या भोर होते ही जल की व्यवस्था में जुटना पड़ता है।
धोती पहनकर नंगे पांव निकलते हैं पुजारी
देवी-देवताओं के स्नान की प्रक्रिया केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि निर्धारित परंपराओं के निर्वहन का हिस्सा है। पुजारी धोती पहनकर नंगे पांव प्राकृतिक जलस्रोतों तक जाते हैं। वहां से पानी चांदी की विशेष झारी में भरकर देवता के अस्थायी शिविर तक लाया जाता है। जल लाने से लेकर देवता को स्नान करवाने तक पूरी प्रक्रिया संबंधित देवता की मान्यताओं और परंपराओं के अनुरूप संपन्न की जाती है। इस दौरान परंपरागत विधि और धार्मिक मर्यादाओं का विशेष ध्यान रखा जाता है। देवताओं की सेवा में जुटे पुजारियों के लिए सुबह का यह समय काफी महत्वपूर्ण होता है। एक ओर ढालपुर में उत्सव की गतिविधियां शुरू होने लगती हैं, वहीं दूसरी ओर देव शिविरों में पूजा-अर्चना और स्नान की तैयारियां चलती रहती हैं।
खराहल घाटी के इन जलस्रोतों से आता है पानी
देव परंपराओं के अनुसार, देवी-देवताओं के स्नान के लिए खराहल घाटी के प्राकृतिक जलस्रोतों से पानी लाया जाता है। जानकारी के मुताबिक, पुजारी देव डोभी स्थित हरगण बाई, लंकाबेकर और हनुमानी बाग के जलस्रोतों से पानी लेकर आते हैं। इन जलस्रोतों से पानी लाने के बाद उसे चांदी की झारी में भरकर देवता के शिविर तक पहुंचाया जाता है। इसके बाद निर्धारित धार्मिक विधि के अनुसार स्नान करवाया जाता है। यह पूरी व्यवस्था दर्शाती है कि कुल्लू दशहरा में देवी-देवताओं की उपस्थिति केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि उनसे जुड़ी दैनिक सेवा और परंपराओं के माध्यम से भी व्यक्त होती है।
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सात दिन तक देव नियमों में बंधी रहती है दिनचर्या
अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा के दौरान जिला कुल्लू के विभिन्न क्षेत्रों से देवी-देवता अपने देवलुओं, कारकूनों और अन्य श्रद्धालुओं के साथ ढालपुर पहुंचते हैं। यहां उनके लिए अस्थायी शिविर बनाए जाते हैं, जहां सात दिन तक धार्मिक गतिविधियां चलती हैं। देवताओं की पूजा-अर्चना, स्नान और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों का संचालन संबंधित देव परंपराओं के अनुसार होता है। अलग-अलग देवी-देवताओं की अपनी मान्यताएं और धार्मिक व्यवस्थाएं हो सकती हैं। ऐसे में उनकी सेवा से जुड़े लोगों को उन्हीं नियमों के अनुरूप कार्य करना पड़ता है। ढालपुर में अस्थायी शिविरों के बीच सुबह और शाम होने वाली धार्मिक गतिविधियां इस देव महाकुंभ को विशिष्ट पहचान देती हैं।
देव संस्कृति की पहचान हैं छोटी-छोटी परंपराएं
कुल्लू दशहरा की खासियत केवल सैकड़ों देवी-देवताओं का एक स्थान पर एकत्र होना नहीं है। इस आयोजन में देव समाज की जीवनशैली, लोक मान्यताओं और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं को करीब से देखने का अवसर मिलता है। पवित्र जल लाने की प्रक्रिया भी ऐसी ही परंपरा है, जिसमें पुजारी की भूमिका अहम रहती है। चांदी की झारी, नंगे पांव जल लाने की परंपरा और निर्धारित विधि से स्नान करवाना देव संस्कृति के उस स्वरूप को सामने लाता है, जिसमें धार्मिक आस्था के साथ परंपरागत अनुशासन जुड़ा हुआ है।
जिला देवी-देवता कारदार संघ के अध्यक्ष दोत राम ठाकुर के अनुसार, कुल्लू दशहरा में देवी-देवताओं से जुड़ी परंपराओं का विशेष महत्व है। प्राकृतिक जलस्रोतों से जल लाकर स्नान करवाने जैसी परंपराएं देव संस्कृति की विशिष्ट पहचान हैं। कुल्लू दशहरा की यह परंपरा बताती है कि देवभूमि की सांस्कृतिक विरासत केवल बड़े आयोजनों और भव्य शोभायात्राओं में नहीं, बल्कि सुबह-सुबह निभाई जाने वाली उन छोटी-छोटी जिम्मेदारियों में भी बसती है, जिन्हें देव समाज आज भी श्रद्धा और अनुशासन के साथ आगे बढ़ा रहा है।