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जो कर्पूरी ठाकुर ने किया था, 5 दशक बाद वही सम्राट चौधरी ने कर दिखाया

बिहार में बीजेपी के पहले मुख्यमंत्री बनने वाले सम्राट चौधरी ने कई मिथकों को तोड़ा है। करीब पांच दशक में डिप्टी सीएम से सीएम के पद तक पहुंचने वाले पहले नेता भी बने हैं।

Samrat Chaudhary

बिहार के सीएम सम्राट चौधरी। (Photo Credit: Khabargaon)

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संजय सिंह, पटना। बिहार की राजनीति में वर्षों से चली आ रही एक चर्चित धारणा अब टूटती नजर आ रही है। उपमुख्यमंत्री का पद अब तक सत्ता के शीर्ष तक पहुंचने की 'सीढ़ी' नहीं माना जाता था, लेकिन इस सियासी मिथक को तोड़ने का श्रेय अब सम्राट चौधरी को दिया जा रहा है। उनके राजनीतिक उभार ने न केवल एक परंपरा को चुनौती दी है, बल्कि राज्य की राजनीति में नई दिशा भी दिखाई है।

पांच दशक बाद सम्राट ने रचा इतिहास

दरअसल, बिहार के राजनीतिक इतिहास पर नजर डालें तो उपमुख्यमंत्री का पद लंबे समय तक एक सहयोगी भूमिका तक सीमित रहा। इस पद पर कई दिग्गज नेता आसीन हुए, लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी उनसे दूर ही रही। स्वतंत्रता के बाद के दौर में अनुग्रह नारायण सिन्हा करीब 11 वर्षों तक उपमुख्यमंत्री रहे, लेकिन उन्हें कभी मुख्यमंत्री बनने का अवसर नहीं मिला। इसके बाद भी कई बड़े नाम इस पद तक पहुंचे, लेकिन सीएम नहीं बन सके।

 

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जगदेव प्रसाद, राम जयपाल सिंह यादव, सुशील कुमार मोदी, तेजस्वी यादव, तार किशोर प्रसाद, रेणु देवी और विजय सिन्हा जैसे नेताओं ने उपमुख्यमंत्री की जिम्मेदारी संभाली। इन नेताओं का राजनीतिक कद और जनाधार मजबूत रहा, बावजूद इसके वे मुख्यमंत्री पद तक नहीं पहुंच पाए। इससे यह धारणा मजबूत होती गई कि उपमुख्यमंत्री का पद महज सहयोगी नेतृत्व तक ही सीमित है।

कर्पूरी ठाकुर ने तोड़ा था मिथक

इतिहास के पन्नों में झांकें तो आखिरी बार कर्पूरी ठाकुर ने इस मिथक को तोड़ा था। वे 1967 में उपमुख्यमंत्री बने और 1970 में पहली बार मुख्यमंत्री पद तक पहुंचे। इसके बाद करीब पांच दशकों तक यह सिलसिला थम गया और उपमुख्यमंत्री पद से मुख्यमंत्री बनने की परंपरा लगभग समाप्त सी हो गई।

सम्राट चौधरी ने रचा इतिहास

इसी पृष्ठभूमि में सम्राट चौधरी का उभार बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता के रूप में उन्होंने संगठन और सरकार दोनों स्तरों पर अपनी मजबूत पकड़ बनाई है। उनकी कार्यशैली, रणनीतिक सोच और जनता के बीच सक्रिय उपस्थिति ने उन्हें एक प्रभावशाली नेता के रूप में स्थापित किया है।

राजनीतिक समीकरण भी हो सकता है प्रभावित 

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सम्राट चौधरी का यह सफर केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह बिहार की बदलती राजनीतिक मानसिकता का संकेत भी है। अब उपमुख्यमंत्री पद को केवल सहयोगी भूमिका के रूप में नहीं, बल्कि नेतृत्व के एक मजबूत मंच के तौर पर देखा जाने लगा है। यह बदलाव आने वाले समय में राजनीतिक समीकरणों को भी प्रभावित कर सकता है।

 

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इसके साथ ही यह घटनाक्रम राजनीतिक दलों के भीतर नेतृत्व विकास की नई संभावनाओं को भी उजागर करता है। उपमुख्यमंत्री के पद पर रहते हुए प्रशासनिक अनुभव और जनसंपर्क कौशल का विस्तार होता है, जो भविष्य में शीर्ष नेतृत्व के लिए आधार तैयार कर सकता है। बिहार की राजनीति में यह बदलाव एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखा जा रहा है। 

 

अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सम्राट चौधरी के बाद यह सिलसिला आगे भी जारी रहता है या फिर यह एक अपवाद बनकर रह जाता है। फिलहाल इतना तय है कि उन्होंने एक मजबूत सियासी मिथक को तोड़कर नई बहस को जन्म दे दिया है, जो आने वाले वर्षों में राज्य की राजनीति की दिशा तय कर सकती है।


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