हिमाचल में 4 साल में 800 स्कूल बंद, 1.60 लाख छात्र भी घटे
हिमाचल में सरकारी स्कूलों से बच्चों का मोह भंग हो रहा है। स्कूलों में नामांकन में 19.2 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। क्या सरकारी शिक्षा व्यवस्था अभिभावकों का भरोसा जीत पाएगी?

प्रतीकात्मक तस्वीर। (AI-generated image)
हिमाचल प्रदेश में सरकारी स्कूलों का लगातार सिमटता विद्यार्थी आधार शिक्षा व्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। पहाड़ी प्रदेश में कभी गांव-गांव तक शिक्षा की पहुंच सुनिश्चित करने वाले सरकारी स्कूल अब घटते नामांकन से जूझ रहे हैं। स्थिति यह है कि पिछले पांच वर्षों में सरकारी स्कूलों में पहली से जमा दो कक्षा तक पढ़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या करीब 1.60 लाख कम हो गई है। इसका असर अब केवल दाखिलों के आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि स्कूलों के अस्तित्व, संसाधनों के इस्तेमाल और ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा की उपलब्धता पर भी पड़ रहा है।
दो साल में घटकर 6,71,542 रह गई संख्या
यू-डाइस के आंकड़ों के अनुसार, शैक्षणिक सत्र 2021-22 में हिमाचल के सरकारी स्कूलों में कुल 8,31,310 विद्यार्थी दर्ज थे। यह संख्या घटकर 6,71,542 रह गई। यानी पांच साल के भीतर 1,59,768 विद्यार्थी कम हो गए। नामांकन में यह गिरावट करीब 19.2 फीसदी है।
औसतन देखें तो हर साल सरकारी स्कूलों से लगभग 32 हजार विद्यार्थियों का नामांकन कम हुआ। यह आंकड़ा प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि हिमाचल जैसे भौगोलिक चुनौतियों वाले राज्य में सरकारी स्कूल केवल शिक्षा के केंद्र नहीं, बल्कि दूरदराज के गांवों में सामाजिक और आर्थिक पहुंच का माध्यम भी हैं।
स्कूलों में बच्चे कम, बंद होने और विलय की बढ़ी नौबत
विद्यार्थियों की घटती संख्या का सीधा असर स्कूलों के संचालन पर दिखाई देने लगा है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, बीते चार वर्षों में करीब 800 प्राथमिक और मिडल स्कूल बंद करने पड़े हैं। इसके अतिरिक्त, 10 से कम विद्यार्थियों वाले 826 स्कूलों का नजदीकी शिक्षण संस्थानों में विलय किया गया है।
स्कूलों के बंद होने या विलय के पीछे कम नामांकन और संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल का तर्क दिया जा रहा है। लेकिन पहाड़ी क्षेत्रों में किसी स्कूल का बंद होना केवल एक संस्थान का बंद होना नहीं है। इसका असर बच्चों की रोजाना की आवाजाही, अभिभावकों की चिंता और शिक्षा तक पहुंच पर भी पड़ सकता है।
मैदानी क्षेत्रों के मुकाबले हिमाचल के दुर्गम गांवों में स्कूल की दूरी अधिक मायने रखती है। ऐसे में स्कूलों के विलय के साथ यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि बच्चों को सुरक्षित और सुविधाजनक परिवहन उपलब्ध हो तथा उनकी पढ़ाई प्रभावित न हो।
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60 फीसदी प्राइमरी स्कूलों में 20 से कम बच्चे
सरकारी स्कूलों में नामांकन की स्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि शैक्षणिक सत्र 2026-27 के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश के करीब 60 फीसदी प्राथमिक स्कूलों में 20 से कम विद्यार्थी हैं। मिडल स्कूलों में भी लगभग 65 फीसदी संस्थानों में विद्यार्थियों की संख्या 20 से कम बताई गई है। यह स्थिति शिक्षा विभाग के सामने दोहरी चुनौती खड़ी करती है।
एक तरफ कम विद्यार्थियों वाले स्कूलों में शिक्षकों और अन्य संसाधनों का प्रभावी इस्तेमाल सुनिश्चित करना है, वहीं दूसरी तरफ उन क्षेत्रों में शिक्षा की उपलब्धता बनाए रखनी है, जहां सरकारी स्कूल ही बच्चों के लिए सबसे सुलभ विकल्प हैं। कम नामांकन वाले स्कूलों में बहु-कक्षा शिक्षण, शिक्षकों की तैनाती और बच्चों को गुणवत्तापूर्ण पढ़ाई उपलब्ध करवाने जैसे विषयों पर भी ध्यान देने की जरूरत है।
क्या बच्चे निजी स्कूलों की ओर जा रहे हैं?
सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों की कमी को केवल निजी स्कूलों की ओर बढ़ते रुझान से जोड़कर देखना पूरी तस्वीर नहीं होगी। शिक्षा विभाग के अनुसार घटती जन्म दर भी नामांकन में कमी का एक कारण है। हालांकि, अभिभावकों की बदलती अपेक्षाएं, अंग्रेजी माध्यम की पढ़ाई, आधुनिक शिक्षण सुविधाएं, प्रतिस्पर्धी शैक्षणिक वातावरण और स्कूलों में उपलब्ध बुनियादी सुविधाएं भी दाखिले के फैसले को प्रभावित कर सकती हैं। अभिभावक अब केवल नजदीकी स्कूल नहीं, बल्कि बच्चों के लिए बेहतर शैक्षणिक अवसर भी तलाश रहे हैं। ऐसे में सरकारी स्कूलों के सामने चुनौती केवल बच्चों के दाखिले बढ़ाने की नहीं, बल्कि पढ़ाई की गुणवत्ता और अभिभावकों के विश्वास को मजबूत करने की भी है।
सीबीएसई स्कूलों से उम्मीद, लेकिन चुनौती बड़ी
सरकारी स्कूलों में नामांकन बढ़ाने के लिए प्रदेश सरकार सीबीएसई पाठ्यक्रम की दिशा में भी कदम उठा रही है। रिपोर्ट के अनुसार, सरकारी सीबीएसई स्कूलों की पहल से चालू शैक्षणिक सत्र में करीब 24 हजार विद्यार्थियों ने सरकारी स्कूलों में दाखिला लिया है। ये दाखिले 155 सरकारी स्कूलों में होने की जानकारी दी गई है। सरकार इसे सरकारी शिक्षा व्यवस्था के प्रति बढ़ते आकर्षण के रूप में देख रही है।
सीबीएसई पाठ्यक्रम, आधुनिक सुविधाएं और बेहतर शैक्षणिक वातावरण सरकारी स्कूलों को प्रतिस्पर्धी बनाने में मददगार हो सकते हैं। लेकिन यहां एक अहम सवाल भी है। यदि कुछ चुनिंदा स्कूलों में नामांकन बढ़ रहा है, तो क्या इसका लाभ प्रदेश के ग्रामीण और दूरदराज के स्कूलों तक भी पहुंच रहा है? सरकारी शिक्षा में सुधार का आकलन केवल चुनिंदा संस्थानों में बढ़े दाखिलों से नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश में विद्यार्थियों की संख्या, सीखने के स्तर और स्कूलों की पहुंच के आधार पर होना चाहिए।
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बंद स्कूलों के भवनों का अब दूसरे कामों में इस्तेमाल
घटते नामांकन के चलते बंद और मर्ज हुए स्कूलों के भवनों के उपयोग का सवाल भी सामने आया है। शिक्षा विभाग ने करीब 500 स्कूल भवन आंगनबाड़ी केंद्रों और स्थानीय ग्राम पंचायतों को सौंपे हैं। इससे इन भवनों को सामुदायिक जरूरतों के लिए इस्तेमाल करने का रास्ता खुला है। हालांकि, यह भी जरूरी है कि इन भवनों के उपयोग की नियमित निगरानी हो तथा ग्रामीण क्षेत्रों की भविष्य की शैक्षणिक जरूरतों को ध्यान में रखा जाए। कई बार गांवों में जनसंख्या और बच्चों की संख्या में बदलाव के साथ भविष्य में स्कूलों की आवश्यकता दोबारा पैदा हो सकती है। ऐसे में शैक्षणिक परिसंपत्तियों के इस्तेमाल को दीर्घकालिक योजना से जोड़ना जरूरी होगा।
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