पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने मोगा में खालिस्तानी झंडा फहराने और तिरंगे के अपमान के आरोपी आकाशदीप सिंह उर्फ मुन्ना को जमानत देकर एक अहम संदेश दिया है। अदालत ने साफ कहा कि किसी भी आरोपी को ट्रायल शुरू हुए बिना लंबे समय तक जेल में रखना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है। यह फैसला जस्टिस अनूप चितकारा और जस्टिस सुखविंदर कौर की बेंच ने सुनाया। इसके बाद, इस बात पर चर्चा शुरू हो गई है कि हाई कोर्ट ने देशद्रोह के ऐसे मामले में आरोपी को जमानत कैसे दे दी।
दरअसल, मोहाली की विशेष राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) अदालत ने पहले आरोपी की जमानत याचिका खारिज कर दी थी, जिसके बाद उसने हाईकोर्ट में अपील की। हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई के बाद पाया कि आरोपी काफी समय से हिरासत में है और ट्रायल में देरी हो रही है, ऐसे में उसे और जेल में रखना उचित नहीं होगा।
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क्यों मिली राहत?
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि UAPA जैसे सख्त कानून के तहत लगाए गए आरोप निश्चित रूप से गंभीर हैं लेकिन संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत हर व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार है। अदालत ने माना कि यदि ट्रायल समय पर नहीं हो पाता है, तो आरोपी को अनिश्चित समय तक जेल में रखना उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होगा। इसलिए न्याय और स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाना जरूरी है।
कड़ी शर्तों के साथ मिली राहत
कोर्ट ने आरोपी को 1 लाख रुपये के मुचलके पर जमानत दी है और साथ ही कई शर्तें भी लगाई हैं। आरोपी ने अदालत को भरोसा दिलाया है कि वह भविष्य में किसी भी देश विरोधी गतिविधि में शामिल नहीं होगा और कानून के दायरे में रहकर ही अपनी बात रखेगा। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि यदि वह किसी शर्त का उल्लंघन करता है, तो उसकी जमानत तुरंत रद्द की जा सकती है। कोर्ट ने आरोपी का यह वादा भी दर्ज किया कि वह देश के खिलाफ किसी भी काम में शामिल नहीं होगा और आर्टिकल 19 के तहत कानूनी तौर पर अपनी बात कहने की सीमा में रहेगा।
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क्या है पूरा मामला?
यह घटना 14 अगस्त 2020 की है, जब स्वतंत्रता दिवस से ठीक पहले मोगा के डिप्टी कमिश्नर कार्यालय में दो युवकों ने खालिस्तानी झंडा फहराया था। आरोप है कि उन्होंने तिरंगे को नीचे गिराकर उसका अपमान किया और इस पूरी घटना का वीडियो भी बनाया। बाद में यह मामला NIA को सौंपा गया, जिसने इसे 'सिख फॉर जस्टिस' और गुरपतवंत सिंह पन्नू से जुड़ी साजिश बताया। फिलहाल, हाईकोर्ट के इस फैसले ने यह साफ कर दिया है कि न्यायिक प्रक्रिया में देरी के चलते किसी की स्वतंत्रता लंबे समय तक नहीं छीनी जा सकती।