भारत के पास दुनिया का सबसे बड़ा पांडुलिपि संग्रह है, जिसकी संख्या लगभग एक करोड़ से भी ज्यादा मानी जाती है। हमारी यह महान विरासत घरों, मंदिरों, मठों और पुराने पुस्तकालयों में बिखरी हुई है। सरकार ने इन सभी को एक सूत्र में पिरोने के लिए 'ज्ञान भारतम मिशन' शुरू किया है।
इस मिशन का मुख्य उद्देश्य हर उस पुरानी किताब या पांडुलिपि (Manuscript) की पहचान करना है जो कम से कम 75 साल पुरानी है और जिसका ऐतिहासिक, वैज्ञानिक या सांस्कृतिक महत्व है। इस अभियान के माध्यम से सरकार एक 'नेशनल डिजिटल रिपोजिटरी' बना रही है, ताकि यह ज्ञान हमेशा के लिए सुरक्षित रहे और दुनिया भर के शोधकर्ताओं के काम आ सके।
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ज्ञान भारतम ऐप: पांडुलिपि शेयर करने के आसान स्टेप्स
सरकार ने आम लोगों को इस अभियान से जोड़ने के लिए 'ज्ञान भारतम ऐप' लॉन्च किया है। अगर आपके पास कोई पांडुलिपि है, तो आप इन आसान स्टेप्स को फॉलो करके उसे सरकार तक पहुंचा सकते हैं।
ऐप डाउनलोड और रजिस्ट्रेशन: सबसे पहले अपने फोन में 'ज्ञान भारतम' ऐप डाउनलोड करें और अपनी बेसिक जानकारी के साथ रजिस्टर करें।
फोटो अपलोड: आपके पास जो भी पांडुलिपि है, उसकी साफ फोटो खींचकर ऐप पर अपलोड करें।
जानकारी शेयर करना: पांडुलिपि किस भाषा में है, किस लिपि (Script) में लिखी गई है और उसकी वर्तमान स्थिति कैसी है, इसके बारे में छोटी सी जानकारी भरें।
लोकेशन शेयरिंग: ऐप के माध्यम से उस जगह की जानकारी (Geo-tagging) दें जहां वह पांडुलिपि रखी है, ताकि सर्वे टीम वहां पहुंच सके।
पहचान से लेकर डिजिटल सुरक्षा तक
यह पूरा सर्वे चार मुख्य स्टेप्स में पूरा किया जा रहा है ताकि कोई भी जानकारी छूट न जाए।
पहचान और मैपिंग: सबसे पहले देश भर में पांडुलिपियों की मौजूदगी का पता लगाया जा रहा है। इसके लिए जिला स्तर पर टीमें काम कर रही हैं।
भौतिक सत्यापन (Physical Verification): ऐप पर मिली जानकारी के बाद विशेषज्ञ उस स्थान पर जाकर पांडुलिपि की जांच करते हैं और उनकी प्राचीनता की पुष्टि करते हैं।
वैज्ञानिक सुरक्षा: जो पांडुलिपियां खराब हो रही हैं या नाजुक हैं, उन्हें विशेष वैज्ञानिक तरीकों से ठीक किया जाता है ताकि वे और अधिक समय तक सुरक्षित रह सकें।
AI का उपयोग: लास्ट स्टेप में इन किताबों की हाई-क्वालिटि स्कैनिंग की जाती है। इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और 'ज्ञान सेतु' जैसी तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है, जो पुरानी और कठिन लिपियों को पढ़ने में मदद करती है।
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अरुणाचल से अमृतसर तक का सफर
यह अभियान सिर्फ सरकारी फाइलों तक सीमित नहीं है, बल्कि लोग खुद आगे आकर अपनी विरासत शेयर कर रहे हैं।
उत्तर-पूर्व का योगदान: अरुणाचल प्रदेश के नामसाई जिले के रहने वाले चाओ नंतिसिन्ध लोकांग जी ने ताई लिपि में लिखी अपनी पांडुलिपियां शेयर कर एक मिसाल पेश की है।
सिख परंपरा का सुरक्षा: अमृतसर के भाई अमित सिंह राणा जी ने गुरुमुखी लिपि में लिखी पांडुलिपियां शेयर की हैं , जो हमारी पंजाबी भाषा और सिख गुरुओं की महान शिक्षाओं को दर्शाती हैं।
सरकार का यह प्लान न सिर्फ हमारी पुरानी किताबों को 'बौद्धिक चोरी' (Intellectual Piracy) से बचाएगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को उनकी असली पहचान और गौरवशाली इतिहास से भी जोड़ेगा।