देशभर में होली का त्योहार कल धूमधाम तरीके से मनाया गया। लोगों ने होली के वीडियो और फोटो सोशल मीडिया पर शेयर कर अपने अनुभव शेयर किए। बेंगलुरु की होली ने इस बार सोशल मीडिया पर अचानक एक नई बहस छेड़ दी। एक महिला ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर होली के मौके पर पोस्ट किया कि बेंगलुरु शहर त्योहार मनाना नहीं जानता। उन्होंने लिखा कि यहां पर होली जैसा कुछ दिखाई ही नहीं दे रहा। ना तो बच्चे गुब्बारे मार रहे हैं और ना रंगों से खेल रहे हैं। उनके इस पोस्ट ने बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों के कल्चर पर एक नई बहस छेड़ दी। लोग अपने-अपने विचार इस पोस्ट पर लिख रहे हैं।
महिला ने अपने पोस्ट में लिखा कि वह दोपहर 1 बजे के आसपास अपने कमरे से बाहर निकली लेकिन गलियों में और सड़कों पर पर कोई रंग नहीं खेल रहा था, ना ही कहीं से होली का माहौल दिखाई दे रहा था। उसने कहा कि उसने ना तो किसी गुब्बारे से भरे पानी देखे और ना ही कोई पिचकारी से रंग खेलता हुआ। उन्होंने इन्हीं कारणों से बेंगलुरु को एक बोरिंग शहर भी बता दिया।
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सोशल मीडिया पर शुरू हुई बहस
उनकी इस पोस्ट को कुछ ही समय में हजारों लोगों ने देखा और अपनी प्रतिक्रियाएं दी। कई लोगों ने महिला की बात का समर्थन किया। सोशल मीडिया पर अब उनकी पोस्ट पर जमकर बहस हो रही है। लोग अपने बचपन के दिनों को याद कर रहे हैं कि किस तरह जब वे बच्चे थे तो हर किसी को रंग लगाते थे। लोग लिख रहे हैं कि त्योहारों में अब वह बात नहीं रही।
वहीं, कुछ लोगों का कहना है कि दक्षिण भारत में होली उस तरह नहीं मनाई जाती है जैसे उत्तर भारत में मनाई जाती है। लोगों ने यह भी बताया कि बेंगलुरु जैसे शहरों में नौकरी या कॉलेज की वजह से त्योहार के दिन सुबह-दोपहर लोग बाहर नहीं निकलते हैं और रंग का माहौल उतना दिखता नहीं है। कई ने लिखा कि होली के रंग और उत्साह वहां भी हैं, पर सड़कों पर नहीं बल्कि इंडोर पार्टी या गेट-टुगेदर में लोग ज्यादा दिखाई देते हैं।
होली मनाने का अलग-अलग तरीका
बहुत से लोग यह भी मानते हैं कि भारत में त्योहारों को मनाने का तरीका अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग होता है। जहां उत्तर भारत में होली पर सब सार्वजनिक रूप से रंग खेलते हैं, वहीं दक्षिण में खासकर बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों में लोग त्योहार को परिवार, दोस्त या सोसायटी में ही मिलकर मनाते हैं। यही कारण है कि बाहर सड़कों पर लोग कम ही रंग खेलते हैं।
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इस पोस्ट पर एक व्यक्ति ने लिखा, 'होली हमारे यहां पारंपरिक रूप से इतना बड़ा त्योहार नहीं रहा है, जैसा उत्तर भारत में है। अब बेंगलुरु में कुछ लोग रंग खेलते हैं लेकिन यह ज्यादातर लोग अपने दोस्तों और ग्रुप्स के साथ अपने-अपने घरों में या किसी कॉमन जगह पर खेलते हैं।'
बोरिंग कहने पर भड़के लोग
महिला के पोस्ट के बाद सोशल मीडिया पर एक बड़ी बहस शुरू हो गई है। कुछ लोगों ने कहा कि हर शहर की अपनी सांस्कृतिक पहचान होती है और इसे बोरिंग कहना सही नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि बेंगलुरु में काम के दबाव और लाइफ स्टाईल की वजह से त्योहार गली-मोहल्लों में उस तरह का दिखाई नहीं देता जैसा उत्तर भारत में दिखाई देता है।