अगर आप भी इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं तभी यह खबर पढ़ रहे होंगे। अब इंटरनेट इस्तेमाल करते हैं तो अलग-अलग वेबसाइटों पर लॉगिन के लिए अलग-अलग तरीके आपके सामने आते हैं। कहीं ओटीपी से लॉगिन करना होता है तो कहीं यूजरनेम और पासवर्ड के साथ CAPTCHA भी डालना पड़ता है। इसमें कुछ आड़े-टेढ़े लिखे अक्षर होते हैं जो कई बार समझ में ही नहीं आते। असल में इनकी शुरुआत किसी और काम के लिए हुई थी। इसकी एक और सच्चाई यह है कि यह गूगल का एक ऐसा प्रोजेक्ट है, जिसके लिए हर यूजर फ्री में काम कर रहा है।
अगर आपको भी ये बातें गोल-मटोल लग रही हैं और कन्फ्यूजन हो रहा है तो हम इस कन्फ्यूजन को आज दूर कर देंगे। आपको इसका इतिहास भी बताएंगे, इसके पीछे की वजह भी बताएंगे और यह भी बताएंगे कि हर बार जब आप कैप्चा डालते हैं तो इससे किसे फायदा होता है।
कैसे हुई शुरुआत?
इसकी शुरुआत साल 2000 में कार्निएज मेलॉन यूनिवर्सिटी, पेंसिलवेनिया से हुई। लुइस वॉन एन (Luis von Ahn) की टीम ने ऐसे स्पैम बॉट्स से बचने के लिए यह तरीका ईजाद किया जो खुद को इंसानों जैसा दिखाते थे। लुइस की टीम ने एक प्रोग्राम तैयार किया जो आड़े-तिरछे, कटे-फटे और अजीबोगरी फॉन्ट में लिखे कुछ अक्षर दिखाता था। ये ऐसे होते थे जिन्हें पढ़ने में दिक्कत होती थी। हां, अगर कोई इंसान इसमें दिमाग लगाए तो थोड़ी देर बाद वह इसे पहचान सकता है। बस इसी को पढ़कर एक बॉक्स में लिखना होता था।
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यह प्रोग्राम काफी सफल रहा और देखते ही देखते हर वेबसाइट पर CAPTCHA दिखने लगा। कुछ ही साल में कुछ गरीब देशों में लोगों को पैसे दिए जाने लगे, उनका काम था कि उन्हें सिर्फ कैप्चा सॉल्व करना होता था। समय के साथ इस पर स्पैमिंग बढने लगी। अब लुइस को लगने लगा कि ये सब तो बेकार ही चला जा रहा है।
फिर इन लोगों ने थोड़ा और काम किया और reCAPTCHA की शुरुआत की। इसमें आर्काइव टेक्स्ट को देखकर लिखना होता था। इसकी वजह यह थी कि कंप्यूटर आसानी से किसी भी टेक्स्ट को पढ़ सकते थे लेकिन पुरानी किताबों में लिखे टेक्स्ट को वे नहीं पढ़ पाते थे। नतीजा हुआ कि reCAPTCHA में इन्हीं शब्दों को दिया जाने लगा।
गूगल ने फ्री में कैसे काम कराया?
शुरुआत की गई 'द न्यू यॉर्क टाइम्स' अखबार के आर्काइव से। कुछ ही साल में लुइस ने यह टेक्नॉलजी गूगल को बेच दी। गूगल ने इसका इस्तेमाल करके सबसे पहले पुरानी किताबों को ट्रांसक्राइब करना शुरू कर दिया यानी गूगल ने लोगों से फ्री में काम करवाना शुरू कर दिया। कई बार जो आप ब्लर्ड टेक्स्ट देखते हैं, वह ऐसी ही किताबों या द न्यू यॉर्क टाइम्स अखबार के ही टेक्स्ट होते हैं।
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साल 2014 तक गूगल अनैलटिक्स ने पाया कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से इन CAPTCHA और reCAPTCHA को 99.8 प्रतिशत एक्यूरेसी से क्रैक किया जा सकता है। यानी यह प्रोग्राम बेकार हो गया। इसका तोड़ निकालने के लिए नया सिस्टम निकाला। इसके जरिए यूजर के इंटरैक्शन के हिसाब से उसे कैप्चा दिखाए जाने के लगे कि वह उसे आसानी से क्रैक न कर पाए। कई बार इसी में 'I am not a robot' और इमेज भी दिखाई जाती हैं।
दरअसल, यह प्रोग्राम आपकी ऐक्टिविटी के हिसाब से अंदाजा लगाता है कि आप इंसान हैं या नहीं। अगर उसे लगता है कि आप इंसान हैं तो सिर्फ आपको टिक बॉक्स पर क्लिक करना होता है। अगर उसे थोड़ा डाउट होता है तो वह कोई पजल, सिग्नल या गाड़ियों की तस्वीरें आदि देकर आपसे सॉल्व कराता है।
CAPTCHA यानी कंप्लीटली ऑटोमेटेड पब्लिक ट्यूरिंग टेस्ट टु टेल कंप्यूटर्स एंड ह्यमून्स अपार्ट। अर्थ हुआ- एक ऐसा टूल जो यह बता सके कि इंसान और कंप्यूटर अलग-अलग हैं।