logo

मूड

ट्रेंडिंग:

'रातां लंबियां कालियां नी समिए' में Sammi कौन है? वायरल गाने का राज जानिए

'रातां लंबियां कालियां नी समिए' गाना इन दिनों सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रहा है। जानिए इस गाने के पीछे की कहानी और इसका सही मतलब।

AI generated image

प्रतीकात्मक तस्वीर, Photo Credit- Gemini

शेयर करें

google_follow_us

संबंधित खबरें

Advertisement

इन दिनों सोशल मीडिया पर पंजाबी गाना 'रातां लंबियां कालियां नी समिए, सम्मी मेरी वार' काफी वायरल हो रहा है। इंस्टाग्राम रील्स में इसकी लाइनें और धुन सुनने को मिल रही हैं। गाना सुनने में प्रेम और किसी की याद से जुड़ा लगता है लेकिन इसके पीछे पंजाब के पुराने लोकगीत और लोकनृत्य की परंपरा भी जुड़ी हुई है। यही वजह है कि बहुत से लोगों के मन में सवाल है कि गाने में बार-बार आने वाला सम्मी आखिर है कौन?

 

इस गाने की खास बात यह है कि सम्मी शब्द सिर्फ गाने की एक लाइन तक सीमित नहीं है। पंजाब की लोक-संस्कृति में इसका संबंध लोकगीत और एक पारंपरिक लोकनृत्य से भी है। इसके अलावा सम्मी से जुड़ी कुछ लोककथाएं भी सुनने को मिलती हैं। इसी वजह से सम्मी का मतलब समझने के लिए इसकी पुरानी कहानी और परंपरा को जानना जरूरी है।

 

यह भी पढ़ें: इमरान खान की एक्स वाइफ जेमिमा ने की दूसरी शादी, 62 साल के अरबपति को बनाया हमसफर

सम्मी कौन है और उससे जुड़ी कहानी क्या है?

सम्मी सिर्फ किसी एक लड़की का नाम नहीं है। पंजाबी लोकपरंपरा में सम्मी एक पारंपरिक लोकनृत्य भी है। यह पुराने पंजाब के सांदल बार इलाके से जुड़ा माना जाता है। इस नृत्य में महिलाएं समूह बनाकर गीत गाते हुए नृत्य करती हैं। सम्मी से जुड़े लोकगीतों में प्रेम, जुदाई और किसी अपने के इंतजार की भावनाएं दिखाई देती हैं।

 

सम्मी को लेकर अलग-अलग लोककथाएं भी मिलती हैं। एक कहानी में सम्मी को एक खूबसूरत युवती बताया गया है जो अपने प्रेमी से दूर हो जाती है और उसकी याद में दुखी रहती है। कुछ दूसरी परंपराओं में उसे राजकुमारी बताया गया है। इन कहानियों में उसके प्रेमी का नाम भी अलग-अलग मिलता है। कहीं उसे धोला बताया गया है तो कहीं किसी राजकुमार से जोड़ा गया है। इसलिए सम्मी की कहानी का कोई एक तय रूप नहीं है।

 

एक लोककथा में सम्मी और उसकी मां की कहानी भी सुनाई जाती है। इस कहानी के मुताबिक, सम्मी एक पुराने पेड़ को बचाने के लिए उसके सामने खड़ी हो जाती है। जब पेड़ को काटने की कोशिश होती तो वह उसे बचाने के लिए अपनी जान दे देती है। इसके बाद उसकी मां बेटी को याद करके दुखी रहती है। इसी तरह की लोककथाओं को ‘रातां लंबियां कालियां नी समिए’ जैसे गीतों के भाव से जोड़ा जाता है। 

 

हालांकि इन कहानियों को पक्का इतिहास नहीं माना जा सकता। ये लोककथाएं हैं और समय के साथ इन्हें अलग-अलग जगहों पर अलग तरीके से सुनाया गया है। इन सभी कहानियों में एक बात समान दिखाई देती है कि सम्मी को प्रेम, जुदाई और इंतजार से जुड़ी एक महिला के रूप में याद किया जाता है।

 

यह भी पढ़ें: गुरुग्राम में कार सवार ने पहले किया महिला बाइकर का पीछा, फिर मारी जोरदार टक्कर

2015 में भी आया था 'सम्मी मेरी वार'

'सम्मी मेरी वार' नाम का गाना पहले भी कोक स्टूडियो में पेश किया जा चुका है। कोक स्टूडियो के सीजन 8 में इसे कुरतुलैन बलोच और उमैर जसवाल ने गाया था। इसका वीडियो 22 अगस्त 2015 को कोक स्टूडियो पाकिस्तान के आधिकारिक यूट्यूब चैनल पर जारी किया गया था। इससे पता चलता है कि 'सम्मी मेरी वार' कोई नया गाना नहीं है। इसकी जड़ें पुराने पंजाबी लोकसंगीत से जुड़ी हैं। समय के साथ इस गाने को अलग-अलग तरह से गाया और पेश किया जाता रहा है।

 

आज सोशल मीडिया पर 'रातां लंबियां कालियां नी समिए' गाना काफी वायरल हो रहा है। लोग इस गाने की लाइन पर रील्स बना रहे हैं और इसे काफी पसंद भी कर रहे हैं। गाने के वायरल होने के बाद लोगों की दिलचस्पी इसके मतलब और ‘सम्मी’ से जुड़ी कहानी को जानने में भी बढ़ी है।

Related Topic:#Viral News

और पढ़ें