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'मेहनत से पढ़ लेता तो...', 500 में से 499 नंबर लाने वाले की मां ने जताया अफसोस

पश्चिम बंगाल के दिब्येंदु प्रमाणिक ने ICSC बोर्ड में 500 में से 499 नंबर लाकर अपने परिवार का नाम रोशन किया है लेकिन उनकी मां को अफसोस है कि वह 500 नंबर नहीं ला पाए।

Bani Pramanik

बनी प्रमाणिक, Photo Credit: Social Media

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पश्चिम बंगाल के एक छात्र ने ICSE बोर्ड की परीक्षा में 500 में से 499 नंबर लाकर अपना और अपने परिवार का नाम रोशन किया। इस छात्र को पूरे देश में दूसरा रैंक मिला है। उनकी इस सफलता पर परिवार में जश्न के बजाय अफसोस फैल गया है। उनकी मां ने इस बात को लेकर अफसोस जाहिर किया कि उनका बेटा पूरे नंबर लाने से चूक गया। उनकी मां ने मीडिया से बात करते हुए यह बात कही जिससे बाद से उनकी वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है। 

 

पश्चिम बंगाल में सिलीगुड़ी के ऑक्सिलियम कॉन्वेंट के छात्र दिब्येंदु प्रमाणिक ने 10वीं की बोर्ड परीक्षा में 99.80 प्रतिशत नंबर हासिल कर सुर्खियां बटौरी लेकिन उनकी मां को इस बात का अफसोस है कि उनका बेटा 500 में से 500 नंबर स्कोर नहीं कर पाया। उन्होंने इस बात पर अफसोस जाहिर किया है। 

 

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मां ने क्या कहा?

दिब्येंदु की मां ने कहा, 'मुझे दुख है। अगर उसे एक और नंबर मिल जाता तो बेहतर होता। अगर उसने थोड़ी और मेहनत की होती, तो शायद हमें उस एक नंबर के ना मिलने का दुख ना होता।' उन्होंने मीडिया से बात करते हुए यह कहा था। इसके बाद उनका वीडियो वायरल हो गया। 

बेटे को भी एक नंबर का अफसोस

मीडिया से बात करते हुए दिब्येंदु ने भी अपनी मां की बात को दोहराया। उन्होंने कहा, 'एक नंबर कम आने का मुझे दुख है लेकिन कोई बात नहीं। मैंने ठीक-ठाक प्रदर्शन किया है।' अपने करियर के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा कि वह इंजीनियर बनना चाहते हैं और जल्द ही आईआईटी के लिए एंट्रेस टेस्ट देंगे। 

सोशल मीडिया पर चर्चा

आजकल पढ़ाई को लेकर बच्चों पर बहुत ज्यादा दबाव है। इस दबाव के कारण कई बार बच्चे गलत कदम भी उठा लेते हैं। दिब्येंदु ने 500 में 499 नंबर लाकर अपने परिवार का नाम रोशन किया है लेकिन उनकी मां और उन्हें खुद इस बात का अफसोस है कि उन्हें एक और नंबर नहीं मिला। इस पर लोग अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं। कुछ लोग कह रहे हैं कि इससे बच्चे पर मानसिक दबाव बन रहा है।

 

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क्या बोले लोग?

एक व्यक्ति ने लिखा, 'दिब्येंदु की यह उपलब्धि असाधारण है, लेकिन 499 अंकों के बाद भी माता-पिता की यह असंतुष्टि बच्चों पर अनावश्यक मानसिक दबाव पैदा करती है। जब एक अंक की कमी को असफलता की तरह देखा जाने लगता है, तो बच्चों का मनोबल गिरता है और यही अंतहीन उम्मीदें भविष्य में उनके मानसिक स्वास्थ्य के लिए घातक साबित हो सकती हैं। एक मां को अपने बेटे की इस ऐतिहासिक सफलता पर गर्व होना चाहिए, न कि उस एक अंक का शोक मनाना चाहिए।'

 

हालांकि कुछ लोग इसे भारतीय मां के प्यार से जोड़कर भी देख रहे हैं। सोशल मीडिया पर एक महिला ने लिखा, 'यह तो मां का प्यार है जो अपने बेटे को सबसे अव्वल देखना चाहती है, लेकिन उन्हें नहीं भूलना चाहिए कि दूसरा नंबर लाना भी कोई आम बात नहीं है। यह उनके लिए भाग्यशाली है कि उनका बेटा इतना सक्षम है कि दूसरा नंबर लेकर आया है।'

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