हरियाणा में कई नेताओं के साथ ऐसा हुआ है कि उन्होंने एक पार्टी छोड़ी, अपनी पार्टी बनाई, फिर विलय किया और आखिर में अपने अस्तित्व को तरसने लगे। अब ऐसा ही कुछ भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेता कुलदीप बिश्नोई के साथ हो रहा है। कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में गए कुलदीप बिश्नोई साल 2022 से इंतजार कर रहे हैं। दो बार राज्यसभा के चुनाव हुए और एक बार लोकसभा का चुनाव हो गया लेकिन बीजेपी ने उन्हें कोई पद नहीं दिया। अब कुलदीप बिश्नोई एक ट्वीट के सहारे संकेत दे रहे हैं कि शायद उन्हें फिर से संघर्ष का रास्ता ही चुनना होगा। 2024 में आदमपुर में हार के बाद कुलदीप बिश्नोई और उनके परिवार की राजनीतिक धाक वैसी नहीं रही है और अपनी ही सीट हारने के चलते अब वह बीजेपी पर भी दबाव बनाने की स्थिति में नहीं हैं।

 

2024 में लोकसभा का टिकट मांग रहे कुलदीप बिश्नोई को सफलता नहीं मिली थी। हालांकि, बाद में वह अपने बेटे समेत कुछ करीबियों को विधानसभा का टिकट दिलाने में कामयाब रहे। हाल ही में जब हरियाणा की दो सीटों पर राज्यसभा के चुनाव का एलान हुआ तो कुलदीप बिश्नोई को उम्मीद थी कि इस बार उनकी मुराद पूरी हो जाएगी। इस बार उन संजय भाटिया को कामयाबी मिल गई जिन्होंने साल 2024 में मनोहर लाल खट्टर के लिए अपनी सीट छोड़ दी थी। यानी कुलदीप बिश्नोई एक बार फिर खाली हाथ रह गए। अब 2028 से पहले कोई राज्यसभा सीट भी नहीं खाली होनी है, ऐसे में कुलदीप बिश्नोई के पास संघर्ष के अलावा कोई दूसरा रास्ता भी नहीं बचता।

 

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कुलदीप बिश्नोई के ट्वीट में क्या संदेश छिपा है?

 

कुलदीप बिश्नोई ने अपने एक ट्वीट में लिखा है, 'आज के दिन, 5 मार्च 2010, मुझे वह लाठीचार्ज याद आता है जब मेरे और मेरे साथ खड़े कर्मठ और निष्ठावान कार्यकर्ताओं पर वार किए गए थे लेकिन इतिहास गवाह है, लाठियां हमेशा संघर्ष को और मजबूत ही करती हैं।


हम तब भी जनता के साथ थे, आज भी हैं और हमेशा रहेंगे। मेरी राजनीति हमेशा संघर्ष, स्वाभिमान और जनता के अधिकारों की लड़ाई से बनी है और यह लड़ाई आगे भी जारी रहेगी और स्वर्गीय चौधरी भजन लाल जी के अधूरे सपनों को हर हाल में पूरे करेंगे।' 

 

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इस ट्वीट के सहारे कुलदीप बिश्नोई यह साबित करना चाह रहे हैं कि भले वह या उनका परिवार किसी सदन का हिस्सा नहीं है लेकिन वह जनता के साथ है। उन्होंने एक बार फिर से भजन लाल के सपनों को पूरा करने का वादा किया है। हालांकि, कुलदीप बिश्नोई के सामने अब दोहरी मुश्किल यह है कि पहले तो उन्हें अपने समर्थकों में जान फूंकनी है और दूसरी बात यह कि उन्हें अपने लिए मौकों की तलाश भी करनी होगी।

आदमपुर के लिए कुछ नहीं कर पा रहे कुलदीप बिश्नोई

 

अब स्थिति यह है कि कुलदीप बिश्नोई जिस आदमपुर के सहारे कभी बीजेपी तो कभी कांग्रेस में गए, उसी आदमपुर को हार बैठे हैं। परिवार में किसी के पास कोई भी पद नहीं है जिसके बलबूते जनता को उनसे उम्मीद हो। वहीं, कांग्रेस के मौजूदा विधायक चंद्र प्रकाश लगातार सक्रिय हैं जिसके चलते कुलदीप बिश्नोई को खास मौका भी नहीं मिल पा रहा है। यही वजह है कि कभी वह अपनी पुरानी पार्टी हरियाणा जनहित कांग्रेस को याद कर रहे हैं तो कभी अपने संघर्षों का जिक्र कर रहे हैं। 

 

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कैसा रहा कुलदीप बिश्नोई का सफर?

 

हिसार जिला भजन लाल बिश्नोई के परिवार का गढ़ रहा है। वही भजन लाल जो 1979 से 1986 तक एक बार जनता पार्टी और दो बार कांग्रेस की ओर से हरियाणा के मुख्यमंत्री बने। उन्हें चौथी बार साल 1991 में मौका मिला और कांग्रेस ने एक बार फिर से उन्हें मुख्यमंत्री बनाया। इस बार भजन लाल ने मुख्यमंत्री के तौर पर अपना कार्यकाल पूरा किया। इसके बाद हरियाणा विकास पार्टी की सरकार बनी और बंसी लाल सीएम बने। साल 2005 में जब कांग्रेस को फिर से जीत मिली तब कांग्रेस ने भजन लाल के बजाय भूपेंद्र सिंह हुड्डा को मुख्यमंत्री बना दिया। यहीं से उनकी नाराजगी शुरू हो गई।

 

साल 2004 में कांग्रेस के टिकट पर कुलदीप बिश्नोई पहली बार लोकसभा के सांसद बने थे। अब यही सीट भिवानी-महेंद्रगढ़ लोकसभा हो गई है। अब होता कुछ यूं था कि बाप-बेटे की जोड़ी कांग्रेस में रहने के बावजूद आलोचना करती रही थी। आखिरकर मार्च 2007 में कांग्रेस ने कुलदीप बिश्नोई को निलंबित कर दिया गया। कुलदीप बिश्नोई ने इस पर कहा कि कांग्रेस जन विरोधी पार्टी है। दिसंबर 2007 में भजनलाल और कुलदीप बिश्नोई ने हरियाणा जनहित कांग्रेस बनाई।

 

2008 के उपचुनाव में पहले भजनलाल और फिर 2009 के चुनाव में कुलदीप बिश्नोई आदमपुर सीट पर इसी हरियाणा जनहित कांग्रेस के ही टिकट पर चुनाव जीते। 2009 के लोकसभा चुनाव में भजनलला हिसार से इसी पार्टी के टिकट पर लोकसभा का चुनाव जीते। 2011 में भजनलाल का निधन हुआ तो कुलदीप बिश्नोई फिर से लोकसभा का चुनाव लड़े और सांसद बने। इस चुनाव में कुलदीप बिश्नोई ने बीजेपी से गठबंधन भी किया था। अब कुलदीप के सांसद बनने के बाद आदमपुर सीट खाली हुई तब कुलदीप ने अपनी पत्नी रेणुका बिश्नोई को आदमपुर से चुनाव लड़वाया और वह जीत गईं। 2014 में कुलदीप बिश्नोई हिसार सीट पर दुष्यंत चौटाला से चुनाव हार गए। उसी साल कुलदीप बिश्नोई ने आदमपुर से विधानसभा का चुनाव लड़ा और फिर से विधायक बन गए।

 

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कांग्रेस में वापसी और फिर दूरी

 

2014 की हार के बाद से ही कुलदीप बिश्नोई फिर से कांग्रेस के संपर्क में आ चुके थे। कई बार उनकी मुलाकात राहुल गांधी से भी हुई थी। इसका नतीजा यह हुआ कि अप्रैल 2016 में कुलदीप बिश्नोई ने अपनी हरियाणा जनहित कांग्रेस का कांग्रेस पार्टी में विलय कर दिया। 2019 में वह आदमपुर सीट पर कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े और आसानी से जीत भी गए। हालांकि, कुछ ही साल में भूपेंद्र सिंह हुड्डा से उनका टकराव फिर से शुरू हो गया। 2022 में राज्यसभा का एक चुनाव आया और मामला बिगड़ गया। कुलदीप बिश्नोई ने क्रॉस वोटिंग की फिर कांग्रेस से निकाल दिए गए। नतीजा यह हुआ कि इस बार कुलदीप बिश्नोई बीजेपी में शामिल हो गए। तब से अब तक वह खुद किसी पद पर नहीं हैं।