तीसरे की एंट्री और कांग्रेस में बगावत, हरियाणा में फिर खेल हो जाएगा?
हरियाणा में दो राज्यसभा की सीटों के लिए बीजेपी ने तीसरे उम्मीदवार को निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतार दिया है। अब कांग्रेस के सामने अपने विधायकों को क्रॉस वोटिंग से रोकने की चुनौती है।

राज्यसभा चुनाव, Photo Credit: SORA
हरियाणा की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। राज्यसभा की दो सीटों के लिए मौजूदा संख्या बल के हिसाब से बीजेपी और कांग्रेस को एक-एक प्रत्याशी उतारना चाहिए था लेकिन बीजेपी अपनी पुरानी स्क्रिप्ट पर एक बार फिर से काम कर रही है। उसी पुरानी स्क्रिप्ट पर जिसके जरिए सतीश नांदल और सुभाष चंद्रा ने जीत दर्ज की थी और वह भी जरूरी संख्याबल ना होने के बावजूद। अब कांग्रेस पार्टी के फिर से संकट में फंस गई है और अगर इस बार भी बीजेपी जीत गई तो कांग्रेस के लिए बड़ी हार मानी जाएगी।
राज्यसभा सीट- 2
बीजेपी उम्मीदवार- संजय भाटिया
कांग्रेस उम्मीदवार- करमबीर बौद्ध
निर्दलीय प्रत्याशी- सतीश नांदल
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कल बीजेपी ने किया खेल
भारतीय जनता पार्टी की राज्यसभा चुनाव जीतने की यह पुरानी स्क्रिप्ट है कि पार्टी निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर अपनी किसी नेता को मैदान में उतार देती है। कार्तिकेय शर्मा और सुभाष चंद्रा को जीताने के लिए यही रणनीति अपनाई गई थी। कल सुबह नामांकन से पहले संजय भाटिय सीएम नायब सिंह सैनी से मिलने चंडीगढ़ संत कबीर कुटीर पहुंचे। वहां से वह विधानसभा नामांकन करने गए।
इसी दौरान खबर सामने आई की संजय भाटिया के अलावा भी एक बिजनेसमैन को बीजेपी ने सारे काम छोड़कर चंडीगढ़ बुला लिया है। कुछ देर में सामने आया कि बीजेपी नेता सतीश नांदल को सारे दस्तावेजों के साथ नामांकन करने के लिए कह दिया गया है। सूत्रों के अनुसार, वह सीएम आवास पर सीएम सैनी से भी मिले।
सीएम सैनी बीजेपी के उम्मीदवार संजय भाटिया के साथ नामांकन दाखिल करने गए। शाम तक सतीश नांदल ने भी निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर अपना पर्चा भर दिया। बता दें कि सतीश नांदल ने निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर पर्चा इसलिए भरा है क्योंकि बीजेपी के पास जरूरी विधायक नहीं हैं। वह एक ही सीट पर जीत दर्ज कर सकती है और दूसरी सीट के लिए उसे कांग्रेस के विधायकों को तोड़ना होगा।
क्या जीत पाएंगे सतीश नांदल?
हरियाणा विधानसभा की कुल संख्या 90 है। एक सीट पर जीत के लिए 31 विधायकों के वोट की जरूरत होगी। कांग्रेस के पास 37 और बीजेपी के पास 48 विधायक हैं। इसके अलावा 3 निर्दलीय उम्मीदवारों का समर्थन भी बीजेपी को मिला है। कुल मिलाकर बीजेपी के पास 51 वोट हैं। अब इतने विधायकों के दम पर बीजेपी के संजय भाटिया का राज्यसभा जाना तो तय है लेकिन निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में उतरे सतीश नांदल को मेहनत करनी होगी।
सतीश नांदल को 17 बीजेपी के और 3 निर्दलीय विधायकों के वोट मिलेंगे। ऐसे में उन्हें कांग्रेस के कम से कम 9 विधायकों और इनेलो के एक विधायक को अपने पाले में लाना होगा। बीजेपी के विधायकों का वोट तो उन्हें मिल जाएगा लेकिन इन 9 विधायकों को तोड़ने में उन्हें मेहनत करनी होगी। हालांकि, कांग्रेस के कई नेता नाराज हैं और ऐसे में उनकी यह मुश्किल आसान हो सकती है।
https://twitter.com/HRPBpolitics/status/2029480527124938919
सतीश नांदल के पक्ष में एक बात यह भी है कि वह भूपेंद्र सिंह हुड्डा के कट्टर विरोधी हैं। 2009, 2014 में वह इनेलो के टिकट पर और 2019 में बीजेपी के टिकट पर हुड्डा के खिलाफ विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं। ऐसे में उन्हें उम्मीद है कि वह हुड्डा विरोधी कांग्रेस के कुछ विधायकों को अपने पाले में कर सकते हैं। कल नामांकन के दौरान भी पार्टी के सिर्फ 34 विधायक ही पहुंचे थे 3 विधायक गैरमौजूद रहे।
https://twitter.com/BhupinderShooda/status/2029510585977884948
कांग्रेस में फूट
कांग्रेस पार्टी में जो हर छोटे बड़े चुनाव में होता है वह इस चुनाव में भी हो रहा है। एक उम्मीदवार का नाम तय किया गया तो दूसरे सभी संभावित उम्मीदवार और उनके समर्थक नाराज हो गए हैं। पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हु्ड्डा भले ही कह रहे हों कि सभी विधायक करमबीर सिंह बौद्ध को वोट देंगे लेकिन पार्टी के अंदर फूट के संकेत मिल रहे हैं। ओबीसी कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष तेलूराम जांगड़ा ने कांग्रेस पार्टी से इस्तीफा दे दिया है।
उन्होंने कहा कि ओबीसी समाज से उनका नाम, राव दान सिंह और उदयभान का नाम संभावित उम्मीदवारों में था लेकिन पार्टी ने ओबीसी की जगह किसी और को टिकट दिया। अब भूपेंद्र सिंह हुड्डा और प्रदेश अध्यक्ष नरेंद्र के सामने चुनौती है कि वह इस चुनाव में कांग्रेस के सभी 37 विधायकों से पार्टी उम्मीदवार के पक्ष में वोट करवाएं। अगर ऐसा नहीं हुआ तो पार्टी नेतृत्व के साथ-साथ इन दोनों नेताओं की खूब किरकिरी होगी।
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बीजेपी ने पहले भी जीते हैं चुनाव
कांग्रेस की मुश्किलें इसलिए भी बढ़ गई हैं क्योंकि बीजेपी पहले भी विधायकों की संख्या ना होने के बावजूद चुनाव जीत चुकी है। 2016 और 2022 में बीजेपी ने इसी स्क्रिप्ट पर काम किया और दोनों बार जीत दर्ज की। बीजेपी ने 2016 में चौधरी बीरेंद्र सिंह को और निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में सुभाष चंद्रा को मैदान में उतारा था। वोटिंग के दौरान कांग्रेस के 12 विधायकों के वोट अमान्य घोषित कर दिए गए और सुभाष चंद्रा चुनाव जीत गए।
2022 में एक बार फिर बीजेपी ने 2016 वाली स्क्रिप्ट पर काम किया। दो सीटों के लिए बीजेपी ने कृष्णलाल पंवार को पार्टी उम्मीदवार और कार्तिकेय शर्मा को निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में उतारा। कांग्रेस नेता अजय माकन को पार्टी ने उम्मीदवार बनाया था। कांग्रेस के कुछ विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की और नतीजा रहा कि पार्टी की हार हो गई और कार्तिकेय शर्मा राज्यसभा पहुंच गए। अब बीजेपी इसी स्क्रिप्ट पर फिर से काम कर रही है।
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