PM के सपने को सांसदों ने ही नहीं दी तरजीह, आदर्श ग्राम योजना का क्या हुआ?
नरेंद्र मोदी के सत्ता में आते ही एक योजना शुरू की गई जिसके तहत सांसदों को कुछ गांव गोद लेने थे और उनका विकास करवाना था। अब इस योजना को लेकर सांसदों में ही कोई उत्साह नहीं है।

सांसद आदर्श ग्राम योजना, Photo Credit: Khabargaon
साल 2014 में केंद्र की सत्ता पर काबिज होने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई योजनाओं की शुरुआत की। इन्हीं में एक योजना सांसद आदर्श ग्राम योजना (SAGY) भी है जिसे 11 अक्तूबर 2014 को शुरू किया गया था। प्रधानमंत्री का सपना था कि देश के गांवों को मॉडल गांवों की तरह तैयार किया जाए। इसके लिए उन्होंने ऐसी योजना रखी कि हर सांसद एक ग्राम पंचायत को गोद ले और वहां विकास के काम कराए। खुद प्रधानमंत्री ने भी अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी के गांवों को गोद दिया। अब इस योजना के शुरू होने के 12 साल के बाद यह योजना लगभग खत्म होने की कगार पर है। प्रधानमंत्री के सपने को ही सांसदों की ओर से समर्थन नहीं मिल रहा है और वे गांवों को चुनने और उनमें काम करवाने में अपनी रुचि नहीं दिखा रहे हैं।
2024 के बाद यह स्पष्ट तक नहीं है कि यह योजना चालू भी है या चुपके से बंद कर दी गई। सांसद आदर्श ग्राम योजना की ऑफशियल वेबसाइट आखिरी बार 8 अगस्त 2023 को अपडेट की गई है और इस पर अब नई जानकारी नहीं डाली जा रही है। वेबसाइट पर मौजूद डेटा बताता है कि 2014-19 तक 1440 और 2019 से 2024 तक कुल 1921 ग्राम पंचायतों का चयन किया गया है। इस वेबसाइट पर मौजूद जानकारी से स्पष्ट नहीं है कि 2024 के बाद इस योजना पर काम हो रहा है या नहीं।
क्या था योजना का मकसद?
इस योजना का लक्ष्य यह था कि साल 2019 तक हर सांसद तीन-तीन गांवों का विकास करवाएं और 2019 से 2024 तक हर साल एक-एक गांव को गोद लें। इस तरह हर सांसद को कम से कम 8 गांव गोद लेने थे और उनका विकास करवाना था। हालांकि, यह काम कुछ ही सांसदों ने किया और केंद्र शासित प्रदेशों में तो इस योजना पर ना के बराबर काम हुआ।
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देश में लोकसभा सांसदों की संख्या 543 और राज्यसभा सांसदों की संख्या 250 है। इस तरह कुल सांसदों की संख्या 793 होती है। अब अगर हर सांसद ने 8 गांवों में काम करवाया होता तो 6344 गांव विकसित हो चुके होते और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सपने के मुताबिक आदर्श गांव बन चुके होते। 2024 तक का जो डेटा सरकार की ओर से दिया गया उसकी मानें तो सिर्फ 3361 गांवों को चुना ही गया। यानी लगभग 52 प्रतिशत गांवों का ही चयन हुआ। इनमें से सैकड़ों गांव ऐसे भी रहे जिनमें कामों का बंटवारा नहीं हो पाया और अगर कामों का बंटवारा हुए तो वे किसी न किसी कारण से पूरे ही नहीं हो पाए।
सरकार ने क्या बताया?
हाल ही में लोकसभा सांसद डॉ. जगतरत्चकन ने इस योजना के बारे में ग्राम विकास मंत्रालय से इसके बारे में सवाल पूछा था। उन्होंने यह पूछा था कि किस चरण में किस राज्य में कितने गांवों को चुनाव गया और कितना काम हुआ? उन्होंने यह भी पूछा था कि क्या सभी सांसदों ने गांवों को गोद लेकर काम कराया या नहीं? उन्होंने इसका कारण, योजनाओं पर हुए खर्च और अन्य चीजों की जानकारी मांगी थी।
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ग्राम विकास मंत्रालय के राज्य मंत्री कमलेश पासवन ने 10 फरवरी 2026 को इसके बारे में जवाब दिया। उन्होंने बताया कि पहले चरण, दूसरे और तीसरे चरण को मिलाकर कुल 1440 गांवों या गांव पंचायतों का इस योजना के तहत गोद लिया गया। साथ ही, यह भी बताया गया कि इस योजना के तहत अलग से पैसे नहीं दिए जाते बल्कि तमाम सरकारी योजनाओं के पैसों का इस्तेमाल करके ही विकास के कार्य कराए जाते हैं। इसके लिए सांसद निधिन और विधायक निधि के साथ-साथ CSR फंड का भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
रोचक बात है कि सरकार की ओर से 2026 में जवाब दिया गया और यह बताया गया कि 1440 में से 924 गांव ऐसे थे जहां सारे काम पूरे कर लिए गए जबकि योजना के लिए गांवों का चयन आखिरी बार साल 2018-19 में ही किया गया था। यानी 7 साल के बाद भी सैकड़ों गांव ऐसे हैं जहां काम पूरे नहीं हुए।
रुचि न दिखाने की वजह से बंद हो गई योजना?
सरकार ने अपने जवाब में तो यही बताया है कि ऐसा कोई सर्व नहीं हुआ है जो यह बताए कि सांसदों ने पैसों की कमी के चलते इस योजना में रुचि नहीं दिखाई। हालांकि, सरकार की खुद की रिपोर्ट दिखाती है कि ज्यादातर राज्यों में हर साल गोद लिए जाने वाले गांवों की संख्या घटती गई।
2014 से 2016 के बीच 696 गांवों को गोद लिया गया, 2016 से 2018 के बीच 468 गांवों को गोद लिया गया और 2018-19 के बीच सिर्फ 276 गांवों को ही गोद लिया गया। देश की राजधानी दिल्ली में पहले चरण में सिर्फ 4 गांवों को गोद लिया गया और दूसरे और तीसरे चरण में किसी भी गांव को गोद नहीं लिया गया। पश्चिम बंगाल में पहले साल सिर्फ 3 गांवों को गोद लिया गया और दूसरे और तीसरे चरण में एक भी गांव को गोद नहीं लिया गया।
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त्रिपुरा, पुडुचेरी, लद्धाख, लक्षद्वीप, दादरा-नगर हवेली और दमन दीव और दिल्ली में दूसरे और तीसरे चरण में एक भी गांव का चयन नहीं किया गया। एक और रोचक तथ्य जुलाई 2025 में संसद में दिए गए एक जवाब में मिलता है। सांसद रामशंकर विद्यार्थी राजभर के एक सवाल के जवाब में 29 जुलाई को बताया गया कि दिल्ली में चुने गए चार गांवों में एक भी काम नहीं हुआ। पश्चिम बंगाल में चुने गए गांवों में सिर्फ 61 काम हुए जबकि आंध्र प्रदेश के 207 गांव चुने गए जिनमें 13901 काम करवाए गए।
ग्राम विकास मंत्रालय भी कनफ्यूज?
संसद में फरवरी 2026 में दिए गए एक जवाब में ग्राम विकास मंत्रालय कुल चुने गए गांवों की संख्या 1440 बताता है जबकि जुलाई 2025 में दिए गए एक सवाल के जवाब में यही संख्या 3361 दिखती है। हालांकि, इस लिस्ट में भी दिल्ली और पश्चिम बंगाल में चुने गए गांवों की संख्या 4 ही दिखती है। एक और अजीब बात है कि फरवरी 2026 में दी गई जानकारी में सिर्फ 2018-19 तक की जानकारी दी गई है जबकि जुलाई 2025 में दिए गए जवाब में 31 मार्च 2024 तक चुने गए गांवों की संख्या बताई गई है।
इस योजना के लिए कहां से आते हैं पैसे?
इस योजना में सबसे बड़ी बाधा यह दिखती है कि इस योजना के तहत कोई पैसा सरकार नहीं देती है। इसमें सांसद का काम योजनाओं को किसी खास गांव में केंद्रित करना, उनके लिए विधायक से लेकर ग्राम प्रधान तक जैसे प्रतिनिधियों को प्रोत्साहित करना, सिविल सोसायटी, सरकारी और प्राइवेट संस्थानों को एक मंच पर लाना और उनकी मदद से संसाधन जुटाकर काम करवाना होता है। इसके लिए राज्य और केंद्र सरकार की अलग-अलग योजनाओं से आने वाले पैसों का ही इस्तेमाल किया जाता है।

इसके अलावा, सांसद अपने संपर्क और प्रयासों से CSR फंड का इंतजाम कर सकते हैं। जरूरत पड़ने पर सांसद और विधायक निधि का भी इस्तेमाल किया जाता सकता है।
कौन-कौन से काम हो सकते हैं?
मुख्य लक्ष्य यह है कि जिन गांवों को चुना जाए वे साफ-सफाई, मूलभूत सुविधाओं के मामले में संपन्न हों और इन गांवों का सामाजिक विकास हो। इसके लिए गांव में साफ-सफाई के इंतजाम के लिए नालियों का निर्माण, सड़कों का निर्माण, डस्ट बिन की सुविधा, एक्सरसाइज करने और खेलने की सुविधा जैसे काम कराए जा सकते हैं। इसके अलावा, समाज कल्याण की योजनाओं जैसे कि महिलाओं की 100 प्रतिशत डिलीवरी अस्पतालों में कराना, सबको जरूरी वैक्सीन मिलना, लिंगानुपात संतुलित करना, दिव्यांगों की जरूरतें पूरी करना, ई-क्लासरूम और ई-लाइब्रेरी बनाने, साक्षरता बढ़ाना और शिक्षा का स्तर ऊंचा करने जैसे काम शामिल हैं।
इन सबके अलावा जिन गांवों में खेती ही मुख्य व्यवसाय है वहां सॉइल हेल्थ कार्ड जारी करना, ऑर्गनैकि खेती को बढ़ावा देना, माइक्रो इरीगेशन की सुविधा उपलब्ध कराना, सीड बैंक तैयार करना, गोबर बैंक और पशु हॉस्टल बनाना, फूड प्रोसेसिंग की सुविधा तैयार करना और ऐसे कई अन्य काम हैं जिनके जरिए गांव संपन्न हो सकते हैं, स्थानीय तौर पर रोजगार से जुड़ सकते हैं और वहां के लोगों के जीने का स्तर सुधर सकता है।

योजना से क्या हासिल हुआ?
साल 2020 में आई कॉमन रिव्यू मिशन (CRM) की पांचवीं रिपोर्ट में खुद ग्राम विकास मंत्रालय ने माना था कि पैसों की कमी और सांसदों की कम रुचिक के चलते चुने गए गांवों पर कोई खास असर नहीं पड़ रहा है। पूर्व IAS अधिकारी राजीव कपूर की अगुवाई में बने 31 सदस्यों वाले कॉमन रिव्यू मिशन ने 8 राज्यों के 21 जिलों के 120 गांवों का दौरा किया और वहां किए गए कार्यों की समीक्षा की।
इस रिपोर्ट में कहा गया, 'इस योजना के तहत चुने गए कई गांवों में सांसदों ने अपनी सांसद निधि से भी पर्याप्त पैसे नहीं दिए। कुछ मामलों में इक्का-दुक्का सांसदों ने खास रुचि दिखाई लेकिन यह योजना खास असर नहीं छोड़ पाई।' इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि ऐसे गांवों को 'आदर्श' नहीं कहा जा सकता है।
इसी योजना के बारे में इंपैक्ट एंड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट की एक रिपोर्ट कहती है कि स्थानीय स्तर पर इस योजना को लेकर ना तो लोगों में जागरूकता बनी और ना ही वे इसे लेकर उत्साहित हुए। यह रिपोर्ट बताती है कि उत्तर प्रदेश के एक गांव बौदाई को आदर्श ग्राम घोषित किया गया लेकिन असल में यह खुले में शौच से मुक्त भी नहीं हो पाया।
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