8 अप्रैल 1929 में भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त ने केंद्रीय विधानसभा में बम फेंकने के बाद 'इंकलाब जिंदाबाद' का नारा लगाया था। उस समय अंग्रेजों से आजादी के लिए इस नारे को लगाया गया था। एक बार इस नारे की गूंज दिल्ली के जंतर- मंतर में सुनाई दी। दिल्ली में स्टूडेंट्स का प्रोटेस्ट चल रहा है। 'इंकलाब जिंदाबाद' का नारा  मौलाना हसरत मोहानी ने 1921 में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ दिया था। वह एक मशहूर कवि थे।

 

उन्होंने अपनी शायरी और साहित्य से लोगों में आजादी की अलख जगाई थी। वह ब्रिटिश सरकार के खिलाफ आंदोलनों में हिस्सा लेते थे और उनके खिलाफ लिखते थे। उनकी लिखी कविताएं, गजलें और शायरी आज भी बहुत लोकप्रिय हैं। कई गजलों का इस्तेमाल बाद में फिल्मों में किया गया है। आइए उन गजलों के बारे में जानते हैं।

 

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हसरत मौहानी ने लिखी थी ये मशहूर गजलें

चुपके- चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है-

म्यूजिक लवर्स को यह गजल बहुत पसंद है। इस गजल को सबसे पहले गुलाम अली ने 1982 में बी.आर चोपड़ा की फिल्म 'निकाह' के लिए गाया था। इसके बाद इसे मशहूर गजल गायक जगजीत सिंह ने अपनी आवाज दी।

 

 

इसके अलावा जगजीत सिंह ने अपने एल्बम 'कहकशां' में हसरत मौहना के दो गजलों को शामिल किया था जिसमें से 'एक रौशन जमाल ए यार से है- अंजुमन तमाम' और दूसरा 'तोड़कर अहद ए वफा' है। आप इन दोनों गजलों को यूट्यूब पर सुन सकते हैं।

 

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कैसे छुपाऊं राज ए गम

मशहूर गजल गायक उस्ताद मेहदी हसन और उस्ताद तारी खान ने 'कैसे छुपाऊं राज ए गम' गाया था। इस गजल को अलग-अलग एल्बमों के लिए रिकॉर्ड किया गया। गजल प्रेमियों को यह गजल खूब पसंद है। आप इसे यूट्यूब पर सुन सकते हैं।

 

 

इसके अलाव 'भुलाता लाख हूं लेकिन बराबर याद आते हैं', 'निगाह-ए-यार जिसे आशना-ए-राज करे' जैसी गजलों को भी अलग-अलग महफिलों में शायरों ने खूब गाया।