किसी भी संकट से पहले या बाद में सऊदी अरब अक्सर गठबंधन बनाता है। जल्दबाजी में बने यह गठबंधन अपनी पहली परीक्षा भी पास नहीं कर पाते। अगस्त में सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की ने मक्का रक्षा समझौता किया। सितंबर में हूती विद्रोही के हमले के बाद गठबंधन की हकीकत दुनिया के सामने आ गई। हालांकि गठबंधन के समर्थकों का तर्क है अभी तक इसका कोई औपचारिक ढांचा नहीं था। इसलिए कोई बड़ा कदम नहीं उठाया गया। मगर बुधवार को पाकिस्तान ने सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल नौमान महमूद को मक्का रक्षा गठबंधन का पहला महासचिव नियुक्त किया है। नौमान का मुख्य काम गठबंधन के संस्थागत व्यवस्था का निर्माण और समझौते को औपचारिक रूप से लागू करना है।
दुनिया इसे पाकिस्तान के एक बड़े कदम के रूप में देख रही है। मुस्लिम जगत के सबसे मजबूत गठबंधन में पाकिस्तान के बढ़ते प्रभाव की चर्चा हो रही है। लेकिन यह कोई पहली बार नहीं जब सऊदी अरब की पहल पर कोई गठबंधन बना और उसमें पाकिस्तान सेना के पूर्व अधिकारी को कमान सौंपी गई। इससे पहले राहिल शरीफ भी इस्लामिक मिलिट्री एलायंस टू फाइट टेररिज्म (IMAFT) गठबंधन के पहले कमांडर इन चीफ रह चुके हैं। एक दशक से भी अधिक समय बीत जाने के बावजूद यह गठबंधन अभी तक अपनी कोई बड़ी मौजूदगी दर्ज नहीं करा सका है।
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आइए समझते हैं कि यह गठबंधन कब बना था, क्यों बना और इसमें कितने देश शामिल थे। इसका मुख्यालय कहां है। इससे मक्का रक्षा समझौते के बारे में क्या समझ मिलती है।
सऊदी अरब ने क्यों बनाया था IMAFT?
2015 में सऊदी अरब ने इस्लामिक स्टेट और आतंकवाद के खिलाफ इस्लामिक मिलिट्री एलायंस टू फाइट टेररिज्म का गठन किया था। उस वक्त भी इस गठबंधन को मुस्लिम नाटो कहा गया था। इसमें शामिल अधिकांश देश सुन्नी मुस्लिम थे। सऊदी अरब की राजधानी रियाद में गठबंधन का मुख्यालय बना और दुनियाभर के 39 देशों ने सदस्यता ली। ईरान ने मक्का समझौते की तरह इस गठबंधन का भी समर्थन नहीं किया था।
10 साल पहले बने गठबंधन से क्या हासिल हुआ?
2015 में ही सऊदी अरब के भारी दबाव के बावजूद पाकिस्तान ने यमन में हूती विद्रोहियों के खिलाफ जंग में रियाद का समर्थन नहीं किया। अपनी संसद में एक प्रस्ताव पारित करके सैन्य दखल करने से साफ मना कर दिया। बाद में जब सऊदी अरब ने राहिल शरीफ को आईएमएएफटी का मुखिया बनाया गया तो पाकिस्तान में स्थित शिया संगठनों ने जमकर विरोध किया। उस वक्त भी गठबंधन के नाटो मॉडल की तरह काम करने की चर्चा थी। पाकिस्तान के रक्षा विश्लेषकों ने गठबंधन पर सवाल उठाया था। उनका कहना था कि पाकिस्तान को दूसरे के इशारों में संघर्ष में घसीटा नहीं जाना चाहिए।
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तब भी पाकिस्तान ने एक बयान में कहा था कि वह सिर्फ सऊदी अरब की भौगोलिक सीमाओं में ही किंगडम की रक्षा करेगा। मक्का समझौते के बाद भी पाकिस्तान के रक्षा विश्लेषकों ने यही लाइन दोहराई। वर्तमान में भी पाकिस्तान ने हूती विद्रोहियों के खिलाफ सीधी जंग में उतरने पर दिलचस्पी नहीं दिखाई है। 10 साल बाद भी इस गठबंधन का हासिल क्या है? इसके बारे में किसी को कुछ नहीं पता है।
नौसैनिक गठबंधन का क्या हुआ: सऊदी अरब का फेल गठबंधन बनाना का लंबा-चौड़ा इतिहास रहा है। मक्का समझौते से पहले एक नौसैनिक गठबंधन जुलाई महीने में बनाया। इसमें पाकिस्तान समेत 14 देशों को शामिल किया गया। इस गठबंधन का उद्देश्य लाल सागर में सऊदी हितों की रक्षा करना और स्वतंत्र परिवहन को सुनिश्चित करना। बाब अल-मंडेब में हूती विद्रोहियों के कब्जे के बावजूद यह गठबंधन निष्क्रिय ही रहा।
