अमेरिकी विदेश विभाग ने अपनी एक रिपोर्ट में खुलासा किया था कि भारत के साथ गलवान में झड़प के ठीक सात दिन बाद यानी 22 जून 2020 को चीन ने एक परमाणु परीक्षण किया था। अब वाशिंगटन में आयोजित हडसन इंस्टीट्यूट थिंक टैंक के एक कार्यक्रम में विदेश मामलों के सहायक सचिव क्रिस्टोफर येव ने बड़ा दावा किया। उनका कहना है कि कजाकिस्तान में स्थित एक दूरस्थ भूकंपीय स्टेशन ने 22 जून 2020 को पश्चिमी चीन के लोप नोर परीक्षण स्थल से 450 मील दूर स्थित 2.75 तीव्रता का धमाका मापा गया था।

 

क्रिस्टोफर येव का कहना है कि मैंने तब से अतिरिक्त आंकड़ों का अध्ययन किया है। मुझे लगता है कि इसके धमाके के अलावा कुछ और होने की संभावना बेहद कम है। आंकड़े खनन धमाकों से भी मेल नहीं खाते हैं। यह भूकंप से भी अलग हैं। यह परमाणु परीक्षण जैसे हैं। उधर, व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि संगठन (सीबीटीटीओ) के कार्यकारी सचिव रॉबर्ट फ्लॉयड का कहना है कि कजाकिस्तान में स्थित पीएस23 भूकंपीय स्टेशन ने 22 जून 2020 को 12 सेकंड के अंतराल में दो बहुत छोटे भूकंपीय झटके रिकॉर्ड किए थे। हालांकि येव के दावे की पुष्टि के लिए स्वतंत्र रूप से कोई डेटा उपलब्ध नहीं है।

 

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इस बीच, चीन ने परमाणु परीक्षण के दावों को खारिज किया। अमेरिका स्थित चीनी दूतावास ने कहा कि परमाणु परीक्षण का दावा पूरी तरह से निराधार है। अमेरिका दोबारा परमाणु परीक्षण शुरू करने की खातिर बहाना तैयार कर रहा है। 

क्या है डीकपलिंग तकनीक?

क्रिस्टोफर येव का मानना है कि चीन ने डीकपलिंग तकनीक से अपने परमाणु परीक्षण को दुनिया की नजर से छिपाया है। इस तकनीक के तहत एक अंडरगाउंड गुफा में एक उपकरण के अंदर परमाणु धमाका कराया जाता है। उपकरण में धमाका होने के कारण आसपास की धरती की चट्टानों को कम तीव्रता के झटके लगते हैं। जब चट्टानों पर कम झटके लगते हैं तो भूकंपीय सेंसर भी इन्हें कम तीव्रता में ही रिकॉर्ड करते हैं। नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज, इंजीनियरिंग एंड मेडिसिन के मुताबिक इस बचाव तकनीक को डीकपलिंग कहा जाता है। वहीं भूकंपीय संकेत में होने वाली कमी की सीमा को डीकपलिंग फैक्टर कहते हैं।

 

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चीन के पास कितने परमाणु हथियार?

पेंटागन की रिपोर्ट के मुताबिक चीन के पास  600 से अधिक परमाणु हैं। 2030 तक यह संख्या 1000 से अधिक हो जाएगी। 1996 में चीन ने परमाणु परीक्षण पर प्रतिबंध लगाने वाले संधि पर हस्ताक्षर किया। इसके बाद से ही उसने कोई भी भूमिगत परीक्षण न करने की बात कही। अमेरिका भी इस संधि पर हस्ताक्षर कर चुका है। उसने 1992 में अपना आखिरी भूमिगत परमाणु परीक्षण किया था।