वेनेजुएला, ग्रीनलैंड, कनाडा और ईरान, डोनाल्ड ट्रंप की जुबान पर ये नाम चढ़े हुए हैं। वेनेजुएला का नियंत्रण डोनाल्ड ट्रंप ने अपने हाथ में लिया है, ग्रीनलैंड पर उनके तेवर सख्त हैं और कनाडा को धमकाते रहते हैं। डोनाल्ड ट्रंप का नया निशाना ईरान है, जिसके सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामेनेई को वह सत्ता से हटाना चाहते हैं। डोनाल्ड ट्रंप खुलकर कह रहे हैं कि अगर ईरान ने प्रदर्शनकारियों का दमन जारी रखेगा तो अमेरिका, ऐसी चोट देगा, जो ईरान को भीतर तक चुभेगी।
डोनाल्ड ट्रंप के उत्साहित होने की एक वजह यह भी है कि हाल ही में अमेरिकी सेना ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को राजधानी काराकास से अगवा किया है। 3 जनवरी को अमेरिकी सेना राष्ट्रपति के आधारिक आवास में घुसी, काराकास में 7 जगहों पर भीषण हवाई हमले किए और राष्ट्रपति को उनकी पत्नी सिलिया फ्लोर्स के साथ अगवा कर लिया। वेनेजुएला के इतिहास में यह सबसे भयावह घटना रही। दुनिया के कई बड़े देशों ने डोनाल्ड ट्रंप के इस फैसले की आलोचना की है।
यह भी पढ़ें: क्या है डीप स्टेट, कैसे करता है काम; ट्रंप अब क्या उसके कब्जे में?
वेनेजुएला जैसा ईरान का अंजाम चाहते हैं ट्रंप
इतिहास में ऐसी तारीखें कम हैं, जब किसी संप्रभु देश के मौजूदा राष्ट्राध्यक्ष को ही उनके देश से, कोई दूसरे देश की सेना अगवा करके फरार हो जाए। किसी देश के राष्ट्रपति को दूसरे देश की अदालत में मुजरिमों की तरह रखा जाए और वहां आपराधिक मुकदमे का सामना करना पड़े। निकोलस मादुरो के साथ यही हो रहा है, वह ईरान के सबसे बड़े नेता अयातुल्ला खामेनेई के साथ यही करना चाहते हैं।
ईरान की सैन्य ताकत पर अमेरिका की 'डिफेंस इंटेलिजेंस एंजेसी' ने साल 2019 में एक रिपोर्ट तैयार की थी। रिपोर्ट में ईरान की सैन्य ताकत का लोहा, अमेरिका ने खुद माना था। ईरान, किसी एक मोर्चे पर किसी देश से नहीं लड़ता। उसकी सुरक्षा का स्तर पर बहुस्तरीय है। समुद्र से हवा तक, ईरान की ताकत ऐसी है कि येरुशलम तक हमला करने में सक्षम है। मध्य पूर्व में अमेरिका का इकलौता सबसे ताकतवर सहारा इजरायल है। इजरायल के लिए सबसे बड़ा खतरा ईरान है।
यह भी पढ़ें: 'इजरायल और ईरान होंगे दोस्त लेकिन'... अब नेतन्याहू ने कौन सी भविष्यवाणी की?
क्या ट्रंप ऐसा कर सकते हैं? क्या इजरायल के साथ मिलकर दोगुने ताकत के साथ डोनाल्ड ट्रंप, अयातुल्ला खामेनेई को अगवा कर सकते हैं?
खामेनेई पर खीझ सकते हैं ट्रंप लेकिन...
अमेरिकी सैनिकों ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति भवन पर 2 जनवरी की रात को अंधेरे में हमला किया। निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सीलिया फ्लोरेस को अमेरिका ने अगवा कर लिया। अमेरिका उन्हें कैदियों की तरह रख रहा है। वेनेजुएला की संप्रभुता को डोनाल्ड ट्रंप ने ताक पर रख दिया। अमेरिका निकोलस मादुरो को राष्ट्रपति नहीं नार्को टेररिस्ट मानता है। वेनेजुएला की सेना तक नहीं है। क्यूबा वेनेजुएला का सबसे करीबी राजनीतिक और सुरक्षा सहयोगी रहा है।
क्यूबा के सुरक्षा सलाहकार वेनेजुएला के खुफिया तंत्र और राष्ट्रपति की सुरक्षा में अहम भूमिका निभाते रहे हैं। वहीं वेनेजुएला की आंतरिक सुरक्षा'नेशनल बोलिवेरियन आर्म्ड फोर्सेस'और 'बोलिवेरियन मिलिशिया' करती रही है। वेनेजुएला की खुद की सेना बेहद कमजोर है।
ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामेनेई को पूरी दुनिया राष्ट्राध्यक्ष मानती है। उन्हें राजनायिक सुरक्षा हासिल है। वह ईरान के सर्वोच्च नेता हैं। ईरान में उनकी सुरक्षा बहुस्तरीय है। ईरान की सेना, IRGC, कई प्रॉक्सी सेनाएं उनकी हिफाजत में रहती हैं। वहां तक बिना ईरान की मर्जी के पहुंचना अमेरिका के लिए भी असंभव है।
यह भी पढ़ें: 'इजरायल और अमेरिका को बख्शेंगे नहीं,' ईरान की धमकी, मिडिल ईस्ट में तबाही तय है?
अयातुल्ला खामेनेई अपने आधिकारिक निवास 'बेयत-ए-रहबरी' में रहते हैं। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स की यूनिट 'सेपाह-ए वली-ए-अम्र' खामेनेई की हिफाजत करती है। इस यूनिट में 12,000 कमांडो हैं, जिनके सिर पर सुप्रीम लीडर की व्यक्तिगत सुरक्षा की जिम्मेदारी है। अयातुल्ला खामेनेई के आवास की हिफाजत में एंटी-एयरक्राफ्ट सिस्टम तैनात है। साल 2025 में इजरायल ने तेहरान में हमला किया था, जिसके बाद इस आवास की सुरक्षा और बढ़ा दी गई है। अमेरिकी सैनिक यहां सीधे पहुंच ही नहीं सकते हैं। अमेरिका के लिए तेहरान में घुसकर ऑपरेशन को अंजाम देना लगभग नामुमकिन है। ईरान पर जरा सा हमला युद्ध की शक्ल ले सकता है, जिसका खामियाजा इजरायल, अमेरिका और इन देशों के सहयोगियों को भुगतना पड़ सकता है।
अमेरिकी 'डिफेंस इंटेलिजेंस एंजेसी' के हवाले से समझिए कितनी ताकतवर है ईरान की आर्मी-
टॉप 16 सैन्य शक्तियों में शामिल है ईरान: ग्लोबल फायरपावर इंडेक्स की रिपोर्ट बताती है कि ईरान को दुनिया के 145 देशों में से 16वें स्थान पर है। ईरान टॉप 20 ताकतवर देशों में शुमार है। मध्य-पूर्व में ईरान का दबदबा ईरान के बाद दूसरे नंबर पर है।
- ईरान एक, सेना अनेक: डिफेंस इंटेलिजेंस एंजेसी (DIA) बताती है कि ईरान में दो तरह की सेना है। एक सेना सीमा की हिफाजत करती है, दूसरी इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) है। यह देश और इस्लामी क्रांति दोनों की हिफाजत करती है। दोनों के पास अपनी-अपनी थल सेना, नौसेना और वायुसेना है। ईरान में 6 लाख से ज्यादा सक्रिय सैनिक हैं।
- बैलिस्टिक मिसाइलें: डिफेंस इंटेलिजेंस एंजेसी की रिपोर्ट बताती है कि ईरान ने अपनी सैन्य रणनीति में बैलिस्टिक मिसाइलों पर बहुत जोर दिया है। मध्य पूर्व में इसकी मिसाइल फोर्स सबसे बड़ी है, जिसमें 300 से 2000 किलोमीटर तक मार करने वाली छोटी और मध्यम दूरी की मिसाइलें शामिल हैं। ये मिसाइलें इजराइल, सऊदी अरब और अमेरिकी सैन्य अड्डों तक पहुंच सकती हैं।
- समंदर में बेहद ताकवर है ईरान: DIA रिपोर्ट में अमेरिका मानता है कि ईरान की नई मिसाइलें अब ज्यादा सटीक और घातक हो रही हैं। जहाजों पर मार करने वाली एंटी-शिप बैलिस्टिक मिसाइलें ईरान विकसित कर चुका है। समुद्र में ईरान असममित युद्ध रणनीति अपनाता है। IRGC नेवी के पास सैकड़ों छोटी-तेज नावें, नौसैनिक माइंस, छोटी पनडुब्बियां और तटीय मिसाइलें हैं। इनकी मदद से ईरान होर्मुज स्ट्रेट को कभी भी बंद कर सकता है।
- स्वार्म अटैक का बेताज बादशाह: DIA रिपोर्ट बताती है कि ईरान, समुद्री मोर्चे पर स्वार्म अटैक कर सकता है। अगर अमेरिका को भी समुद्र में व्यापार करना है तो ईरान से युद्ध के मोर्चे पर लड़कर नहीं किया जा सकता है। फारस और ओमान की खाड़ी में अमेरिका और ईरान के हित टकरा सकते हैं। अगर यहां टकराव हुआ तो ईरान की वजह से दुनिया में तेल संकट पैदा हो सकता है। यहां से ही स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से दुनिया का 20 फीसदी तेल गुजरता है। तनाव की स्थिति में ईरान ने इसे बंद किया तो वैश्विक ऊर्जा संकट पैदा हो सकता है। ईरान अपनी छोटी मिसाइल नौकाओं, ड्रोन्स और समुद्री बारूदी सुरंगों से किसी को तबाह करने में सक्षम है। जंग सिर्फ खाड़ी देशों तक नहीं रहेगा, लाल सागर तक फैल सकता है। अरब देशों में अमेरिकी ठिकाने ईरान के निशाने पर आ सकते हैं।
- प्रॉक्सी युद्ध में ईरान का कोई सानी नहीं है: ईरान सीधे बड़े युद्ध की बजाय प्रॉक्सी फोर्स के जरिए लड़ना पसंद करता है। ईरान के पास लेबनान में हिजबुल्लाह है, यमन में हूती विद्रोही हैं, इराक में शिया मिलीशिया है, फिलिस्तीन में हमास और दूसरे विद्रोही गुट हैं, जिन पर ईरान खूब पैसे खर्च करता है। ईरान ईसी नीति से इजरायल और अमेरिका पर हमेशा दबाव बनाए रखता है। खुद युद्ध में इजरायल नहीं उलझता लेकिन इजरायल और अमेरिका की नजरों में खटकता रहता है।
ईरान से परेशान देश कौन से हैं?
ईरान सीधी जंग लड़ने वाला देश नहीं है। पारंपरिक युद्ध में उसका भरोसा भी नहीं है। वह दुश्मन को तीखा धाव देने के लिए बदनाम रहा है। ईरान की ताकत उसकी मिसाइलें, छोटी नौसेना, ड्रोन और प्रॉक्सी ग्रुप्स हैं, जिनकी वजह से अमेरिका, इजरायल और सऊदी अरब परेशान रहते हैं।
ईरान से चिढ़ा क्यों रहता है अमेरिका?
अमेरिका साल 1979 की इस्लामी क्रांति पचा नहीं पाया है। क्रांति से पहले, ईरान में शाह मोहम्मद रजा पहलवी के हाथ में ताकत थी। उन्हें निर्वासित किया गया, उनका परिवार अमेरिका में शरणार्थी है। शाह के बेटे निर्वासित प्रिंस रजा पहलवी को सत्ता में लाने की मांग ईरान के क्रांतिकारी कर रहे हैं। शाह मोहम्मद रजा पहलवी उदार शासक थे, पश्चिम की संस्कृति उन्हें पसंद थी। ईरान और अमेरिका इस जमाने तक एक-दूसरे के सहयोगी थे।
80 के दशक के बाद ईरान, यूरोप और अमेरिका को खटकने लगा। ईरान परमाणु संवर्धन पर काम करता है। अमेरिका ईरान को परमाणु हथियार विकसित करने से रोकना चाहता है क्योंकि यह इजरायल और खाड़ी देशों के लिए अस्तित्व के खतरा की तरह है। ईरान हमास, हिजबुल्लाह और हूती जैसे समूहों का समर्थन करता है। मध्य पूर्व में अमेरिकी दखल को कमजोर करता है। अमेरिका को यह बात अखरती है।
ईरान की कमजोर कड़ी जिससे वाकिफ है अमेरिका
ईरान की इकलौती कमजोर कड़ी है वायुसेना। ईरान की हवाई ताकत अभी कमजोर है। ईरान के पास पुराने अमेरिकी विमान हैं। ईरान आज भी F-14, F-4 और F-5 से काम चला रहा है, जिसके अपडेशन के लिए अमेरिका राजी नहीं होता है। ईरान के पास बहुत पिछड़े, रूसी विमान हैं। अमेरिका ने खुद माना है कि ईरान इन कमजोरियों के बाद भी ड्रोन क्षमता विकसित कर रहा है। ईरान बेहतर निगरानी भी जानता है, हमला करना भी जानता है। ईरान का एयर डिफेंस सिस्टम में रूस के S-300 हैं, ईरान ने खुद कई मिसाइलें बनाई हैं। रूस और चीन के साथ ईरान लगातार हथियारों की सौदेबाजी कर रहा है।
ईरान को लेकर अमेरिका का सबसे बड़ा डर क्या है?
ईरान की सेना इतनी सक्षम है कि 7 मोर्चे पर हमेशा से इजरायल के लिए खतरा रही है। लेबनॉन में ईरान की प्रॉक्सी सेना हिजबुल्लाह कहा जाता है। लेबनॉन इजरायल की उत्तरी सीमा पर है। इजरायल के दक्षिण में गाजा है। हमास को भी ईरान पालता-पोसता रहा है। सीरिया में ईरानी सैन्य ठिकाने हैं। अमेरिका और इजरायल, दोनों के लिए यहां चुनौती रही है। यमन में हूती विद्रोही हैं। लाल सागर में इजरायल के लिए हमेशा चुनौती रही है। इसे भी ईरान पालता रहा है। इराक में ईरान समर्थक शिया मिलिशिया समूहों हैं, जो इजरायल पर ड्रोन हमलों और खुफिया ऑपरेशनों के जरिए दबाव बनाते रहे हैं। वेस्ट बैंग में इजरायल कई सक्रिय उग्रवादी समूहों से जूझता रहा है। ये गुट, ईरान की प्रॉक्सी आर्मी कहलाती रही है। यहां ईरान खूब पैसे खर्च करता है।
ईरान ने जब इजरायल और अमेरिका की बोलती बंद की
जून 2025 में ईरान-इजरायल के बीच करीब 12 दिनों की भीषण जंग ठनी थी। इजरायल ने ईरान के परमाणु, मिसाइल और सैन्य ठिकानों पर हमले किए। इजरायल, ईरान के परमाणु कार्यक्रमों के खिलाफ था, उन्हें रोकना चाहता था। ईरान अपने यूरेनियम संवर्धन प्रोजेक्ट को बढ़ावा दे रहा था। यह हमला अमेरिका के इशारे पर हुआ था। ईरान ने जवाब में इजरायल पर सैकड़ों बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं।
अमेरिकी और इजरायली डिफेंस सिस्टम को हमले रोकने में आंशिक कामयाबी मिली। 22 जून को ईरान के तीन प्रमुख परमाणु साइट, फोर्डो, नतांज, इस्फहान के बंकरों को इजरायल और अमेरिका ने तबाह किया। ईरान ने कतर में अमेरिकी एयरबेस पर हमला किया। ईरान की मिसाइलें इजरायल की राजधानी येरुशलम तक गईं। भीषण तबाही मची। आनन-फानन में ट्रंप ने 24 जून को युद्ध विराम का एलान किया। दावा था कि अयातुल्ला खामेनेई के ठिकानों को डोनाल्ड ट्रंप जान रहे हैं, वह अमेरिका की जद में हैं। डोनाल्ड ट्रंप के दावों का माखौल उड़ा। जंग में ईरान की सामरिक जीत मानी गई।
