सऊदी अरब अपने सैन्य साजो-सामान पर पानी की तरह पैसा बहाता है। तुर्की और अमेरिकी एयर डिफेंस सिस्टम को तैनात कर रखा है। पाकिस्तान भी हवाई हमलों से रक्षा करने मदद कर रहा है। बावजूद इसके रियाद यमन के हूती विद्रोहियों के हमलों को रोकने में असमर्थ दिख रहा है। पिछले हफ्ते सऊदी अरब को जंग में सबसे अधिक नुकसान उठाना पड़ा। 

 

हूती विद्रोहियों ने दुनिया की सबसे बड़ी तेल कंपनी अरामको के मुख्यालय और संयंत्रों के अलावा रियाद के किंग खालिद एयरपोर्ट पर भीषण हमला करके सऊदी अरब को हैरत में डाल दिया। उसकी सैन्य तैयारियों की पोल खोल दी। तमाम एयर डिफेंस सिस्टम की कमियों को उजागर कर दिया। 

 

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हूतियों ने मध्य-पूर्व ही नहीं, बल्कि वैश्विक पटल पर रियाद को अलग-अलग कर दिया। तुर्की और पाकिस्तान पिछले दो महीने में कई बार मक्का पैक्ट सक्रिय होने का दावा कर चुके हैं। लेकिन हूतियों के खिलाफ उनका भी कोई असर नहीं दिख रहा है। रियाद में सफल हमलों ने किंगडम की रक्षा करने के तुर्की के दावों का दम निकाल दिया है।

 

हूती विद्रोहियों के पास कोई सैन्य प्रशिक्षण नहीं है। उनके पास उन्नत साजो-सामान नहीं है। ईरान को छोड़कर किसी अन्य देश से मदद भी नहीं मिलती है। यह किसी देश की सेना नहीं, बल्कि मिलिशिया संगठन है। अब सवाल उठता है कि सैन्य रूप से कई गुना ताकत रखने वाला सऊदी अरब एक संगठन के हवाई हमलों को रोकने में कैसे नाकाम साबित हो रहा है। इसके पीछे की वजह क्या है?

 

इजरायल से मिला अनुभव: हूती विद्रोहियों ने अपने सहयोगी ईरान से क्रूज और बैलेस्टिक मिसाइलों के अलावा लंबी दूरी के ड्रोन को हासिल किया। उनकी कुछ मिसाइलें हवा में दिशा बदलने की ताकत रखती हैं। ऐसी मिसाइल बेहद घातक होती हैं और इन्हें रोकना इतना आसान नहीं होता है।

 

गाजा युद्ध के खिलाफ हूती विद्रोहियों ने इजरायल पर सैकड़ों मिसाइलों से कई बार हमला किया। इजरायल की आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम ने इनमें से कई मिसाइलों और ड्रोनों को रोक दिया, लेकिन कुछ अपने लक्ष्य पर लगने में सफल रहीं। पिछले साल एक हूती मिसाइल इजरायल के बेन गुरियन एयरपोर्ट पर गिरी थी। इसमें एक शख्स की जान गई थी। हूती विद्रोहियों की इस क्षमता ने इजरायल को हैरत में डाल दिया था। ऐसी उन्नत मिसाइल को जब इजरायल नहीं रोक पाया तो रियाद के लिए यह काम बेहद ही मुश्किल है।

 

इंटरसेप्टर मिसाइल की कमी: सऊदी अरब के पास अमेरिका के पैट्रियट और थाड एयर डिफेंस सिस्टम हैं। ईरान के साथ अमेरिकी युद्ध के कारण मिसाइल इंटरसेप्टर की कमी आई है। अमेरिका भी इस कमी से जूझ रहा है। सऊदी अरब की अधिकांश वायु रक्षा अमेरिकी हथियारों पर ही निर्भर है। सऊदी अधिकारियों ने भी इंटरसेप्टर की कमी का मुद्दा वाशिंगटन के सामने उठाया है। ईरान युद्ध ने यह भी साबित किया है कि अमेरिकी एयर डिफेंस सिस्टम इतने भी करगर नहीं हैं, जितना उनके बारे में बताया जाता है। मध्य-पूर्व में अमेरिका को भारी नुकसान का सामना करना पड़ा। जॉर्डन में उसके एयर डिफेंस सिस्टम ईरानी मिसाइल को रोकने में विफल रहे।

 

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भौगोलिक चुनौती: सऊदी अरब का भूभाग विशाल क्षेत्र में फैला है। उसके तेल संयंत्र भी अलग-अलग क्षेत्रों में है। अधिकांश क्षेत्र रेगिस्तानी है। ऐसे में हर जगह एयर डिफेंस सिस्टम की तैनाती आसान नहीं है। इसके अलावा पूरे भूभाग को कवर एयर डिफेंस से कवर करना भी संभव नहीं है। तीन दिशाओं से उसे चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। उत्तर में ईरान ने इसी साल उस पर 1000 से अधिक ड्रोन और मिसाइलों से हमला किया। दक्षिण में हूती विद्रोही सबसे बड़ी चुनौती बने हैं। पश्चिम में इराक में ईरान समर्थित मिलिशिया तेल पाइपलाइन पर हमला कर चुके हैं। ऐसी स्थिति में रियाद के लिए पूरे भूभाग की रक्षा करना संभव नहीं है।

 

ईरान का अनुभव: विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका के एयर डिफेंस को चकमा देने का अनुभव युद्ध में ईरान ने हासिल किया। अब यही अनुभव हूती विद्रोहियों के काम आ रहा है। विद्रोहियों ने पिछले 10 दिन में रियाद के किंग खालिद एयरपोर्ट पर तीन बार सफल हमलों को अंजाम दिया। करीब 20 लोगों की जान गई और 400 से अधिक लोग हताहत हुए।