सर्दियों के मौसम में पत्तेदार साग-सब्जियां खाई जाती हैं। हरी-सब्जियां सेहत के लिए बहुत फायदेमंद होती है। इन्हीं हर सब्जियों में से एक पत्तागोभी भी है। पत्तागोभी की लोग सब्जी खाते हैं। इसके अलावा फास्ट फूड के व्यंजनों को बनाने में भी इसका खूब इस्तेमाल होता है। इस सब्जी में एक प्रकार का कीड़ा पाया जाता है जो दिमाग का नुकसान पहुंचा सकता है। दिमाग में इस कीड़े की वजह से जो बीमारी होती है उसे न्यूरोसिस्टीकोर्सिस कहा जाता है। कई बार आपने सुना होगा कि दिमाग में इस कीड़े की वजह से लोगों की मौतें भी हो जाती हैं। 

 

पत्तागोभी का कीड़ा कितना खतरनाक है? यह कीड़ा दिमाग में कैसे पहुंचता है? इसके बारे में हमने दिल्ली के श्री बालाजी एक्शन मेडिकल इंस्टिट्यूट के न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. राजुल अग्रवाल  से बात की।

 

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टेपवर्म क्या होता है और यह शरीर में क्या करता है?

 

टेपवर्म एक प्रकार का पैरासाइट होता है जो इंसान की आंतों में जाकर लंबे समय तक रह सकता है। यह कीड़ा शरीर के पोषक तत्वों को चूसता है जिससे कमजोरी, वजन कम होना और एनीमिया जैसी समस्याएं हो सकती हैं। टेपवर्म की कई किस्में होती हैं लेकिन टीनिया सोलियम सबसे खतरनाक मानी जाती है। कई बार मरीज को पता भी नहीं चलता कि उसके शरीर में यह कीड़ा मौजूद है लेकिन जब इसके अंडे शरीर में फैलते हैं तब यह गंभीर बीमारी का रूप ले सकता है।

 

ये कीड़े दिमाग तक कैसे पहुंच जाते हैं?

 

जब टेपवर्म के अंडे किसी तरह मुंह के जरिए शरीर में चले जाते हैं, जैसे गंदा पानी पीने से, ठीक से न धुली सब्जी खाने से या शौच के बाद हाथ न धोने से, तो ये अंडे आंत में जाकर लार्वा में बदल जाते हैं। इसके बाद ये लार्वा खून के रास्ते शरीर के अलग-अलग अंगों तक पहुंच सकते हैं जिनमें दिमाग भी शामिल है। दिमाग में पहुंचने पर यह स्थिति न्यूरोसिस्टिसर्कोसिस कहलाती है जो मिर्गी और अन्य न्यूरोलॉजिकल समस्याओं की बड़ी वजह बन सकती है।

 

क्या ये कीड़े सिर्फ दिमाग को ही नुकसान पहुंचाते हैं?

 

नहीं, टेपवर्म के लार्वा सिर्फ दिमाग तक सीमित नहीं रहते। ये आंखों, मांसपेशियों, त्वचा के नीचे, फेफड़ों और कभी-कभी दिल के आसपास भी गांठ बना सकते हैं। आंख में पहुंचने पर नजर कमजोर हो सकती है या अंधापन भी हो सकता है। मांसपेशियों में दर्द और सूजन हो सकती है। लेकिन जब ये दिमाग में पहुंचते हैं, तब खतरा सबसे ज्यादा होता है, क्योंकि इससे मिर्गी के दौरे, दिमाग में सूजन और दबाव बढ़ने जैसी गंभीर स्थितियां पैदा हो सकती हैं।

 

 

क्या सिर्फ पत्तागोभी में होते हैं ये कीड़े?

 

पत्तागोभी या अन्य पत्तेदार सब्जियों में कभी-कभी छोटे कीड़े या पैरासाइट के अंडे पाए जा सकते हैं लेकिन सीधे यह कहना कि पत्तागोभी में टेपवर्म ही होता है पूरी तरह सही नहीं है। टेपवर्म आमतौर पर इंसानों में दूषित पानी, गंदे हाथों या अधपका मांस खाने से जाता है। हां, अगर पत्तागोभी खेत से सीधे लाई गई हो उस पर मिट्टी, गंदा पानी या मानव मल का संपर्क रहा हो और उसे ठीक से साफ न किया जाए तो संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है। सही तरीके से धोने और पकाने पर खतरा बहुत कम हो जाता है।

 

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दिमाग में कीड़े होने के लक्षण क्या होते हैं?

 

दिमाग में कीड़े होने के लक्षण मरीज और कीड़े की संख्या पर निर्भर करते हैं। सबसे आम लक्षण अचानक मिर्गी का दौरा पड़ना है, खासकर उस व्यक्ति में जिसे पहले कभी दौरा न पड़ा हो। इसके अलावा तेज और लगातार सिरदर्द, उल्टी, चक्कर आना, नजर धुंधली होना, हाथ-पैर में कमजोरी या सुन्नपन और कभी-कभी व्यवहार व याददाश्त में बदलाव भी देखने को मिलते हैं। कुछ मामलों में मरीज बेहोश भी हो सकता है। ऐसे लक्षण दिखें तो तुरंत न्यूरोलॉजिस्ट से संपर्क जरूरी है।

 

 

क्या सिर्फ पत्तागोभी खाने से दिमाग में कीड़े चले जाते हैं?


नहीं, सिर्फ पत्तागोभी खाने से दिमाग में कीड़े चले जाना बहुत ही दुर्लभ है। असल समस्या पत्तागोभी नहीं, बल्कि खराब हाइजीन और साफ-सफाई की कमी है। अगर कोई व्यक्ति गंदा पानी पीता है, खुले में शौच करता है, हाथ धोने की आदत नहीं है या कच्ची सब्जियां बिना ठीक से धोए खाता है, तब खतरा बढ़ता है। पत्तागोभी सहित कोई भी सब्जी अगर अच्छी तरह धोकर और पकाकर खाई जाए, तो टेपवर्म संक्रमण का जोखिम लगभग न के बराबर रह जाता है।

 

दिमाग के कीड़े का इलाज क्या है?

 

दिमाग में कीड़े का इलाज संभव है और ज्यादातर मामलों में दवाओं से ही ठीक हो जाता है। इलाज में कीड़े मारने की दवाएं, दिमाग की सूजन कम करने की दवाएं और मिर्गी के दौरे रोकने की दवाएं दी जाती हैं। इलाज कई हफ्तों या महीनों तक चल सकता है, इसलिए मरीज को धैर्य रखना पड़ता है। बहुत कम मामलों में, जब कीड़ा किसी संवेदनशील जगह पर हो या दवाओं से फायदा न मिले, तब सर्जरी की जरूरत पड़ सकती है। समय पर इलाज से मरीज सामान्य जीवन जी सकता है।

 

इससे बचने के लिए क्या सावधानियां जरूरी हैं?

 

इस बीमारी से बचाव पूरी तरह हमारी रोजमर्रा की आदतों पर निर्भर करता है। सब्जियों और फलों को अच्छे से धोकर और संभव हो तो पकाकर ही खाएं। हमेशा साफ और उबला हुआ पानी पिएं। शौच के बाद और खाने से पहले साबुन से हाथ धोना बेहद जरूरी है। खुले में शौच से बचें और अधपका मांस बिल्कुल न खाएं। बच्चों की साफ-सफाई पर खास ध्यान दें। ये साधारण से उपाय दिमाग तक पहुंचने वाले इस गंभीर संक्रमण से हमें सुरक्षित रख सकते हैं।