आजकल के लाइफस्टाइल में हम अक्सर सोने से ठीक पहले मोबाइल या लैपटॉप का इस्तेमाल करते हैं। हेल्थ एक्पर्टस की मानें तो इनसे निकलने वाली नीली जिसे हम ब्लू लाइट कहते हैं, हमारे दिमाग को यह सिग्नल देती है कि अभी दिन है। इस वजह से नींद लाने वाला हार्मोन 'मेलाटोनिन' का उत्पादन शरीर में रुक जाता है।  अब इससे न केवल आपके नींद की क्वालिटी खराब होती है बल्कि शरीर की एनर्जी खर्च करने की प्रक्रिया, मेटाबॉलिज्म भी धीमी पड़ जाती है। 

 

हार्वर्ड मेडिकल स्कूल और वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन (WHO) से जुड़ी विभिन्न रिसर्च में यह पाया गया है कि नींद की कमी सीधे तौर पर 'घ्रेलिन' जो कि हमारे शरीर में भूख लगने वाले हार्मोन है, को बढ़ाता है और 'लेप्टिन' जो कि पेट भरने का अहसास कराने वाला हार्मोन है, उसको कम करती है। जब आप देर रात तक स्क्रीन देखते हैं, तो आपको बेवजह की भूख या लेट नाइट क्रेविंग लगती है, जो अक्सर हाई-कैलोरी स्नैक्स के रूप में मोटापे का कारण बनती है।

 

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रिसर्च और वैज्ञानिक आधार

कई प्रतिष्ठित संस्थानों की स्टडीज इस बात की पुष्टि करती हैं कि डिजिटल स्क्रीन वजन बढ़ाने में सहायक का काम करती हैं। हमारी बॉडी क्लॉक जिसे मेडिकल भाषा में सर्कैडियन रिदम कहते हैं, स्क्रीन की रोशनी से भ्रमित हो जाती है। जब शरीर को लगता है कि दिन है, तो वह फैट बर्निंग मोड की जगह फैट स्टोरेज मोड में चला जाता है।

  • नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी की स्टडी: शोधकर्ताओं ने पाया कि रात में नीली रोशनी के संपर्क में आने से इंसुलिन रेजिस्टेंस बढ़ जाता है, जिससे शरीर ग्लूकोज को सही से प्रोसेस नहीं कर पाता और फैट जमा होने लगता है।
  • नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ (NIH): इनकी एक रिसर्च के अनुसार, जो लोग बेडरूम में लाइट या स्क्रीन चलाकर सोते हैं, उनमें वजन बढ़ने की संभावना उन लोगों की तुलना में 17% ज्यादा होती है जो अंधेरे में सोते हैं।

 

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कैसे कर सकते हैं बचाव?

  • डिजिटल डिटॉक्स: सोने से कम से कम 60 मिनट पहले सभी डिजिटल आइटम से खुद को दूर कर दें।
  • ब्लू लाइट फिल्टर: अगर काम करना जरूरी हो, तो डिवाइस में 'नाइट मोड' या ब्लू लाइट फिल्टर का उपयोग करें।
  • बेडरूम का नियम: अपने बेडरूम को सिर्फ सोने के लिए रखें, वहां टीवी या लैपटॉप का स्टैंड न बनाएं।
  • किताबें पढ़ें: फोन की जगह फिजिकल बुक पढ़ने की आदत डालें, इससे मेलाटोनिन बढ़ता है और गहरी नींद आती है।