यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है। कई याचिकाओं पर गुरुवार को सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि 2012 में जारी किए गए नियम ही लागू रहेंगे। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि प्राथमिक तौर पर ये प्रावधान अस्पष्ट हैं और इनका दुरुपयोग किया जा सकता है। कई याचिकाकर्ताओं ने इन नियमों को विभाजनकारी, भेदभाव पैदा करने वाले और संविधान के खिलाफ बताया था। इन लोगों का तर्क था कि ये नियम UGC ऐक्ट, 1956 के भी खिलाफ हैं।

 

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिए हैं कि वह नए नियम बनाए, तब तक ये नियम लागू नहीं किए जाएंगे। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाला बागची की बेंच ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए कहा कि अगर अदालत इस मामले में हस्तक्षेप नहीं करेगी तो इसके गंभीर परिणाम होंगे और समाज में विभाजन हो जाएगा।

 

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19 मार्च को होगी अगली सुनवाई

 

याचिकाकर्ताओं की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए वकील विष्णु शंकर ने कहा है, 'सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी रेगुलेशन को चुनौती देने वाली हमारी रिट पिटीशन पर सुनवाई की। सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के इन रेगुलेशन पर रोक लगा दी है और निर्देश दिए हैं कि अगले फैसले तक यूजीसी रेगुलेशन्स 2012 को ही लागू रखा जाए। इस मामले पर अगली सुनवाई 19 मार्च को होगी।'

 

 

 

सुप्रीम कोर्ट ने क्या-क्या कहा?

 

इस बेंच का कहना है, 'इस रेगुलेशन की भाषा अस्पष्ट है और यह जरूरी है कि एक्सपर्ट इसकी जांच करके यह तय करें कि इसका दुरुपयोग न किया जा सके।' सुप्रीम कोर्ट ने भी इस रेगुलेशन की धारा 3 (C) और 3 (E) की चर्चा की। धारा 3 (C) में 'जातिगत भेदभाव' का जिक्र है और इसमें उन लोगों के खिलाफ भेदभाव कवर किए जाएंगे जो ओबीसी या SC-ST जातियों से आते हैं। इसी तरह धारा 3 (E) में 'भेदभाव' का जिक्र किया गया है।

 

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सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि धारा 3 (C) के चलते अगड़ी जातियों के लोग भेदभाव से जुड़ी शिकायत ही नहीं कर पाएंगे। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी पूछा कि जब धारा 3(E) मौजूद है तो धारा 3 (C) का क्या मतलब है?  

 

बुरी तरह घिर गई मोदी सरकार

 

इस मुद्दे पर सवर्ण जातियों के छात्र काफी मुखर नजर आ रहे थे। सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के ही कई नेताओं ने इसके खिलाफ अपनी सरकार को घेरना शुरू कर दिया था। उत्तर प्रदेश के एक पीसीएस अधिकारी अलंकार अग्निहोत्री ने इसके अलावा कई अन्य आरोप लगाते हुए अपनी नौकरी से ही इस्तीफा दे दिया था। बीजेपी के भी कई पदाधिकारियों ने इस फैसले के चलते अपनी पार्टी की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था।

 

कई विधायकों और अन्य पदाधिकारियों ने भी पार्टी फोरम पर इसके खिलाफ आवाज उठाई थी और उनका कहना था कि इससे सवर्ण जातियों के छात्रों का नुकसान होगा और फर्जी मामलों में फंसाए गए तो उनका करियर भी बर्बाद हो सकता है। हालांकि, बीजेपी इस पर चुप नजर आ रही थी। इसकी बड़ी वजह यह थी कि दलित और ओबीसी जातियों के लोग इस नियम के समर्थन में खड़े होते नजर आ रहे थे।