भारतीय प्रशासनिक सेवा से इस्तीफा देकर नेता बनने के सफर पर निकलीं दिव्या मित्तल रविवार को मिर्जापुर पहुंचीं। उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर में वह जिलाधिकारी रही हैं और अपने कुछ कामों के लिए यहीं से वह मशहूर भी हुई थीं। अब इसी बात की सबसे ज्यादा चर्चा है कि वह इसी जिले से अपनी राजनीतिक पारी की भी शुरुआत कर सकती हैं। जिस तरह से उन्होंने इस्तीफा देकर व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं, उससे माना जा रहा है कि वह सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के खिलाफ हैं। ऐसे में अगर वह निर्दलीय ही चुनाव लड़ने का मन बनाती हैं तो चर्चा है कि समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस का गठबंधन उनका समर्थन कर दे। इसकी एक बड़ी वजह है कि विधानसभा और लोकसभा चुनाव दोनों में ही इन दोनों दलों की दाल इस जिले में नहीं गल रही है।

 

माहौल दूसरे पक्ष में ना चला जाए इसलिए रविवार को दिव्या मित्तल के स्वागत में तमाम दलों के नेता मौजूद रहे। रोचक बात है कि बीजेपी के भी कुछ नेता दिव्या मित्तल का स्वागत करते दिखे। विंध्याचल में दर्शन के बाद दिव्या मित्तल ने कहा कि वह नवरात्रि में ही अपने अगले कदम का एलान करेंगी। वह 9 दिन तक नवरात्रि में ही रहने वाली हैं।

सपा-कांग्रेस क्यों दे सकती हैं साथ?

अगर लोकसभा और विधानसभा सीटों का हाल देखें तो 2014 से ही मिर्जापुर लोकसभा सीट पर नेशनल डेमोक्रैटिक अलायंस (NDA) का कब्जा है। कभी यहीं से फूलन देवी को जिताने वाली सपा पिछले दो चुनावों से एक भी सीट जीत पाने में सफल नहीं हो पाई है। कांग्रेस में रहे ललितेश पति त्रिपाठी भी तमाम कोशिशें कर चुके हैं। वह विधानसभा और लोकसभा दोनों का चुनाव हारने के बाद अब ममता बनर्जी के साथ हैं। 2024 में वह भदोही से लोकसभा का चुनाव लड़े लेकिन वहां भी जीत नहीं पाए।

 

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ऐसे में इस बात की पूरी संभावना है कि अगर दिव्या मित्तल किसी भी पार्टी में शामिल नहीं होती हैं तब भी सपा-कांग्रेस गठबंधन उनका साथ दे सकता है। पूरी संभावना है कि दिव्या मित्तल या तो निर्दलीय चुनाव लड़ेंगी या कोई नई पार्टी बनाकर उतरेंगी। इस स्थिति में सपा और कांग्रेस उस एक सीट पर दिव्या मित्तल का समर्थन कर सकती हैं। इसकी वजह है कि दिव्या मित्तल तेजतर्रार, ईमानदार और काम करवाने वाली अधिकारियों में गिनी जाती रही हैं। ऐसे में अगर उनकी साफ छवि का फायदा पूरे जिले में गठबंधन को मिलता दिखे तो इस दांव से भी राहुल गांधी और अखिलेश यादव नहीं चूकेंगे।

5 विधानसभा सीटों का क्या हाल है?

 

मौजूदा समय में मिर्जापुर की 5 में से पांच विधानसभा सीट पर एनडीए का कब्जा है। एक सीट पर अपना दल (S) का कब्जा है तो चार सीटों पर बीजेपी का कब्जा है।

छानबे (SC): अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित छानबे विधानसभा सीट पर 2017 से ही अपना दल (S) को जीत मिल रही है।

 

मिर्जापुर: मिर्जापुर सीट पर 2002 से 2017 तक सपा का कब्जा था लेकिन 2017 और 2022 में बीजेपी के रत्नाकर मिश्रा। वह बड़े अंतर से जीत रहे हैं इसलिए यह सीट दिव्या मित्तल के लिए भी मुश्किल हो सकती है।

 

मझवां: मझवां विधानसभा सीट पर भी 2017 से ही बीजेपी और एनडी का कब्जा है। 2024 में हुए उपचुनाव में भी बीजेपी ने यहां से जीत हासिल की थी।

 

चुनार: चुनार विधानसभा सीट तो लंबे समय से बीजेपी का गढ़ है। 1993 से इस सीट पर जीत रही बीजेपी को सिर्फ 2012 में हार मिली थी। 2022 में भी बीजेपी के अनुराग सिंह ने यहां बड़ी जीत हासिल की थी।

 

मड़िहान: 2008 के परिसीमन के बाद बनी इस सीट पर पहली बार तो कांग्रेस के ललितेश पति त्रिपाठी जीत गए थे लेकिन 2017 और 2022 में बीजेपी के रमा शंकर सिंह ने यहां से चुनाव जीते। यहां से भी बीजेपी ने बंपर जीत हासिल की थी।

 

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क्या है मिर्जापुर लोकसभा सीट का हाल?

कभी समाजवादी पार्टी का गढ़ बनती दिख रही मिर्जापुर लोकसभा सीट पर पहली बार फूलन देवी ने सपा का खाता खोला था। उनके निधन के बाद 2002 में राम रति बिंद भी जीते थे। 2004 के चुनाव और फिर 2007 के उपचुनाव में BSP ने जीत हासिल की थी। 2009 में फिर से सपा ने वापसी की और बाल कुमार पटेल ने जीत हासिल की है। हालांकि, 2014 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले बने बीजेपी और अपना दल (सोनेलाल) के गठबंधन के सपा की मुश्किल बढ़ा दी।

 

लगातार तीन बार से यहां से अनुप्रिया पटले चुनाव जीत रही हैं। सपा ने तीन बार में तीन उम्मीदवार बदले हैं। कांग्रेस में रहे ललितेश पति त्रिपाठी भी लगातार कोशिश करते रहे हैं लेकिन अनुप्रिया पटेल के आगे किसी की नहीं चली। हालांकि, सपा-कांग्रेस के लिए थोड़ी राहत की सांस 2024 के लोकसभा चुनाव में आई। 2019 में 2.32 लाख वोटों के अंतर से चुनाव जीतने वाली अनुप्रिया पटेल 2024 में सपा के रमेश चंद निषाद से सिर्फ 37,810 वोटों के अंतर से चुनाव जीत पाईं।

 

ऐसे में अगर दिव्या मित्तल 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले विधानसभा चुनाव में जीत जाती हैं और फिर लोकसभा का चुनाव भी लड़ती हैं तो शायद वह ऐसी उम्मीदवार हों जो अनुप्रिया पटेल को कड़ी चुनौती दें। हालांकि, अभी उनके पत्ते खुलना बाकी हैं। वह किसी भी पार्टी के साथ ना जाने की बात कह रही हैं लेकिन यह भी कहा जा रहा है कि आखिरी वक्त में अगर वह निर्दलीय भी लड़ती हैं तो सपा और कांग्रेस का गठबंधन उनका समर्थन कर सकता है।