केरल के नए मुख्यमंत्री वीडी सतीशन ने गुरुवार को पूर्ववर्ती पिनाराई विजयन सरकार पर बड़ा आरोप लगाया। इन आरोपों के बारे में जानकारी देते हुए सीएम ने बताया कि केरल की कुल बकाया देनदारियां 5.07 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो गई हैं, जबकि बकाया राशि एवं स्थगित भुगतान लगभग 49,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गए हैं। मुख्यमंत्री वीडी सतीशन वे गुरुवार को विधानसभा में पेश वित्तीय स्थिति रिपोर्ट में यह जानकारी दी है।
यह रिपोर्ट पूर्व कैबिनेट सचिव के. एम. चंद्रशेखर की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय समिति ने तैयार की है। संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ) की सरकार ने सत्ता में आने के बाद केरल की वित्तीय स्थिति पर श्वेत पत्र लाने की घोषणा की थी और इसी उद्देश्य से इस समिति का गठन किया गया था।
विकास-बुनियादी ढांचे में निवेश की क्षमता सीमित
‘केरल की वित्तीय हालत: एक स्थिति रिपोर्ट’ शीर्षक वाला यह श्वेत पत्र राज्य की वित्तीय स्थिति का गंभीर आकलन गया है। इसमें आगाह किया गया कि बढ़ता कर्ज, बढ़ती देनदारियां और भारी अनिवार्य खर्च की वजह से केरल का विकास और बुनियादी ढांचे में निवेश की क्षमता सीमित हो गई है।
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कहां जा रहा है केरल का पैसा?
रिपोर्ट के अनुसार वेतन, पेंशन और ब्याज भुगतान राज्य की कुल राजस्व प्राप्तियों का 77 प्रतिशत हिस्सा खर्च कर देते हैं जबकि केवल ब्याज भुगतान 20.9 प्रतिशत है। वहीं पूंजीगत व्यय राज्य के सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) का केवल 1.3 प्रतिशत है जो देश में सबसे कम स्तरों में से एक है। श्वेत पत्र के अनुसार, राज्य पर 5.07 लाख करोड़ रुपये की बकाया देनदारियां हैं।
केरल को विरासत में क्या मिला?
इसके अलावा नई सरकार को 21,670 करोड़ रुपये महंगाई भत्ता बकाया, 14,387 करोड़ रुपये महंगाई राहत बकाया और 3,431 करोड़ रुपये ‘बिल डिस्काउंटिंग’ व्यवस्था के तहत देनदारियां विरासत में मिली हैं। अन्य स्थगित भुगतानों सहित कुल लंबित देनदारियां कम से कम 48,733 करोड़ रुपये हैं।
आरबीआई पर निर्भरता
रिपोर्ट में इसे गंभीर वित्तीय चुनौती बताते हुए कहा गया कि लंबित भुगतान का मूल्य राज्य के वार्षिक शुद्ध उधार के लगभग बराबर है। श्वेत पत्र में कोषागार संचालन को लेकर भी चिंता जताई गई और कहा गया कि राज्य दैनिक नकदी जरूरतों को पूरा करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की आपात उधारी सुविधाओं पर अधिक निर्भर होता जा रहा है। केरल साल 2025 में 262 दिन तक ‘वेज एंड मीन्स एडवांसेज’ के तहत रहा और 84 दिन तक ‘ओवरड्राफ्ट’ स्थिति में संचालित हुआ।
रिपोर्ट में केरल अवसंरचना निवेश कोष बोर्ड (केआईआईएफबी) की कार्यप्रणाली का भी विस्तृत विश्लेषण किया गया है जिसे पारंपरिक बजट ढांचे से बाहर बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए संसाधन जुटाने के लिए बनाया गया था। श्वेत पत्र के अनुसार, इस बोर्ड पर लगभग 21,000 करोड़ रुपये का ऋण है जिसे अंततः राज्य सरकार को ही चुकाना होगा, जबकि करीब 35,000 करोड़ रुपये की परियोजनाओं के लिए अभी वित्तपोषण होना बाकी है।
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रिपोर्ट में भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक के निष्कर्षों का हवाला देते हुए कहा गया कि इस संस्था के पास स्वतंत्र राजस्व का पर्याप्त स्रोत नहीं है और उसका कर्ज वास्तव में राज्य का ही कर्ज है। साथ ही इसकी उधारी लागत सरकार की प्रत्यक्ष उधारी से एक से 1.5 प्रतिशत अधिक है जिससे इस मॉडल के वित्तीय लाभों पर सवाल उठते हैं।
कैसे होगा राज्य का प्रबंधन?
रिपोर्ट में कहा गया, 'यह एक साहसिक संस्थागत नवाचार था, जिसका उद्देश्य पेशेवर ढंग से संचालित, बाजार-उन्मुख बुनियादी ढांचा वित्तपोषक बनाना था, जो राज्य बजट की सीमाओं से बाहर काम कर सके।'
इसमें हालांकि यह भी कहा गया कि अब इसकी उधारी वास्तव में राज्य की उधारी बन गई है और इसकी लागत लगातार अधिक बनी हुई है। श्वेत पत्र के अनुसार, मुद्दा अब यह नहीं है कि केआईआईएफबी को अपने वर्तमान स्वरूप में जारी रहना चाहिए या नहीं, बल्कि यह है कि राज्य को मौजूदा दायित्वों का सम्मान करते हुए और संस्था की तकनीकी एवं संगठनात्मक क्षमता को संरक्षित करते हुए इस परिवर्तन का प्रबंधन कैसे करना चाहिए।
