इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि गंगा नदी में मांसाहारी खाने का कचरा फेंकने से हिंदू समुदाय की धार्मिक भावनाएं आहत हो सकती हैं। कोर्ट ने वाराणसी में गंगा नदी में नाव पर इफ्तार पार्टी आयोजित करने, नॉन-वेज खाने और बचे हुए कचरे को नदी में फेंकने के आरोप में गिरफ्तार आठ मुस्लिम युवकों को जमानत दे दी है।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि आरोपी अपने कृत्य के लिए माफी मांग रहे हैं और उनके परिवार भी समाज को हुए दुख के लिए अफसोस जता रहे हैं। 15 मई को जस्टिस राजीव लोचन शुक्ला ने पांच आरोपियों को जमानत दी, जबकि जस्टिस जितेंद्र कुमार सिन्हा ने 3 अन्य को जमानत दी।
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कोर्ट ने जमानत क्यों दी है?
अभी छह अन्य आरोपियों को जमानत नहीं मिली है। जस्टिस राजीव लोचन शुक्ला ने 16 पन्नों के आदेश में कहा कि आरोपियों का कोई पुराना आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है। वे काफी समय से जेल में हैं और उन्होंने माफी भी मांगी है। जस्टिस राजीव लोचन शुक्ला ने कहा कि इसलिए उन्हें जमानत दी जा सकती है।
17 लोग इफ्तार पार्टी पर हुए थे गिरफ्तार
गंगा में इफ्तार पार्टी कर रहे कुल 14 लोगों को 17 मार्च को गिरफ्तार किया गया था। भारतीय जनता पार्टी युवा मोर्चा के जिला अध्यक्ष राजत जायसवाल की शिकायत पर पुलिस ने कार्रवाई की थी। इस मामले को लेकर सोशल मीडिया पर खूब हंगामा बरपा था।
क्या-क्या आरोप लगे हैं?
आरोपियों पर धार्मिक भावनाएं भड़काने, सार्वजनिक उपद्रव, नदी का पानी गंदा करने और धार्मिक स्थल को अपवित्र करने जैसे कई गंभीर आरोप लगाए गए थे। वकीलों ने कहा था कि आरोपी गंगा को अपवित्र करने के साथ-साथ वीडियो बनाकर साम्प्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने की कोशिश कर रहे थे।
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किन धाराओं के तहत हुई थी कार्रवाई?
आरोपियों पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) और जल प्रदूषण निवारण अधिनियम की कई गंभीर धाराएं लगाई गई हैं। सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाले कई मामलों में उनके खिलाफ कार्रवाई हुई थी। आरोपियों पर धारा 196(1)(b) लगाई गई है जो अलग-अलग समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देने से संबंधित है। धारा 270 सार्वजनिक उपद्रव फैलाने और धारा 279 सार्वजनिक जल स्रोतों या जलाशयों को गंदा करने से संबंधित है।
धार्मिक स्थलों को अपवित्र करने या नुकसान पहुंचाने के लिए धारा 298, धार्मिक भावनाओं को जानबूझकर ठेस पहुंचाने के लिए धारा 299 भी लगाई गई है। लोक सेवक के आदेश की अवज्ञा के लिए धारा 223(b) और नदियों या जल स्रोतों में प्रदूषण फैलाने पर रोक लगाने के लिए जल अधिनियम, 1974 की धारा 24 के तहत भी केस हुआ है।
