भारत ने अमेरिकी अगुवाई वाले 'पैक्स सिलिका' मिशन की घोषणाओं पर हस्ताक्षर कर दिया है। एआई इम्पैक्ट समिट 2026 के आखिरी दिनों में भारत ने यह कदम उठाया है। अमेरिका, दुनिया के बड़े देशों के साथ अर्टिफीशियल इंटेलिजेंस और तकनीक की सप्लाई चेन की रेस में चीन को पीछे छोड़ना चाहता है। चीन, इस सेक्टर का बेताज बादशाह है, जिसे चुनौती देने की कवायद की जा रही है। 

चीन और ताइवान, दुर्लभ खनिज क्षमताओं के दोहन में जी-जान झोंक रहा है। चीन, सधे कदमों से सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन की दुनिया में बेताज बादशाह बनता जा रहा है। अमेरिका को यह बात, एक अरसे से चुभ रही है। खनिज संसाधनों के मामले में 'गरीब' अमेरिका, उन देशों को जोड़ना चाहता है, जहां सेमीकंडक्टर के क्षेत्र में असीमित संभावनाएं हैं। 
 

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क्या है पैक्स सिलिका?

पैक्स सिलिका, अमेरिका के नेतृत्व वाली एक अंतरराष्ट्रीय पहल है, जिसका उद्देश्य AI और उन्नत तकनीकों के लिए सुरक्षित, लचीली और इनवोशन से युक्त सप्लाई चेन बनाना है। दुर्लभ खनिजों से लेकर, सेमीकंडक्टर, AI इंफ्रास्ट्रक्चर, एनर्जी, लॉजिस्टिक्स और डेटा सेंटर्स को विकसित करने की पहल है। इस सेक्टर में चीन का ऐसा दबदबा है कि अमेरिका खुद, चीन पर निर्भर है।

अमेरिका चाहता है कि जो देश, पहले से अच्छे व्यापारिक भागीदार हैं, उनके साथ व्यापार को बढ़ावा दिया जाए, एक सकारात्मक गठबंधन बने, जिसमें तकनीक से लेकर इन्फ्रास्ट्रक्चर तक साझा किए जाएं। अमेरिका ने इस पहल की शुरुआत दिसंबर 2025 में की थी। भारत इस गठबंधन का 10वां सदस्य है। 

 

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पैक्स सिलिका में कौन-कौन से देश शामिल हैं?

  • ऑस्ट्रेलिया
  • ग्रीस
  • इजरायल
  • जापान
  • कतर
  • रिपब्लिक ऑफ कोरिया
  • सिंगापुर
  • संयुक्त अरब अमीरात
  • यूनाइटेड किंगडम
  • भारत

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पैक्स सिलिका देशों के प्रतिनिधि। Photo Credit: PTI

पर्यवेक्षक कौन हैं?

  • कनाडा
  • यूरोपियन यूनियन
  • नीदरलैंड
  • ऑर्गेनाइडेशन फॉर इकोनॉमिक कॉर्पोरेशन एंड डेवलेपमेंट
  • ताइवान

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भारत क्यों शामिल हुआ है?

पैक्स सिलिका के शुरुआती मिशन में सिर्फ 8 देश थे। जापान, दक्षिण कोरिया, सिंगापुर, नीदरलैंड्स, ब्रिटेन, इजराइल, UAE और ऑस्ट्रेलिया। ये देश, सेमीकंडक्टर की सप्लाई चेन का अहम हिस्सा हैं। नीदरलैंड लिथोग्राफी तकनीक में अगुवाई कर रही है। जापान और कोरिया, निर्माण क्षेत्र में आगे हैं। ऑस्ट्रेलिया में दुर्लभ खनिजों का भंडारण है। इजरायल, इनोवेशन के लिए मशहूर है।

भारत, अपने सेमीकंडक्टर मिशन के शुरुआती दिनों में हैं। भारत विदेशी तकनीक पर निर्भर था। अब बजट 2026 में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सेमीकंडक्टर सेक्टर में 40,000 करोड़ रुपये के योजनाबद्ध खर्च का प्रस्ताव दिया है। भारत में'इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन 2.0' का एलान हुआ है। 
 
भारत शुरुआती दौर में पैक्स सिलिका से बाहर था लेकिन भारतीय इंजीनियरों के दबदबे, रिसर्च को लेकर समर्पण और बढ़ते निवेश को लेकर अब अमेरिका की नजर भारतीय व्यापार पर है। भारत अपनी प्रॉसेसिंग क्षमता, एक्सपर्टाइज और संसाधनों को मजबूत कर रहा है। भारत के पास, वैसे भी दुर्लभ खनिजों का भंडारण नहीं है। भारत का सारा जोर, अब रिसर्च और प्रॉसेसिंग पर है। अमेरिका ने इसे ही भुनाया है। 

 

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वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और आंध्र प्रदेश के सीएम चंद्रबाबू नायडू। Photo Credit: PIB

कैसे कवायद शुरू हुई?

जनवरी 2026 में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने भारत को पैक्स सिलिका में शामिल होने के लिए औपचारिक तौर पर प्रस्ताव दिया। भारत और अमेरिका के व्यापारिक संबंध, नई चुनौतियों से जूझ रहे हैं। डोनाल्ड ट्रंप, मनमाने तरीके से टैरिफ लगा रहे हैं। बिगड़ते संबंधों के बीच, उनकी कवायद से व्यापारिक संबंध, थोड़े बेहतर हुए। 

 

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अमेरिकी 'पैक्स सिलिका' से भारत को क्या मिलेगा?

भारत में निवेश की अपार संभावनाएं बन रही हैं। माइक्रोसॉफ्ट ने भारत के AI इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए 17 अरब डॉलर के निवेश का एलान किया है। गूगल ने एलान किया है 15 अरब डॉलर का निवेश आंध्र प्रदेश में डेटा सेंटर के लिए किया जाएगा।  

भारत, अब सेमीकंडक्टर हब बनने की राह पर है। देश का जोर सेमीकंडक्टर मिशन पर है। भारत में चिप निर्माण की तकनीत को गति मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। भारत को AI सेक्टर और डेटा सेंटर तका अहम भागीदार बनने का मौका मिल रहा है।

भारत मेंलिथियम और कोबाल्ट जैसे खनिज, आसानी से मिलेंगे। AI, सेमीकंडक्टर और EV सेक्टर के लिए यह जरूरी है। चीन के खिलाफ, भारत ही ऐसा देश है, जिसे 'ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब' के तौर पर विकसित किया जा सकता है। भारत में अब यही संभावनाएं बन रहीं हैं। 

 

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पैक्स सिलिका देशों के प्रतिनिधि। Photo Credit: PTI

चीन की बराबरी मुश्किल क्यों है?

  • खनिज संपदा: चीन के पास, दुनिया के दुर्लभतम खनिजों का विशाल भंडारण है। जिसके पास कच्चा माल है, वही तय करेगा कि उसकी कितनी तकनीक कहां तक जाएगी। चीन, अपने खनिजों के दोहन में दुनिया के सबसे बड़ा देश है। चीन का कच्चे माल और रिफाइनिंग पर एकाधिकार है।
  • मेटल प्रॉसेसिंग पर एकाधिकार: चिप बनाने के लिए जरूरी क्रिटिकल मिनरल, जैसे गैलियम, जर्मेनियम और रेयर अर्थ एलिमेंट्स की रिफाइनिंग में चीन का तोड़, अमेरिका के पास भी नहीं है। चीन दुनिया के लगभग 90 फीसदी से ज्यादा गैलियम और जर्मेनियम की प्रॉसेसिंग करता है।
  • कमजोर रिफाइनिंग क्षमता: 'पैक्स सिलिका' देश भले ही नई खदानें बनाएं, रिसर्च करें लेकिन उन्हें रिफाइन करने की क्षमता विकसित करने में दशकों लग सकते हैं। चीन, इस सेक्टर में कोसों आगे है। 
  • 61% मार्केट पर चीन का दबदबा: इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) की रिपोर्ट बताती है कि चीन 61 फीसदी ग्लोबल प्रोडक्शन और 92 फीसदी प्रॉसेसिंग सेक्टर को कंट्रोल करता है। गैलियम की 98 और जर्मेनियम की 65 से 70 फीसदी प्रॉसेसिंग चीन में होता है। 
  • सप्लाई चेन पर एकाधिकार: अगर चीन, प्रॉसेस्ड खनिजों को बेचना बंद कर दे तो चिप निर्माण की क्षमता 40 फीसदी तक घट जाएगी।  पैक्स सिलिका के देश, चिप बनाने पर ध्यान देंगे लेकिन सप्लाई चेन का आधार ही खनिज है। ये खनिज, अभी चीन और ताईवान के पास हैं। ताइवान को चीन, अपना हिस्सा मानता है, उसकी वन चाइना पॉलिसी का हिस्सा यह देश है। खुलकर व्यापार करने से दुनिया के ज्यादातर देश कतराते हैं। 
चीन का सेमीकंडक्टर प्लांट। Photo Credit: Photo: VCG

और किन सेक्टरों में भारी है चीन?

ताइवान, नीदरलैंड, जर्मनी जैसे देश, पैक्स सिलिका का हिस्सा नहीं हैं। पर्यवेक्षक की भूमिका तक सीमित हैं। चीन, अमेरिका को सप्लाई करता है। अब अपनी क्षमताओं को और उन्नत कर रहा है। बिना अमेरिकी मदद के चीन ने डेटा सेंटर और AI चैटबॉट सेक्टर में अमेरिकी दबदबे में सेंध लगा रहा है। हुवेई जैसी कंपनियां, 7 नैनोमीटर चिप्स बना रहीं हैं। फोन, सुपरकंप्युटर, AI सेक्टर की यह जरूरत है। 

 

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क्यों चीन हमेशा भारी रहेगा?

चीन की सरकार, अपनी घरेलू क्षमताओं को और बेहतर करने में जुटी है, अमेरिका बाजार, अपनी मनमानी नीतियों की वजह से कई देशों को नाराज कर चुका है। पैक्स सिलिका चिप बनाएगा लेकिन सप्लाई चेन सुधारने के लिए इन देशों को लंबा इंतजार करना पड़ सकता है। फिलहाल, चीन पैक्स सिलिका के सारे देशों पर संयुक्त रूप से भारी है। मैक्सिमाइज मार्केट रिसर्च की एक रिपोर्ट बताती है कि चीन का सेमीकंडक्टर बाजार कंजम्पशन के मामले में साल 2023 में 177.8 अरब डॉलर था और 2024 में 180 अरब डॉलर तक पहुंचा। यह ग्लोबल मार्केट का 32-34 फीसदी हिस्सा है।