तालाब से ₹12 हजार करोड़ के ग्लोबल बाजार तक, मखाना ने मिथिला कैसे संवारा?
भारत में मखाना एक जमाने में सिर्फ व्रत या त्योहार पर लोग खाते थे। 2 हजार के शुरुआती दशक में मखाना की कीमतें 100 से 200 प्रति किलो के बीच थीं। आज यह आंकड़ा 1 हजार पर कर चुका है।

मखाना की खेती कर रहे किसान। Photo Credit: Khabargaon
'पग-पग पोखर, माछ-मखान, सरस बोल, मुस्की मुख कान, ई थिक मिथिलाक पहचान'
मिथिला को जो लोग जानते हैं, उन्होंने कभी न कभी ये लाइनें सुनी होंगी। इन का मतलब है कि अगर आपके कदम-कदम पर तालाब है, मछली है, मीठी बोली है, मुस्कान है तो आप मिथिला में हैं। यही मिथिला की पहचान है। व्रत, स्नैक्स हो या मटर-पनीर की स्वादिष्ट सब्जी, मखाना हमारी थालियों में ऐसे घुसा है कि लगता है यह हमारे घरों में सदियों से है। किसी जमाने में घाटे और जी तोड़ मेहनत वाला मखाना, आज 12 हजार करोड़ रुपये का वैश्विक कारोबार भारत को दे रहा है। मखाना, मिथिला की पहचान का एक अहम हिस्सा है।
मिथिला की इस पारंपरिक फसल ने अब 'ग्लोबर सुपरफूड' वाला टैग हासिल कर लिया है। यह देश का तेजी से बढ़ता कृषि-खाद्य उत्पाद बन गया है। इसकी वजह पौष्टिकता, बढ़ती स्वास्थ्य जागरूकता और वैश्विक मांग है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा मखाना उत्पादक है। कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के मुताबिक बिहार देश के कुल उत्पादन का करीब तीन-चौथाई और वैश्विक आपूर्ति का 80-85 प्रतिशत हिस्सा पैदा कर रहा है।
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मखाना है क्या, तैयार कैसे होता है?
मखाना को अंग्रेजी में फॉक्स नेट कहते हैं। वैज्ञानिक इसे 'यूरियाले फोरोक्स' के नाम से जानते हैं। यह जलीय फसल है, जो उथले तालाबों, झीलों और नम जमीन में पाया जाता है। पौधे का बीज ही खाने लायक होता है, इसे भुनकर, छिलका निकालकर प्रॉसेस करके बेचा जाता है। मखाना बिहार, पश्चिम बंगाल और असम में उगाया जाता है।
मखाने की मांग कैसे बढ़ी?
मखाना जब से सुपरफूड के तौर पर प्रचारित हुआ, दुनियाभर में इसकी मांग बढ़ गई। साल 2015 से मखाने के व्यापार ने भारत में तेज रफ्तार पकड़ी। कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय की अगुवाई में राष्ट्रीय मखाना बोर्ड का गठन 14 अक्तूबर 2025 को किया गया था। यह अब बिहार का पारंपरिक खाने से देशभर का 'हेल्थ फूड' बन गया है। बेहतर मखाने के उत्पादन के लिए कई स्टार्टअप शुरू हुए हैं। कई फार्मर प्रोडक्शन ऑर्गेनाइजेशन (FPO) अस्तित्व में आए और मखाने को संवारने के लिए जी-जान से जुटे।
मखाना बोर्ड का गठन कैसे हुआ?
केंद्र सरकार ने बजट 2025-26 में नेशनल मखाना बोर्ड की घोषणा की थी। 15 सितंबर 2025 को बिहार में औपचारिक रूप से लॉन्च किया गया। मखाना विकास के लिए 2025-26 से 2030-31 तक कुल 476.03 करोड़ रुपये का केंद्रीय क्षेत्रीय योजना मंजूर की गई है। योजना में रिसर्च, अच्छे बीज, किसानों के कौशल, कटाई-पोस्ट हार्वेस्ट सुधार, मूल्यवर्धन, ब्रांडिंग, निर्यात और गुणवत्ता नियंत्रण पर जोर है। 2025-26 के लिए 30 करोड़ और 2026-27 के लिए 90 करोड़ रुपये मंजूर हुए हैं।
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भारत कितना मखाना पैदा करता है?
साल 2024-25 में भारत का कुल मखाना उत्पादन 63,910 मीट्रिक टन था। लगभग 2.03 मीट्रिक टन प्रति हेक्टेयर की पैदावार रही। 2025-26 के लिए अनुमान जताया गया है कि उत्पादन करीब 80,590 मीट्रिक टन तक पहुंच सकता है। प्रति हेक्टेयर 2.34 मीट्रिक टन मखाना पैदा हो सकता है। मखाना पैदा करने में बिहार का कोई जोड़ ही नहीं है। बिहार अकेले, 60,000 मीट्रिक टन मखाना पैदा करता है। प्रति हेक्टेयर उपज यहां 2.00 मीट्रिक टन है। 1 मीट्रिक टन, 1 हजार किलो के बराबर होता है।
बिहार के किन जिलों में होती है मखाना की खेती?
मखाने की खेती उत्तरी बिहार में होती है। कोसी बेसिन के सुपौल, सहरसा, मधेपुरा जिलों खूब मखाना उगाया जाता है। मिथिला-सीमांचल क्षेत्रों मखाना की खेती के केंद्र हैं। स्वर्ण वैदेही और सबौर मखाना-1 जैसी उन्नत किस्मों और फील्ड-सिस्टम खेती ने उत्पादकता बढ़ाई है। पहले अव्यवस्थित तरीके से मखाने की खेती होती थी, लेकिन अब खेत बनाकर, इसका बीजारोपण होता है, फसलें तैयार की जाती हैं।
कितना मखाना हम बेच पाते हैं?
भारत सालाना 0.6 लाख मीट्रिक टन से ज्यादा मखाना पैदा करता है। इसमें से करीब 40 प्रतिशत यानी 0.23-0.25 लाख मीट्रिक टन निर्यात होता है, बाकी घरेलू खपत में जाता है। 2021-22 से 2024-25 के बीच घरेलू बाजार में सालाना 17-18 प्रतिशत वृद्धि हुई। भारत में पैदा होने वाले कुल मखाने का 40 फीसदी हिस्सा निर्यात किया जाता है। करीब 23,000 से 25,000 मीट्रिक टन मखाना भारत दुनिया में बेचता है, जबकि 60 प्रतशत मखाना की खपत देश में ही हो जाती है। 
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कितना मखाना देश में खाया जाता है?
घरेलू स्तर पर हर महीने 3,000 से 3,500 मीट्रिक टन भुने मखाने की मांग रहती है, जिसमें ब्रांडेड कंपनियों का हिस्सा 1,800 से 2,000 मीट्रिक टन और खुले बाजार का 1,200 से 1,400 मीट्रिक टन है। त्योहारों के समय यह कुल मांग बढ़कर 5,000 मीट्रिक टन तक पहुंच जाती है।
मखाने की खेती से मुनाफा कितना?
उत्पादन में केवल 4 प्रतिशत से 5 प्रतिशत इजाफे की वजह से इसकी कीमत 2020-22 के 500 रुपये प्रति किलो से ढाई गुना बढ़कर 2025 में 1,250 रुपये प्रति किलो हो गई। साल 2021-22 से 2024-25 के दौरान 17 फीसदी से 18 फीसदी की सालाना दर दाम बढ़ रहे हैं। मखाना बाजार, 2029-30 तक 11,000 करोड़ रुपये से 12,000 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है।
ब्रांड कैसे बना मखाना?
साल 2025 में डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ फॉरेन ट्रेड (DGFT) ने पॉप्ड मखाना और अन्य उत्पादों के लिए अलग हार्मोनाइज्ड सिस्टम ऑफ नोमेनक्लेचर (HSN) कोड भी जारी किया। इसकी वजह से व्यापार को ट्रैक करना आसान हुआ है। देश में हर महीने ब्रांडेड फास्ट मूविंग कंज्यूमर गुड्स (FMCG) और संगठित कंपनियां 1,800 से 2,000 मीट्रिक टन मखाना बाजार में लाती हैं। असंगठित और रिटेल दुकानों से 1,200 से 1,400 मीट्रिक टन मखाना बिकता है। सरकारी योजनाओं के तहत इस साल अतिरिक्त 1,010 हेक्टेयर जमीन मखाना खेती में शामिल की गई और 73 हेक्टेयर सिर्फ बीज उत्पादन के लिए इस्तेमाल हुई। इससे देशभर के 8,159 किसानों को सीधा फायदा मिला।
किन देशों में कितनी कीमत पर बिकता है भारतीय मखाना?
वाणिज्य मंत्रालय के निर्यात के आंकड़ों के अनुसार अमेरिका को औसतन 19.5 डॉलर प्रति किलो, कनाडा को 15.8 डॉलर प्रति किलो और यूएई को 13.3 डॉलर प्रति किलो की दर से मखाना बेचा गया। जर्मनी, नेपाल और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश सबसे ज्यादा कीमत चुका रहे हैं। जर्मनी में एक किलो मखाने की कीमत 26 डॉलर, नेपाल में 21.6 डॉलर और ऑस्ट्रेलिया में 21 डॉलर तक पहुंच रही है। ब्रिटेन का भारतीय मखाना निर्यात में 10 प्रतिशत हिस्सा है, जहां औसत कीमत 20 डॉलर प्रति किलो रहती है।
सेहत के लिए क्यों फायदेमंद है मखाना?
डॉ. रुपाली जैन, डायटीशियन, BAMS, MS:-
मखाना पोषण के लिहाज से बेहद खास माना जाता है। इसमें कार्बोहाइड्रेट, अच्छी क्वालिटी का प्रोटीन, फाइबर के साथ मैग्नीशियम, पोटैशियम, फॉस्फोरस और आयरन जैसे जरूरी तत्व मौजूद होते हैं। इसमें सोडियम कम और कोलेस्ट्रॉल बिल्कुल नहीं होता। फैट की मात्रा भी बहुत कम है, सिर्फ 0.33 ग्राम प्रति 100 ग्राम, जबकि प्रोटीन पचने की क्षमता करीब 95 प्रतिशत तक है। कम ग्लाइसेमिक लोड होने की वजह से डायबिटीज के मरीजों के लिए भी यह अच्छा विकल्प माना जाता है। कई अध्ययनों में मखाने को बादाम, अखरोट और काजू जैसे नट्स से भी बेहतर पोषण वाला बताया गया है।
खेत से बाजार तक कैसे तैयार होता है मखाना?
मखाना उत्पादन की प्रक्रिया तालाब तैयार करने से शुरू होती है। इसके बाद बीज बोना, फसल की देखभाल और आखिर में पानी से हाथों से कटाई की जाती है। इसके बाद प्रोसेसिंग में सुखाना, साफ करना, भूनना, पॉपिंग, पॉलिशिंग और ग्रेडिंग जैसे चरण आते हैं। इसके अलावा फ्लेवर्ड मखाना, रेडी-टू-ईट स्नैक्स और मखाना आटा जैसे मूल्य-वर्धित उत्पाद भी बनाए जाते हैं।
सरकार कैसे मखाने को प्रमोट कर रही है?
नेशनल रिसर्च सेंटर फॉर मखाना ने भी इस क्षेत्र में अहम भूमिका निभाई है। साल 2012 से 2023 के बीच संस्थान ने 15,824.1 किलो उच्च उपज वाले बीज किसानों तक पहुंचाए और 3,000 से ज्यादा किसानों को प्रशिक्षण दिया। साथ ही 24 उद्यमों को तकनीकी मदद भी दी गई। संस्थान ने मखाना सीड वॉशर, ग्रेडर, रोस्टिंग मशीन और पॉपिंग मशीन जैसी मशीनें भी विकसित कीं, जिन्हें आगे लाइसेंस देकर बाजार में उतारा गया। विशेषज्ञों का मानना है कि नेशनल मखाना बोर्ड और शोध संस्थानों के लगातार प्रयासों से आने वाले समय में किसानों की आय बढ़ेगी, गांवों में रोजगार के मौके पैदा होंगे और भारत का कृषि निर्यात और मजबूत होगा।
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