शेयर बाजार नियामक संस्था सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (SEBI) ने ऑनलाइन बॉन्ड प्लेटफॉर्म और कंपनियों के लिए एक नया नियम लागू किया है। इसके तहत अब किसी भी बॉन्ड या डेट सिक्योरिटी में कितना जोखिम है यह जानना आसान हो जाएगा। इसके लिए SEBI ने क्रेडिट रिस्क-ओ-मीटर लॉन्च किया है। इसमें हरे से लेकर लाल रंग तक का इस्तेमाल किया जाएगा। सवाल यह है कि केवल रंग के इस्तेमाल से रिस्क समझना आसान होगा। साथ ही यह भी कि क्या इसके इस्तेमाल पर पूरी तरह से भरोसा किया जा सकता है?
हरा रंग हमेशा सुरक्षित नहीं होता है। वैसे ही निवेशक AAA रेटिंग वाले बॉन्ड पर हरा रंग देखकर उसे पूरी तरह सुरक्षित समझने की भूल कर सकते हैं। हकीकत यह है कि हरा रंग सिर्फ कम क्रेडिट जोखिम को दर्शाता है। आपके पैसे के 100% सुरक्षित होने या मुनाफा मिलने की गारंटी नहीं देता। आइए समझते हैं कैसे?
यह भी पढ़ें: शेयर मार्केट: मजबूत शुरुआत के बाद सेंसेक्स-निफ्टी धड़ाम, सोना-चांदी का हाल जानिए
क्रेडिट रिस्क-ओ-मीटर है क्या?
क्रेडिट रिस्क-ओ-मीटर के तहत सभी तरह के बॉन्ड्स और शॉर्ट-टर्म पेपर्स के जोखिम को 6 अलग-अलग स्तरों और अलग-अलग रंगों के जरिए दर्शाया जाएगा। यह नया नियम पब्लिक इश्यू के साथ-साथ प्राइवेट प्लेसमेंट के जरिए जारी होने वाली सभी डेट सिक्योरिटीज पर समान रूप से लागू होगा। इसमें नॉन-कन्वर्टिबल सिक्योरिटीज (NCS), कमर्शियल पेपर (CP), सिक्योरिटाइज्ड डेट इंस्ट्रूमेंट्स (SDI), सिक्योरिटी रिसीट (SR) और मार्केट लिंक्ड डिबेंचर्स (MLD) जैसी सभी प्रमुख सिक्योरिटीज शामिल होंगी। इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि निवेशकों को भारी-भरकम वित्तीय शब्दावली समझे बिना ही निवेश का जोखिम तुरंत पता चल जाएगा।
क्रेडिट रिस्क-ओ-मीटर मुख्य रूप से यह बताता है कि कंपनी आपका ब्याज और मूलधन समय पर लौटा पाएगी या नहीं। यदि किसी बॉन्ड की रेटिंग AAA है तो उसे 'सबसे कम क्रेडिट रिस्क' यानी हरे रंग की श्रेणी में रखा जाता है। इसके बावजूद, यदि बाद में कंपनी की वित्तीय स्थिति अचानक बिगड़ती है और उसकी भुगतान क्षमता कमजोर होती है तो निवेशक का पैसा फंस सकता है। SEBI ने भी साफ किया है कि यह मीटर केवल क्रेडिट रिस्क बताता है। साथ ही इसे निवेश की कोई गारंटी या सिफारिश नहीं माना जाना चाहिए।
बॉन्ड में छिपे दूसरे खतरे
बाजार में ब्याज दरें बढ़ने पर पुराने बॉन्ड की कीमत गिर जाती हैं। ऐसे में भले ही बॉन्ड को हरा रंग मिला है लेकिन दरों के उतार-चढ़ाव से आपको नुकसान हो सकता है। साथ ही बाजार में ब्याज दरें बढ़ने पर पुराने बॉन्ड की कीमतें गिर जाती हैं। दूसरा खतरा यह है कि अगर समय से पहले बॉन्ड बेचा जाए तो आपको इसका भी नुकसान हो सकता है। अगर आपको मैच्योरिटी से पहले अचानक पैसे की जरूरत पड़ी और बाजार में उस बॉन्ड को खरीदने वाला कोई न मिला तो आपको अपनी गाढ़ी कमाई का हिस्सा गंवाकर उसे सस्ते में बेचना पड़ सकता है।
यह भी पढ़ें: E-कॉमर्स डिलीवरी सर्विस पर लगेगा 5% GST, आप पर क्या असर होगा?
निवेशकों को यह समझना चाहिए कि निवेश करने से पहले क्या देखना चाहिए। केवल रंग देखकर फैसला न लें। बॉन्ड जारी करने वाली कंपनी की क्रेडिट रेटिंग और उसकी वास्तविक वित्तीय स्थिति की जांच जरूर करें। बॉन्ड की मैच्योरिटी अवधि, ब्याज भुगतान की शर्तें और बाजार में उसकी लिक्विडिटी को समझें। यदि बॉन्ड 'अनसिक्योर्ड' यानी बिना गारंटी वाला है तो उसकी जोखिम श्रेणी और शर्तों को ध्यान से पढ़ें।