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फिक्स्ड डिपॉजिट से बेहतर मानकर, Debt Fund में निवेश से पहले हो जाएं सावधान

डेट फंड में ज्यादा ब्याज के चक्कर में अपनी मेहनत की कमाई डालना जोखिम भरा हो सकता है इसलिए निवेश करने से पहले समझें कि यह सुरक्षित FD से कैसे अलग है।

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प्रतीकात्मक तस्वीर, Photo Credit: Freepik

आजकल बैंक फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) पर कम रिटर्न मिलने की वजह से कई लोग डेट फंड की तरफ बढ़ रहे हैं। कुछ डेट फंड 8% से 10% तक रिटर्न दिखाते हैं इसलिए लोग इन्हें सुरक्षित और बेहतर कमाई वाला ऑपशन मान लेते हैं। डेट फंड एक तरह का म्यूचुअल फंड होता है जिसमें लोगों का पैसा शेयर बाजार में नहीं बल्कि कंपनियों और सरकार को उधार देने वाले बॉन्ड में लगाया जाता है।

 

आसान भाषा में समझें तो फंड हाउस बड़ी कंपनियों या सरकार को पैसा उधार देता है और बदले में ब्याज कमाता है। उसी ब्याज का हिस्सा निवेशकों को रिटर्न के रूप में मिलता है लेकिन हर कंपनी सुरक्षित नहीं होती कुछ कंपनियां मजबूत होती हैं, इसलिए वे कम ब्याज पर पैसा उठा लेती हैं। वहीं कुछ कंपनियों की आर्थिक हालत कमजोर होती है या उन पर पहले से ज्यादा कर्ज होता है। ऐसी कंपनियां निवेशकों को ज्यादा ब्याज देने का वादा करती हैं ताकि लोग उनमें पैसा लगाएं।

 

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यही वजह है कि कुछ डेट फंड बाकी फंड से ज्यादा रिटर्न दिखाते हैं लेकिन ज्यादा रिटर्न के पीछे ज्यादा रिस्क भी छुपा होता है। अगर कंपनी समय पर पैसा वापस ना कर पाए या उसकी हालत खराब हो जाए तो फंड को नुकसान हो सकता है। इसका असर सीधे निवेशकों पर पड़ता है। पिछले कुछ सालों में भारत में कई ऐसे मामले सामने आए हैं जहां डेट फंड निवेशकों को बड़ा झटका लगा। फ्रैंकलिन टेम्पलटन, इंफ्रास्ट्रक्चर लीजिंग एंड फाइनेंशियल सर्विसेज (IL&FS) और दीवान हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड (DHFL) जैसे मामलों ने यह दिखाया कि डेट फंड पूरी तरह सुरक्षित नहीं होते। इसी वजह से अब मार्केट एक्सपर्ट्स बार-बार लोगों को सिर्फ ज्यादा रिटर्न देखकर निवेश ना करने की सलाह दे रहे हैं।

डेट फंड आखिर काम कैसे करता है?

डेट फंड लोगों का पैसा सरकारी बॉन्ड, कॉरपोरेट बॉन्ड और दूसरी फिक्स्ड इनकम योजनाओं में लगाते हैं। इन बॉन्ड पर कंपनियां और सरकार तय ब्याज देती हैं। इसी से फंड कमाई करता है। अगर फंड सुरक्षित सरकारी बॉन्ड में पैसा लगाता है तो रिस्क कम माना जाता है लेकिन अगर फंड कमजोर कंपनियों में पैसा लगाता है तो वहां ज्यादा खतरा हो सकता है।

 

जो डेट फंड ज्यादा रिटर्न देते हैं वे अक्सर ऐसी कंपनियों में पैसा लगाते हैं जिन्हें बाजार पूरी तरह सुरक्षित नहीं मानता। ऐसी कंपनियां निवेशकों को ज्यादा ब्याज देती हैं। इसी वजह से उन फंड का रिटर्न भी ज्यादा दिखाई देता है। सेबी के नियमों के मुताबिक क्रेडिट रिस्क फंड को कम से कम 65% पैसा कम रेटिंग वाले बॉन्ड में लगाना होता है। यानी इन फंड में रिस्क पहले से ज्यादा होता है।

पहले भी निवेशकों को नुकसान हो चुका है

साल 2020 में फ्रैंकलिन टेम्पलटन ने अपने 6 डेट फंड बंद कर दिए थे। इन फंड में करीब 26 हजार करोड़ रुपये निवेशकों के फंसे थे। कंपनी ने कहा था कि बाजार में नकदी की भारी कमी आ गई थी और बॉन्ड बेचने में दिक्कत हो रही थी। इसके अलावा IL&FS और DHFL के दौरान भी कई डेट फंड प्रभावित हुए थे क्योंकि इन कंपनियों के बॉन्ड में फंड का पैसा लगा हुआ था। जैसे ही कंपनियों की हालत बिगड़ी कई फंड की वैल्यू तेजी से नीचे आ गई थी।

ब्याज बढ़ने से भी नुकसान हो सकता है

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) समय-समय पर रेपो रेट तय करता है। रेपो रेट वह ब्याज कीमत होती है जिस पर बैंक आरबीआई से कर्ज लेते हैं। जब आरबीआई महंगाई को कंट्रोल करने के लिए रेपो रेट बढ़ाता है तो बाजार में लोन और ब्याज दोनों महंगे होने लगते हैं। इसका असर पुराने बॉन्ड पर पड़ता है पहले जारी किए गए बॉन्ड कम ब्याज दे रहे होते हैं जबकि नए बॉन्ड ज्यादा ब्याज पर आने लगते हैं। ऐसे में पुराने बॉन्ड की मांग कम हो जाती है और उनकी कीमत नीचे आने लगती है क्योंकि डेट फंड का पैसा इन्हीं बॉन्ड में लगा होता है इसलिए कई डेट फंड की वैल्यू भी गिर सकती है।

 

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निवेश से पहले रखे ध्यान 

डेट फंड पूरी तरह सुरक्षित निवेश नहीं होते। ज्यादा रिटर्न के साथ कई बार ज्यादा खतरा भी आता है। इसलिए किसी भी डेट फंड में पैसा लगाने से पहले यह समझना जरूरी है कि फंड पैसा कहां लगा रहा है, कंपनी कितनी मजबूत है और खराब हालात में कितना नुकसान हो सकता है। मार्केट एक्सपर्ट्स मानते हैं कि डेट फंड में सोच-समझकर निवेश करना जरूरी है क्योंकि यहां कमाई के साथ रिस्क भी जुड़ा होता है।

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