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बिल्कुल अलग है बोडोलैंड की राजनीति, BJP-कांग्रेस नहीं, BPF-UPPL के बीच मुकाबला

असम में 9 अप्रैल 2026 को राज्य विधानसभा की सभी 126 सीटों के लिए वोटिंग होगी। इन 126 में से BTR क्षेत्र में आने वाली 15 सीटों पर रोमांचक मुकाबला होने की उम्मीद है।

Bodoland Womens voting

बोडोलैंड की महिला वोटर, Photo Credit: ANI

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ब्रह्मपुत्र नदी के उत्तरी किनारे पर स्थित बोडोलैंड असम की राजनीति में अहम भूमिका निभाता है। इसे बोडोलैंड प्रादेशिक क्षेत्र या BTR भी कहते हैं। यह असम राज्य का एक स्वायत्त क्षेत्र है और इसमें असम के पांच जिले कोकराझार, चिरांग, उदालगुड़ी, बक्सा और तामुलपुर आते हैं। इस क्षेत्र में विधानसभा की कुल 15 सीटें हैं और इस क्षेत्र के मुद्दे असम के अन्य क्षेत्रों से बिल्कुल अलग हैं। यह एक स्वायत्त क्षेत्र है, लंबे समय से हिंसा का शिकार रहा है और यहां एक अलग राज्य की मांग को लेकर लोग लड़ाई लड़ रहे हैं। ऐसे में 9 अप्रैल को होने वाले विधानसभा चुनाव में इस क्षेत्र की 15 सीटें निर्णायक साबित हो सकती हैं।

 

बोडोलैंड की राजनीति को समझने के लिए इस इलाके के इतिहास को समझना बहुत जरूरी है। इसका इतिहास बोडो जनजाति की पहचान, अधिकार और स्वायत्तता की मांग से जुड़ा हुआ है। 1980 के दशक में ऑल बोडो स्टूडेंट यूनियन (ABSU) के नेतृत्व में अलग बोडोलैंड राज्य की मांग जोर पकड़ने लगी, जो आगे चलकर कई बार हिंसक आंदोलनों में बदल गई। 1993 में पहला बोडो समझौता हुआ लेकिन इससे स्थायी समाधान नहीं निकला। इसके बाद 2003 में भारत सरकार, असम सरकार और उग्रवादी संगठन बोडो लिब्रेशन टाइगर्स के बीच समझौते से बोडोलैंड टेरिटोरियल काउंसिल (BTC) का गठन हुआ, जिससे क्षेत्र को स्वायत्त शासन मिला। बाद में 2020 के नए समझौते के तहत बोडोलैंड प्रादेशिक क्षेत्र (BTR) को और मजबूत किया गया, जिससे आज यह असम में एक सवायत्त क्षेत्र के रूप में है। 

 

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क्या हैं चुनावी मुद्दे?

  • पहचान की राजनीति बोडो और गैर-बोडो का मुद्दा प्रमुख है।  
  • जमीन और अतिक्रमण हटाने का मुद्दा जोर पकड़ रहा है।
  • शांति और सुरक्षा बनाए रखना बड़ी प्राथमिकता है।
  • विकास जैसे सड़क, शिक्षा और रोजगार पर जोर है। 
  • 2020 बोडो समझौते को लागू करने को लेकर बहस छिड़ी है।
  • BPF और UPPL के बीच सीधा मुकाबला है।
  • गठबंधन टूटने से त्रिकोणीय चुनाव बन गया है। 

क्या हैं चुनावी समीकरण?

BTR क्षेत्र में कुल 15 विधानसभा सीटें हैं और इन सीटों पर क्षेत्रीय पार्टियों और दोनों गठबंधनों के बीच मुकाबला है। भारतीय जनता पार्टी और बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (बीपीएफ) के बीच गठबंधन है। हालांकि, इस बार चुनाव में बीजेपी की पुरानी सहयोगी यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी लिबरल (यूपीपीएल) अकेले सभी 15 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। बीजेपी 5 सीटों पर और बीपीएफ 11 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। वहीं, विपक्षी गठबंधन की बात करें तो इस क्षेत्र की 15 में से 13 सीटों पर कांग्रेस चुनाव लड़ रही है। अन्य दो सीटों पर राजोर दल और टीएमसी( जी) चुनाव लड़ रही हैं। इसके अलावा इस क्षेत्र में झारखंड मुक्ति मोर्चा भी चुनाव लड़ रही है।

 

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किस पार्टी को हो सकता है फायदा?

बोडो क्षेत्र में चुनाव असम के दूसरे हिस्सों से अलग होते हैं। इस क्षेत्र में स्थानीय मुद्दों पर ही चुनाव होता है। बीपीएफ और यूपीपीएल मुख्य पार्टियां हैं। 2021 के विधानसभा चुनाव में बीपीएफ हाग्रामा मोहिलारी विपक्षी गठबंधन का हिस्सा थे। उस समय हिमंत बिश्वा शर्मा उन पर जमकर हमले करते थे लेकिन पांच साल में राजनीति पूरी तरह से बदल गई है। हाग्रामा मोहिलारी अब सीएम हिमंत के सहयोगी हैं और साथ में चुनाव लड़ रहे हैं। भले ही बीजेपी राज्य में बड़ी पार्टी हो लेकिन इस क्षेत्र में  हाग्रामा मोहिलारी की बीपीएफ ही बड़े भाई की भूमिका में है। 

पीएम मोदी के साथ  हाग्रामा मोहिलारी

इसके अलावा प्रमोद बोरो इस क्षेत्र के प्रभावशाली नेता हैं और उनकी पार्टी यूपीपीएल ने 2021 में बीजेपी के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ा था। हालांकि, इन चुनावों में उनकी पार्टी का बीजेपी से गठबंधन नहीं हो पाया और उन्होंने सभी सीटों पर उम्मीदवार उतारने का फैसला लिया है। ऐसे में अब 11 सीटों पर बीपीएफ और यूपीपीएल के उम्मीदवार आमने सामने होंगे। 

परिवार के साथ प्रमोद बोरा 

कांग्रेस को इस क्षेत्र में झटका लग सकता है क्योंकि उनकी पुरानी सहयोगी बीपीएफ अब बीजेपी के साथ गठबंधन में है। कांग्रेस अकेले इस क्षेत्र में 13 सीटों पर चुनाव लड़ रही है और 2 सीटों पर गठबंधन की अन्य पार्टियां चुनाव लड़ रही हैं। कांग्रेस के लिए यह लड़ाई मुश्किल हो सकती है। कांग्रेस की मुश्किलें झारखंड मुक्ति मोर्चा ने चुनाव लड़ने का एलान करके और ज्यादा बढ़ा दी है। 


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