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2021 में CAA-NRC, 2026 में कैसे SIR के इर्द-गिर्द घूम रही बंगाल की राजनीति?

पश्चिम बंगाल में इस बार के चुनाव में एसआईआर सबसे ज्यादा चर्चा का विषय है। साथ ही यह ऐसा विषय है, जो राज्य के चुनावों को अधिक प्रभावित करेगा।

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पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया। Photo Credit- PTI

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पश्चिम बंगाल में 2026 के विधानसभा चुनाव के लिए तारीखों का एलान हो चुका है। राज्य में दो चरण 23 और 29 अप्रैल को वोटिंग होगी, जबकि चुनावी नतीजे 4 मई को आएंगे। राज्य की सत्ता की कुर्सी पर काबिज होने के लिए सभी दल अपनी-अपनी रणनीति पर काम कर रहे हैं। साथ ही अपने मु्द्दे सेट करके पूरे पश्चिम बंगाल में माहौल बना रहे हैं। इस बाक के चुनाव में कई मुद्दों के बीच में सबसे अधिक चर्चा विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की है। बीजेपी इसके पक्ष में बयान दे रही है तो वहीं, टीएमसी से लेकर अन्य विपक्षी पार्टियां एसआईआर प्रक्रिया का विरोध कर रही हैं।   

 

विपक्षी पार्टियां (बीजेपी को छोड़कर) एसआईआर का विरोध उससे जुड़ी प्रक्रियाओं को लेकर कर रही हैं। इस प्रक्रिया का मकसद चुनाव से पहले वोटर लिस्ट को अपडेट करना, गलत नाम हटाना और नए मतदाताओं को जोड़ना है। मगर, टीएमसी का कहना है कि गरीब, प्रवासी मजदूर या ग्रामीण मतदाताओं के पास पूरे कागज़ नहीं होते, ऐसे में चुनाव आयोग इससे उनका नाम गलत तरीके से हटा सकता है। इसके साथ ही टीएमसी एसआईआर के समय और इसके प्रक्रिया पर सवाल सवाल उठा रहा है। विपक्ष का कहना है कि चुनाव के करीब एसआईआर करना संदिग्ध है और इससे चुनावी माहौल प्रभावित हो सकता है।

 

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सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और भी तेज

यही वजह है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और भी तेज होता जा रहा है। यह अब सिर्फ चुनावी बयानबाजी तक सीमित ना रहकर, जमीनी स्तर पर लगातार लोगों को लामबंद करने के रूप में सामने आ रहा है। इस बदलती हुई पहचान की सियासत में एसआईआर की प्रक्रिया एक अहम टकराव का मुद्दा बनकर उभरा है।

 

दरअसल, इस बार बंगाल में एसआईआर की प्रक्रिया, इसका समय और टीएमसी-बीजेपी का टकराव चर्चा के केंद्र में है। इससे पहले 2021 के विधानसभा चुनाव में चर्चा का केंद्र नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) और राष्ट्रीय नागरिक पंजी (एनआरसी) था। यह चर्चा का केंद्र इसलिए बना क्योंकि यह दोनों मुद्दे बंगाल की राजनीति को सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की तरफ ले गए और दोनों प्रमुख दलों TMC और बीजेपी के लिए वोट बैंक को प्रभावित करने वाले थे।

 

सीएए-एनआरसी क्या था, चर्चा क्यों?

सीएए प्रक्रिया में पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए गैर-मुस्लिम शरणार्थियों (हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी, ईसाई) को भारतीय नागरिकता देने का प्रावधान था। इसमें मुसलमान शामिल नहीं थे। वहीं, एनआरसी के तहत अवैध अप्रवासियों की पहचान करने के लिए नागरिकों का राष्ट्रीय रजिस्टर लागू करना था, जिसमें लाखों लोग वैध दस्तानेज ना दिखा पाने पर देश से बाहर हो सकते थे। टीएमसी इसका विरोध कर रही थी, जबकि बीजेपी इसके समर्थन में थी। इस मुद्दे को लेकर बंगाल में जमकर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण हुआ, जिसका फायदा बीजेपी को मिला और उसे ऐतिहासिक जीत मिली। बीजेपी को इस चुनाव में पिछले चुनाव (3 सीटें) के मुकाबले 77 सीटों पर जीत मिली।

 

मगर, इस बार के चुनाव में वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण की कवायद और इससे पैदा हुई उथल-पुथल का मेल चुनावी लड़ाई को एक बहुस्तरीय मुकाबले में बदल रहा है। इस प्रक्रिया से वोटरों का गणित और उनकी पहचान लामबंदी की ओर लेकर जा रहा है। 2021 में जहां राजनीतिक मतभेद सीएए और एनआरसी के इर्द-गिर्द केंद्रित थे, वहीं इस बार एक ऐसे मुद्दे पर आधारित है, जो यह तय करता है कि मतदाता के रूप में कौन व्यक्ति योग्य है?

एसआईआर की प्रक्रिया से ध्रुवीकरण?

एसआईआर की प्रक्रिया ध्रुवीकरण को चुनावी बयानबाजी से बदलकर चुनावी वैधता को लेकर एक सीधी लड़ाई में बदल रही है। इसके साथ ही घुसपैठ और अल्पसंख्यक तुष्टीकरण जैसे बार-बार दोहराए जाने वाले विषय जुड़े हैं। चुनाव के दौरान बीजेपी इन दोनों मुद्दों को बार-बार जनता के बीच उठा रही है और सरकार आने पर घुसपैठियों को पंगाल से बाहर करने की बात कह रही है। 

मतदाता सूची से 64 लाख नाम हटाए गए 

हालांकि, एसआईआर की प्रक्रिया के दौरान बंगाल में अब तक मतदाता सूची से लगभग 64 लाख नाम हटाए जा चुके हैं। इसके अलावा राज्य में कई लाख अन्य नामों की अभी भी जांच चुनाव आयोग कर रहा है। यह एक ऐसा पैमाना बन गया है, जिसने बंगाल के राजनीतिक समीकरणों को हिलाकर रख दिया है और कड़े मुकाबले वाली सीटों पर टीएणसीऔर बीजेपी के बीच अनिश्चितता पैदा कर दी है।

 

 

बीजेपी ने एसआईआर को एक जरूरी चुनाव सुधार के तौर पर पेश किया है और इसे अवैध प्रवासन और राज्य की जनसांख्यिकीय बदलाव बताया है। बीजेपी ने खास तौर पर सीमावर्ती जिलों से संबंधित चिंताओं से इसे जोड़ा है। भगवा पार्टी का कहना है कि सीमावर्ती जिलों में अवैध बांग्लादेशी लोग वोयर लिस्ट से जुड़ गए थे, जिनको अब एसआईआर से हटा दिया गया है। 

 

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बीजेपी-टीएमसी के बीच वाकयुद्ध

केंद्रीय मंत्री सुकांत मजूमदार ने इस बारे में कहा, 'सीमावर्ती जिलों में अवैध प्रवासन और जनसांख्यिकीय बदलाव वास्तविक चिंताएं हैं। ये मुद्दे पश्चिम बंगाल की पहचान और सुरक्षा को प्रभावित करते हैं।' वहीं, तृणमूल कांग्रेस के नेता फिरहाद हकीम ने कहा, 'बीजेपी अल्पसंख्यकों के वोट देने के अधिकार छीनकर चुनाव लड़ना चाहती है। हम चुनावी फायदे के लिए ध्रुवीकरण की इजाजत नहीं देंगे।'

 

2021 में चुनावी अभियान के दौरान ध्रुवीकरण अपने चरम पर था। बंगाल में अभी तो हमें जो देखने को मिल रहा है, वह एक ज्यादा स्थायी और जमीनी स्तर की लामबंदी है। साथ ही एसआईआर ने इस बदलाव को और तेज कर दिया है। कुल मिलाकर एसआईआर और पहचान-आधारित लामबंदी में आई तेजी ने बंगाल में राजनीतिक व्याकरण को पूरी तरह से बदल दिया है। इसने 2026 के विधानसभा चुनाव को केवल शासन-प्रशासन का ही नहीं, बल्कि इस बात का भी एक बेहद अहम मुकाबला बना दिया है कि वोटर की पहचान कौन तय करता है और मतदाताओं को कौन लामबंद करता है।


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