चुनावी राज्यों में आंबेडकर पर इतना शोर क्यों? समीकरण समझिए
4 राज्य और 1 केंद्र शासित प्रदेश में चुनाव हो रहे हैं। इन चुनावों में दलित राजनीति की स्थिति क्या है, आइए समझते हैं।

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन। Photo Credit: MKStalin/X
लोकसभा चुनाव हो या राज्य सभा, भारतीय जनता पार्टी हो, तृणमूल कांग्रेस हो या द्रविड़ मुनेत्र कझगम, हर दल के लिए लिए भीम राम आंबेडकर, आदर्श पुरुष रहे हैं। उन्हें कांग्रेस के लोग भी पूजते हैं, वामदल के नेता भी उन्हें सम्मान से याद करते हैं और धुर राष्ट्रवादी भी। भीम राव आंबेडकर, हर राजनीतिक के पार्टी के 'आराध्य' हैं, उनकी जयंती हो या परिनिर्वाण दिवस, लोग बढ़कर उनसे जुड़े कार्यक्रमों में हिस्सा लेते हैं।
भीम राव आंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को मध्य प्रदेश के मध्य प्रदेश के महो में हुआ था। अब इस जगह का नाम, डॉ. आंबेडकर नगर है। वह बचपन से मेधावी थे। उनका कद, देखते ही देखते, बढ़ने लगा। वह सामाजिक क्रांति के मसीहा बन गए। भारत में उन्हें दलित चेतना का आधुनिक शिल्पकार कहा जाता है। एक बड़ी आबादी, उन्हें अपने प्रतीक पुरुष की तरह देखती है।
यही वजह है, वह उन पर सियासत भी खूब होती है। देश के हर कोने में राजनीतिक दल, उनका सियासी लाभ लेने की कोशिश करते हैं। आंबेडकर को हर दल, अपने-अपने लिए मसीहा बताते हैं। भीम राव आंबेडकर को संविधान का शिल्पकार भी कहते हैं। वह संविधान के प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे। देश के 4 राज्य और 1 केंद्र शासित प्रदेश में चुनाव कराए जा रहे हैं। आइए जानते हैं इन चुनावी राज्यों में आंबेडकर, इतने अहम क्यों हैं-
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पश्चिम बंगाल में कितना मजबूत है आंबेडकर फैक्टर?
राज्य में 294 विधानसभा सीटें हैं। तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच सियासी लड़ाई है। तृणमूल कांग्रेस, भीम राव आंबेडकर के अपमान का आरोप बीजेपी पर लगाती है। बीजेपी यही आरोप, तृणमूल कांग्रेस पर लगाती है। पश्चिम बंगाल में करीब 68 सीटें हैं, जिन पर दलित निर्णायक स्थिति में हैं।
यह आरोप-प्रत्यारोप इसलिए लगते हैं क्योंकि पश्चिम बंगाल में दलित मतदाता, राज्य की सत्ता तय करते हैं। पश्चिम बंगाल में अनुसूचित जाति और जनजाति की आबादी करीब 23.51 प्रतिशत है। जो पार्टी, जितना आंबेडकर के करीब दिखती है, उसे उतना ही चुनावी लाभ मिलता है।
https://twitter.com/MamataOfficial/status/2043909612689338828
तमिलनाडु में कितना अहम है आंबेडकर फैक्टर?
तमिलनाडु द्रविड़ और दलित आंदोलन का गढ़ रहा है। अगड़ी जातियों के उत्पीड़न के मामले, एक जमाने में यहां सबसे ज्यादा आते थे। द्रविड़ आंदोलन की जब शुरुआत हुई तो कई विचारक सामने आए। तमिलनाडु में दलित चेतना का जनक वैसे तो अयोध्यादास पंडितर को कहा जाता है लेकिन यहां एमसी राजा, रेट्टा मलाई, श्रीनिवासन और पेरियार जैसे चिंतक हुए हैं। तमिलनाडु में करीब 46 सीटें, दलित बाहुल हैं।
भीम राव आंबेडकर, यहां भी सबसे ज्यादा प्रासंगिक हैं। तभी तमिलगा वेट्री कझगम के अध्यक्ष विजय होंगे, AIADMK महासचिव पलानीस्वामी में हो या मुख्यमंत्री एमके स्टालिन, सबकी जुबान पर चुनावी रैलियों में आंबेडकर हैं। उनके सामाजिक समता के सिद्धांत को व्यापक जनस्वीकृति मिली। तमिलनाडु में 20.01 फीसदी लोग अनुसूचित जाति और जनजाति से हैं। वे जीत हार तय करते हैं। यहां के राजनीतिक दलों में भी आंबेडकर को अपना बताने की होड़ मची रहती है।
https://twitter.com/mkstalin/status/2043901861904953628
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असम में आंबेडकर का कितना क्रेज है?
असम में दलित आबादी करीब 7.15 फीसदी है। आंबेडकर को वैचारिक तौर पर करीब, पिछड़े वर्ग की एक बड़ी आबादी पाती है। असम में ओबीसी वर्ग की आबादी करीब 7.15 प्रतिशत है। असम जातीय परिषद और रायजोर दल जैसी पार्टियां भी अनुसूचित जाति, जनजाति और मूल निवासियों की राजनीति करती हैं। आंबेडकर, हर दल के लिए अहम फैक्टर बने हुए हैं। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा से लेकर असम कांग्रेस के अध्यक्ष गौरव गोगोई तक, उनके नाम की राजनीति कर रहे हैं। असम में 8 सीटें दलित बाहुल हैं। ये सीटें, अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए आरक्षित हैं।
केरल में आंबेडकर जरूरी क्यों?
केरल में दलित आबादी 9.10 फीसदी है। दशकों से वहां लेफ्ट की सरकार है। आंबेडकर भी दलित, वंचित और पिछड़ों की बात करते थे, भारत में वाम दल भी वैचारिक रूप से अपने आपको आंबेडकर के करीब पाते हैं। केरल का चुनाव, लेफ्ट डोमोक्रेटिक फ्रंट (LDF) और यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) के इर्दगिर्द घूम रहा है। दोनों दल, आंबेडकर को पूजते हैं। एक की अगुवाई कांग्रेस कर रही है, एक की अगुवाई कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी)। केरल में करीब 14 सीटें ऐसी हैं, जो अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए आरक्षित हैं।
वाम दल, अपने भूमि सुधार आंदोलनों के लिए के जाने जाते है। दलितों की एक बड़ी आबादी भूमिहीन थी, जिसकी वजह से दलित वाम दलों की ओर झुके। राज्य में कई दलित संगठन स्वतंत्र अस्तित्व में हैं जो संघर्ष कर रहे हैं। केरल में मुख्यमंत्री पिनराई विजयन, आंबेडकर से नजदीक दिखने के लिए जातिगत भेदभावों को रोकने के लिए उनकी जयंती पर अधिकारियों को निर्देश दे रहे है। कांग्रेस उन्हें अपना नेता बताती रही है, बीजेपी भी अब आंबेडकर को आदर्श पुरुषों की लिस्ट में रखती है।
https://twitter.com/pinarayivijayan/status/2043940983096914387
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पुडुचेरी में आंबेडकर के लिए कैसा क्रेज है?
पुडुचेरी में दलित आबादी 15.73 फीसदी है। राज्य की 5 सीटें अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए आरक्षित है। पुडुचेरी में विदुथलाई चिरुथिगल काची, रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (RPI) और बहुजन समाज पार्टी (BSP) भी चुनाव लड़ती रही हैं। यहां एनडीए की सरकार है। यहां भी सत्तारूढ़ पार्टी से लेकर विपक्षी दल तक, चुनावी मौसम में आंबेडकर को याद करते हैं।
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