न स्टालिन टिके, न पलानीस्वामी, BJP भी पस्त, तमिलनाडु में कैसे छा गए थलापति विजय?
थलापति विजय की फिल्में बॉक्स ऑफिस पर सिर्फ पैसे नहीं बरसातीं, उन्हें ऐसा स्टार बना दिया है, जिसे तमिलनाडु अब कभी नहीं भूल पाएगा।

विजय सी जोसेफ। Photo Credit: PTI
'एमजी रामचंद्रन की तुलना विजय से मत कीजिए। एमजी रामचंद्रन ने फिल्मों से जो पैसा कमाया, वह सब लोगों की सेवा में लगा दिया। उन्होंने अपना सारा जीवन जनता के कल्याण के लिए समर्पित कर दिया। अपनी सारी संपत्ति उन्होंने मूक-बधिरों के आश्रम को दान कर दी। वह महान थे। क्या विजय भी ऐसे हैं?'
ऑल इंडिया द्रविड़ मुनेत्र कझगम के महासचिव ईके पलानीस्वामी ने जब जोसेफ विजय चंद्रशेखर उर्फ थलापति विजय के बारे में यह बातें कहीं थीं, तब हर कोई उनके बयान के साथ खड़ा नजर आया था। लोग यह मानने के लिए तैयार ही नहीं थे कि विजय, तमिलनाडु की सियासत के नए MGR साबित हो सकते हैं। 4 मई 2026 को लोगों की यह धारणा बदल गई। विधानसभा चुनावों के नतीजे आ रहे हैं और तमिलनाडु के सबसे बड़े स्टार, 'थलापति विजय' बनते नजर आ रहे हैं।
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आखिर सही निकली विजय और MGR की तुलना?
एमजी रामचंद्रन, तमिलनाडु के सबसे बड़े सितारे थे। वह तमिलनाडु के लिए मसीहा की तरह थे। एमजीआर की राजनीति की शुरुआत द्रविड़ मुनेत्र कझगम के साथ हुई थी। MGR ने साल 1972 तक सियासी अनबन के बाद नई पार्टी बनाई।
साल 1972 में AIADMK की नींव पड़ी। वह तीन बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बने। उनका भी राजनीतिक उभार विजय की तरह ही चौंकाने वाला रहा। वह राजनीति में तो थे लेकिन किसी ने उम्मीद नहीं की थी कि अलग पार्टी बनाकर भी वह कामयाब हो गए।
क्यों होती है तुलना?
तमिलनाडु में MGR और विजय थलापति की तुलना इसलिए होती है क्योंकि दोनों फिल्मी दुनिया के मसीहा थे। MGR भी अपनी फिल्मों में हीरो थे। वह गरीबों के हीरो रहे, हीरो की तरह ही राजनीति में आए। विजय भी हीरो ही बनकर आए। राजनीति में उतरने के बाद उन्होंने खुद कहा कि वह फिल्म जगत छोड़ रहे हैं।
विजय की रैलियों में जबरदस्त भीड़ उमड़ने लगी। उनकी मास अपील, फैन फॉलोइंग और जनसेवा वाली छवि ने तमिलनाडु में नई क्रांति कर दी। उनकी पार्टी तमिलगा वेत्री कझगम की लोकप्रियता इतनी बढ़ी कि DMK जैसी सत्तारूढ़ पार्टी, हाशिए पर आ गई।
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कैसे विजय का तमिलनाडु में बढ़ता गया जनाधार?
विजय, तमिलनाडु के 'मास स्टार' हैं। उनकी पॉपुलैरिटी, तमिल सिनेमा के दिग्गजों से कहीं ज्यादा है। वह राजनीतिक तौर पर भले ही 2 साल से सक्रिय हैं लेकिन सामाजिक तौर पर साल 2011 से ही सक्रिय हैं। उनका संगठन'विजय मक्कल इयक्कम' साल 2009 से ही सक्रिय है।
जब साल 2011 में चक्रवात आया था और 2018 में बाढ़ आई थी, तब संगठन ने तमिलनाडु के साथ-साथ केरल जैसे राज्यों तक मदद पहुंचाई थी। एक तरफ विजय की लोकप्रियता बढ़ती गई, दूसरी तरफ 'विजय मक्कल इयक्कम' के काम, चर्चा में आने लगे।
विजय को एहसास हुआ कि अब राजनीति में आना चाहिए। राजनीति में आकर वह लोगों की ज्यादा मदद कर सकेंगे। उनका संगठन, कई सामाजिक कार्यक्रमों को चलाता। जैसे जयललिता ने गरीब और मजलूमों पर फोकस किया विजय ने भी बच्चों की शिक्षा के लिए खाम किया।
कैसे पड़ी तमिलगा वेत्री कझगम की नींव?
2 फरवरी 2024 को विजय ने अपने राजनीतिक दल तमिलगा वेत्री कझगम की नींव रखी। इससे पहले सिर्फ वह रैलियां कर रहे थे, जन समर्थन जुटा रहे थे। उन्होंने फिल्मी अंदाज में ही अपना पोस्टर लॉन्च किया था। जंग का मैदान, गरजती हाथियां और विजय की फिल्मी एंट्री। उनका सियासी कद लगातार बढ़ता गया। रैलियों में खूब भीड़ उमड़तीं। ऐसी भीड़ कि सड़कें जाम हो जाती थीं। मुख्यमंत्री होते हुए भी एमके स्टालिन, अपनी रैलियों में यह भीड़ नहीं ला सके। थलापति विजय ने 230 से ज्यादा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे। अब विजय सबसे बड़े चेहरे बनते नजर आ रहे हैं। उनका मुख्यमंत्री बनना तय माना जा रहा है।
विजय की विचारधार पर कैसे लट्टू हो गए?
विजय किसी एक विचारधारा पर नहीं टिके हैं। विजय, धर्म निरपेक्ष राजनीति करते हैं। वह सामाजिक न्याय और तमिल राष्ट्रवाद की बात, अपनी कैंपेनिंग में कर रहे थ। उन्होंने बार-बार सार्वजनिक मंच से भीम राव आंबेडकर की तारीफ की। तमिलनाडु में सवर्ण जातियां, राजनीतिक तौर पर हाशिए पर हैं, ऐसे में यह मामला भी विजय के पक्ष में गया। विजय काफी हद तक, पेरियार की विचारधारा को अपनाते हैं लेकिन कट्टर द्रविड़ वाले रुख से परहेज करते हैं। वह 'मेर्सल' जैसी फिल्म बनाकर अपने इरादे पहले जाहिर कर चुके हैं कि उनकी लड़ाई, भ्रष्टाचार के खिलाफ है। वह विभाजन की राजनीति करने वाले लोगों को राष्ट्र द्रोही बताते हैं। वह अपनी विचाराधारा, धर्मनिरपेक्ष राजनीति के इर्दगिर्द रखते हैं। अब विजय, तमिलनाडु की सियासत के नए सितारे हैं, जिसका जगमगाना तय माना जा रहा है।
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कैसे वादों ने बदल दी तमिलनाडु में सरकार?
विजय ने पहले ही कह दिया था कि सरकार उन्हीं की बनेगी। उन्होंने वादा किया था कि महिलाओं को हर महीने 2,500 रुपये की आर्थिक सहायता दी जाएगी। परिवार को साल में 6 मुफ्त रसोई गैस सिलेंडर, अविवाहित महिलाओं को 8 ग्राम सोना दिया जाएगा। स्कूल जाने वाली बच्चों की माओं को 15,000 रुपये की मदद दी जाएगी। उन्होंने अल्पसंख्यक और दलित वर्ग के हितों के लिए काम करने का वादा किया था, जनता ने यकीन कर लिया।
क्यों DMK और AIADMK पर भारी पड़ गई TVK?
विजय ने अपने चुनावी जनसभाओं में परिवारवाद, विकास और भ्रष्टाचार को लेकर सरकारों पर सवाल उठाए। एमके स्टालिन यह साफ कर दिया था कि अब डीएमके की कमान उदयनिधि स्टालिन की रहेगी। वजह कितनी भी द्रविड़, वंचित और पिछड़ों की बात करें, करना उन्हें परिवारवाद ही है। विजय की यह तरकीब काम आई।विजय की राजनीति पर नजर रखने वाले चुनावी विश्लेषकों का कहना है कि तमिलनाडु में विजय की लहर थी। विजय ने अपने पहले ही रैली में साफ कह दिया था कि वह परिवारवाद और भ्रष्टाचार के खिलाफ हैं और हमेशा रहेंगे। यही उनका चुनावी एजेंडा होगा।
DMK के मुखिया एमके स्टालिन, भाषा विवाद पर उलझे रहे। उन्होंने हिंदी विरोध पर फोकस किया, उन्होंने केंद्र सरकार को चुनावों में घेरा, पूरा ध्यान सिर्फ AIADMK पर रहा और विजय को वह फैक्टर मान ही नहीं पाए। DMK जहां पेरियार से बाहर नहीं निकल पाई, TVK ने आंबेडकर पर जोर दिया, रोजगार का वादा किया। युवाओं को विजय के वादे पसंद आए। अब विजय यह चुनाव जीतते नजर आ रहे हैं। अलग बात है कि उन्हें गंठबंधन की जरूरत पड़ सकती है। अभी तक यह उन्होंने नहीं बताया है कि वह AIADMK के साथ जाएंगे या DMK के साथ।
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सियासी सफर का सबसे कड़वा पल क्या था?
28 सितंबर 2025 की बात है। विजय की नई नवेली पार्टी बनी थी। घूम-घूमकर रैलियां कर रहे थे। वह तमिलगा वेत्री कझगम के लिए करूर में रैली कर रहे थे, यहां भगदड़ मची और देखते ही देखते 30 से ज्यादा लोग घायल हो गए। विजय इस रैली से संभल गए। उनकी एक के बाद एक कई रैलियां रद्द की गईं लेकिन वह सयंमित रहे। उनका पूरा ध्यान सिर्फ अपने चुनावी घोषणापत्र पर रहा, बयानबाजी नहीं की। उन्होंने न तो बहुत कट्टर द्रविड़ पहचान पर जोर दिया, न ही बीजेपी, DMK और AIADMK जैसे दलों के खिलाफ आक्रामक रुख नहीं रहा। वह वंचित, दलित, अल्पसंख्यक और पिछड़ों की बात करते रहे। उनका संभलना काम आया और तमिलनाडु में क्रांति मच गई।
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