जलपाईगुड़ी: 7 में से 3 सीटों पर BJP का कब्जा, क्या TMC करेगी वापसी?
जलपाईगुड़ी जिले की सात विधानसभा सीटों पर बीजेपी और टीएमसी के बीच मुकाबला देखने को मिलेगा। अभी चार पर टीएमसी और तीन पर बीजेपी का कब्जा है।

जलपाईगुड़ी का सियासी समीकरण। ( Photo Credit: Khabargaon)
पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले का समृद्ध इतिहास है। महाभारत में भी इस जगह का उल्लेख मिलता है। वहीं मध्य काल में यह जिला कामता साम्राज्य हिस्सा था। मध्य काल में जलपाईगुड़ी तीस्ता नदी के पूर्वी तट से बांग्लादेश के रंगपुर में स्थित बागमती नदी के तट तक फैला था। साल 1865 में अंग्रेजों ने भूटान साम्राज्य से दुआर्स क्षेत्र को छीन लिया।
पूर्वी भाग को असम के गोलपाड़ा और पश्चिमी भाग जलपाईगुड़ी तौर पर अस्तित्व में आया। साल 1869 में पहली बार जलपाईगुड़ी को प्रशासनिक इकाई का दर्जा मिला। दुआर्स का अर्थ द्वार या मार्ग होता है। इसी रास्ते से भूटानी लोग अपना व्यापार करते थे।
इतिहासकारों के मुताबिक प्राचीन काल में जलपाईगुड़ी कामरूप साम्राज्य का हिस्सा था। कामता साम्राज्य की तीन राजधानियां चिलापाटा, मैनागुड़ी और पंचगढ़ भी जलपाईगुड़ी में पड़ती थीं। वहीं कोच साम्राज्य की पहली राजधानी हिंगुलव भी यहां ही थी। चिकन नेक के रास्ते में पड़ने वाला यह जिला रणनीतिक तौर पर भी बेहद अहम है। यह इलाका भारत के शेष हिस्सों को पूर्वोत्तर से जोड़ता है।
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कैसे पड़ा जलपाईगुड़ी नाम?
माना जाता है कि 'जलपाई' और 'गुड़ी' शब्दों को मिलाकर जिले का नामकरण किया गया है। जैतून के पेड़ को जलपाई कहते हैं। यहां पहले जैतून के पेड़ भी खूब होते थे। वहीं 'गुड़ी' शब्द का अर्थ स्थान या जगह से है। इस कारण जलपाईगुड़ी का मतलब जैतून के पेड़ों वाली जगह होता है। एक मान्यता यह भी है कि जिले का नाम भूटानी मुहावरे 'जे-ले-पे-गु-री' से लिया गया है। इसका अर्थ यह है कि वह स्थान जहां गर्म कपड़ों का विनमय होता हो। सरल शब्दों में कहें तो व्यापारिक केंद्र या बाजार।
जिले के बारे में एक नजर में
जिले को जलपाईगुड़ी सदर, धूपगुड़ी और माल तहसीलों में बांटा गया है। वहीं जलपाईगुड़ी सदर, धुपगुड़ी, मयनागुड़ी, राजगंज, माल, मटियाली, नागराकाटा, क्रांति और बानरहाट ब्लॉक हैं। सिलीगुड़ी नगर निगम और जलपाईगुड़ी, धूपगुड़ी, माल और मयनागुड़ी नगर पालिकाएं हैं। जिले में कुल 9 थाने हैं। अगर गांवों की बात करें तो 404 आबाद और 29 वन गांव हैं। हर एक वर्ग किमी में 701 लोग रहते हैं। एक हजार पुरुषों की तुलना में 956 महिलाएं हैं।
कैसा है जातीय समीकरण?
जिले की कुल 7 विधानसभा सीटों में से छह आरक्षित हैं। चार को अनुसूचित जाति और दो को अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित किया गया है। डबग्राम-फुलबारी इकलौती सामान्य सीट हैं। इन आंकडों से जिले के जातीय समीकरण का अंदाजा लगाया जा सकता है। जिले की अधिकांश आबादी ग्रामीण क्षेत्र में रहती है। सबसे अधिक संख्या अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति लोगों की है।
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विधानसभा सीटें
- धूपगुड़ी (SC)
- मयनागुड़ी (SC)
- जलपाईगुड़ी (SC)
- राजगंज (SC)
- डबग्राम-फुलबारी
- माल (ST)
- नागराकाटा (ST)
भौगोलिक ताना-बाना
जलपाईगुड़ी जिला जंगलों से घिरा है। उत्तर में हिमालय की पहाड़ियां हैं। मैदानी भागों में चाय के बगान हैं। यहां पर जलदापाडा राष्ट्रीय उद्यान भी है। बंगाल के उत्तर में यह जिला तीस्ता नदी के तट पर बसा है। जिले का अधिकांश भाग घने जंगलों से घिरा है। जलपाईगुड़ी के उत्तर-पूर्व में भूटान और दक्षिण में बांग्लादेश पड़ता है। उत्तर-पश्चिम में दार्जिलिंग की सीमा लगती है। उत्तर में कलिम्पोंग और दक्षिण-पूर्व में कूचबिहार और पश्चिम में अलीपुरद्वार जिला है। जिले में चाय, आलू, जूट, तंबाकू, गन्ना और धान की खेती होती है। यहां कोयला, तांबा अयस्क, चूना पत्थर और डोलोमाइट के भंडार भी हैं।
विधानसभा क्षेत्रों का हाल
धूपगुड़ी विधानसभा: यह विधानसभा सीट जलपाईगुड़ी जिले में पड़ती है। अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित इस सीट से टीएमसी के निर्मल चंद्र रॉय विधायक हैं। 2021 में बीजेपी के बिष्णु पाडा रॉय ने जीत हासिल की थी। उनके निधन बाद 2023 के उपचुनाव में टीएमसी को जीत मिली थी। 1977 से 2011 तक यहां भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) का कब्जा रहा। बनमाली रॉय सबसे अधिक पांच बार विधायक रहे।
मयनागुड़ी: 1951 में पहली बार कांग्रेस की टिकट पर सुरेंद्र नाथ रॉय ने चुनाव जीता। 2011 में अनंत देब अधिकारी ने पहली बार टीएमसी को तो वहीं 2021 में कौशिक रॉय ने पहली बार बीजेपी का कमल खिलाया। यहां सबसे अधिक सात बार क्रांतिकारी समाजवादी पार्टी और पांच बार कांग्रेस का कब्जा रहा।
जलपाईगुड़ी: 1951 से 1967 तक कांग्रेस की टिकट पर खगेंद्र नाथ दासगुप्ता लगातार चार बार विधायक रहे। सबसे अधिक 11 बार कांग्रेस ने यहां अपना कब्जा जमाया। टीएमसी को पहली बार 2021 में प्रदीप कुमार बर्मा ने जीत दिलाई। बीजेपी का अभी तक खाता नहीं खुला।
राजगंज विधानसभा: 1967 में पहली बार सोशलिस्ट पार्टी के बीएनआर हकीम पहली बार विधायक बने। 1969 से 1972 तक लगातार तीन बार कांग्रेस जीती। 1977 से 2006 तक सीपीएम और 2009 से मौजूदा समय तक टीएमसी का कब्जा है। टीएमसी नेता खागेश्वर रॉय यहां के चार बार के विधायक हैं।
डबग्राम-फुलबारी: बीजेपी की शिखा चटर्जी यहां से विधायक हैं। 2011 से 2016 तक टीएमसी के गौतम देब ने जीत हासिल की। मगर पिछले चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। इस चुनाव में देखना है कि बीजेपी अपना प्रभाव बरकरार रख पाती है या नहीं।
माल विधानसभा: इस सीट पर 2011 से टीएमसी बुलू चिक बराइक का कब्जा है। बीजेपी को यहां कभी जीत नहीं मिली है। सबसे अधिक आठ बार कांग्रेस और सात बार सीपीएम को जीत मिली है। अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित यह सीट जलपाईगुड़ी लोकसभा सीट का हिस्सा है।
नागराकाटा विधानसभा: 1962 में कांग्रेस के बुधु भगत ने पहला चुनाव जीता। बीजेपी के पुना भेंगरा यहां से मौजूदा विधायक हैं। 2016 में सिर्फ एक बार टीएमसी जीती है। कुल 15 चुनाव में से 9 बार यहां सीपीआई को जीत मिली। सीपीआई नेता चैतन मुंडा सबसे अधिक चार बार यहां से विधायक बने।
जिले की स्थिति
क्षेत्रफल- 3386.18 वर्ग किमी
साक्षरता दर- 73.79%
विधानसभा सीटें- 7
नगर पालिका- 4
नगर निगम- 1
ब्लॉक पंचायत- 9
ग्राम पंचायत- 80
आबाद गांव- 404
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