तमिलनाडु में अल्पसंख्यक समीकरण क्यों नहीं साध पाती हैं पार्टियां?
तमिलनाडु के विधानसभा चुनावों में अल्पसंख्यक राजनीति, उस तरह से हावी नहीं है, जैसे दूसरे राज्यो में। ऐसा क्यों है, आइए समझते हैं।

प्रतीकात्मक तस्वीर। AI इमेज। Photo Credit: Sora
तमिलनाडु के 32 जिलों की 234 विधानसभा सीटों पर चुनाव है। राज्य में 13 फीसदी अल्पसंख्यक आबादी है लेकिन किसी भी राजनीतिक दल ने सिर्फ अल्पसंख्यकों को लुभाने के लिए कोई सियासी दांव नहीं चला है। बिहार, झारखंड, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों से ठीक उलट, तमिलनाडु की राजनीति, अल्पसंख्यक केंद्रित कभी नहीं रही है।
द्रविड़ मुनेत्र कझगम से लेकर तमिलगा वेत्री कझगम (TVK) तक, सभी अल्पसंख्यकों पर अपने वादे तो ठोकते हैं लेकिन उनके लिए अलग से किसी योजना शुरू करने पर जोर नहीं देते हैं। तमिलनाडु में अल्पसंख्यक पार्टियां भी हैं लेकिन उनका व्यापक जनाधार नहीं हैं। अल्पसंख्यक पार्टियां या तो DMK गठबंधन का हिस्सा हैं, या ऑल इंडिया द्रविड़ मुनेत्र कझगम (AIADMK) का।
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अल्पसंख्यक राजनीति करने वाली पार्टियां कौन हैं?
- इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML): यह राज्य का सबसे पुराना और अहम मुस्लिम दल है। इस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष केएम कादर मोहिदीन हैं। डीएमके साथ मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं। DMK ने सिर्फ दो सीटें ऑफर की हैं।
- मानिथनेया मक्कल कत्ची (MMK): प्रोफेसर एमएच जवाहिरुल्लाह के नेतृत्व वाला यह दल तमिलनाडु में अपना विस्तार चाहता है। यह भी डीएमके के नेतृत्व वाले गठबंधन का हिस्सा है। यह पार्टी, 'तमिलनाडु मुस्लिम मुन्नेत्र कझगम' की राजनीतिक शाखा है। इस बार DMK ने इसे दो सीटें ऑफर की हैं।
- सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI): यह पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) से जुड़ा राजनीतिक संगठन रहा है। शहरी इलाको में थोड़ी-बहुत पहुंच है। डीएमके गठबंधन में एक सीट मिली है।
- इंडियन तौहीद जमात (INTJ): यह संगठन भी सक्रिय है लेकिन जनाधार न के बराबर है।
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तमिलनाडु की अल्पसंख्यकों का हाल क्या है?
साल 2011 में हुई जनगणना के मुताबिक राज्य के 32 जिले हिंदू बाहुल हैं। हिंदुओं की संख्या 87.58 फीसदी है। तमिलनाडु में करीब 42.29 लाख मुसलमान रहते हैं, जो तमिलनाडु की कुल आबादी का करीब 5.86 फीसदी हिस्सा है।
तमिलनाडु में एक और अल्पसंख्यक वर्ग ईसाई भी अच्छी संख्या में हैं। राज्य में ईसाइयों की संख्या 44.18 लाख से ज्यादा है, जो कुल आबादी का 6.12 फीसदी हिस्सा है। तमिलनाडु में 0.02 प्रतिशत बुध और 0.12 प्रतिशत जैन और 0.01 प्रतिशत बौद्ध हैं।
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क्यों तमिलनाडु में अल्पसंख्यक वाला दांव क्यों नहीं चलता है?
तमिलनाडु की राजनीति भारत के अन्य राज्यों से अलग है। यहां द्रविड़ राजनीति पर जोर रहा है। दलित और पिछड़ों की बात करने वाली पार्टियां, राजनीतिक तौर पर ज्यादा व्यापक रहीं है। यहां'अल्पसंख्यक कार्ड' या धर्म के आधार पर ध्रुवीकरण वाला दांव, दोनों नहीं चलता है।
तमिलनाडु में द्रविड़ राजनीति हावी है। तमिलनाडु की नींव में पेरियार की द्रविड़ केंद्रित विचारधारा है। धर्म की जगह, तमिल पहचान और जाति विरोधी रवैये पर पार्टी का ज्यादा जोर रहता है। द्रविड़ आंदोलनों ने धार्मिक पहचान की जगह भाषाई और क्षेत्रीय अस्मिता पर ज्यादा जोर दिया है। एक अरसे तक, यहां की राजनीति तर्कवादी रही है।
तमिलनाडु की राजनीति हिंदू, मुसलमान बनाम तमिल और गैर तमिल की रही है। इस राज्य में ब्राह्मणवादी प्रभुत्व के खिलाफ हमेशा से सुर उठे हैं। अल्पसंख्यकों का झुकाव, डीएमकी की तरफ चला गया है। पहले AIADMK के साथ भी अल्पसंख्यक थे लेकिन भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन के बाद राज्य के समीकरण बदल गए।
तमिलनाडु में भाषाई प्रभुत्व हावी है। मुस्लिम, ईसाई होने से पहले लोग अपनी तमिल पहचान को लेकर ज्यादा मुखर रहे हैं। भाषाई गौरव और तमिल की लड़ाई दशकों पुरानी है। यहां धार्मिक विभाजन, सियासी मुद्दा नहीं है। राज्य में राजनीतिक आधार, 'समाजिक न्याय रहा है।' दलितों के अधिकारों को लेकर लड़ाइयां लड़ी गईं हैं।
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तमिलनाडु में फिर कैसी राजनीति होती है?
तमिलनाडु की राजनीति, सामाजिक न्याय पर टिकी है। यहां की सियासी लड़ाई पिछड़ी जाति और दलित केंद्रित रही है। तमिलनाडु में पेरियार आंदोलन बेहद सफल रहा है।
ईवी रामास्वामी 'पेरियार' की विचारधारा तर्क, आत्म-सम्मान और जाति-उन्मूलक रही है। उन्होंने ब्राह्मणवादी वर्चस्व और सामाजिक असमानता के खिलाफ एक कट्टर मोर्चा खोला थे, जिसे तमिलनाडु में 'सुया मरियाधाई इयक्कम' के नाम से जानते हैं। यह आत्म सम्मान आदोलन के नाम से हिंदी पट्टी में चर्चा में आई।
पेरियार मानते थे कि किसी भी व्यक्ति की गरिमा उसकी जाति या धर्म से ऊपर है, इसलिए उन्होंने अंधविश्वासों और धार्मिक कट्टरता का कड़ा विरोध किया। पेरियार ने महिलाओं के अधिकारों, लैंगिक समानता और द्रविड़ पहचान ज्यादा जोर दिया। उनका तर्क था कि अगर समाज में जातिगत भेदभाव और छुआछूत जैसी कुरीतियां हैं, तब तक असली आजादी संभव नहीं है।
फिर अल्पसंख्यकों का मुद्दा कौन उठाता है?
तमिलनाडु में अलग से अल्पसंख्यक राजनीति पर जोर नहीं दिया जाता है। उन्हें सामाजिक न्याय के दायरे में ही रखकर देखा जाता है। वैसे भी सरकारी योजनाओं और कल्याणकारी कार्यक्रमों का लाभ बिना किसी धार्मिक भेदभाव के सभी समुदायों तक पहुंचता रहता है। चाहे योजनाएं केंद्र की ओर से चलाई जाएं या राज्य की ओर से।
उत्तर भारत के विपरीत, तमिलनाडु में सांप्रदायिक दंगे या बड़े धार्मिक विवाद ऐतिहासिक रूप से कम रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी जैसी हिंदुत्ववादी पार्टियां, हिंदुत्व के एजेंडे पर चल रहीं हैं लेकिन राज्य में मजबूत उपस्थिति आज भी नहीं है। साल 2014 के बाद से बीजेपी का उन राज्यों में भी विस्तार हुआ, जहां पार्टी की स्थिति शून्य रही है लेकिन वहां भी बीजेपी का जनाधार बढ़ा है। तमिलनाडु में बीजेपी को बड़ी सफलता का इंतजार है। लोग'हिंदू' पहचान से ज्यादा मजबूत 'द्रविड़' या 'तमिल' पहचान पर जोर देते हैं।
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DMK और AIADMK किसके साथ?
बीजेपी और AIADMK के गठबंधन के बाद कुछ मुस्लिम वोट, AIAMDK से छिटका है। अब DMK का मुस्लिम राजनीति करने वाली पार्टियों से गठबंधन भी है। तमिलनाडु में सत्ता DMK और AIADMK के बीच झूलती रही है। दोनों दलों का अल्पसंख्यकों के प्रति रवैया नरम है। जब तक, जयललिता थीं, तब तक, अल्पसंख्यक AIADMK के कोर वोटर रहे। DMK अब खुलकर, राज्य में धर्मनिरपेक्षता और अल्पसंख्यक अधिकारों की बात कर रही है। विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कझगम (TVK) भी अल्पसंख्यकों की बात कर रही है।
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