न समय से बैठकें, न व्यापक नीति, CBFC में किन बदलावों की जरूरत है?
केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड को 18 नए सदस्य मिले हैं। सदस्यों के मिलने के बाद भी क्यों CBFC पर सवाल उठ रहे हैं, आइए समझते हैं।

सांकेतिक तस्वीर। AI इमेज। Photo Credit: ChatGPT
सेंसर बोर्ड का नाम सुना है? भारत में जो फिल्में आप तक पहुंचती हैं, उन्हें पास करने या अटकाने का अधिकार इसी बोर्ड के पास होता है। किन फिल्मों पर कैंची चलेगी, कौन से सीन हटाए जाएंगे, क्या विवादित है, क्या नहीं जाएगा, इसका अधिकार, फिल्म के निर्देशक से कहीं ज्यादा, बोर्ड के फैसले पर निर्भर है।
सिनेमेटोग्राफ अधिनियम, 1952 के तहत, ही केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) की स्थापना का प्रावधान है। यह सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के आधीन आता है। संस्था में नए सदस्यों की नियुक्ति हुई है, जिसे लेकर एक बार फिर सवाल उठे हैं। सवाल इसलिए जिन सितारों को इस बोर्ड में शामिल किया गया है, वे अति व्यस्त कलाकारों मे से एक हैं।
यह भी पढ़ें: कैसी है CBFC की नई टीम, किसे जगह, कौन बाहर, क्या बदलेगा? हर सवाल का जवाब
बोर्ड में कौन-कौन होते हैं?
CBFC में 12 से 25 की संख्या तक, गैर सरकारी सदस्य होते हैं। एक अध्यक्ष होता है, जिसकी नियुक्ति केंद्र सरकार करती है। यह पैनल, सिर्फ 2 साल के लिए गठित होता है। मुख्यालय मुंबई में है, बेंगलुरु, चेन्नई, कटकट, गुवाहाटी, हैदराबाद, कोलकाता, मुंबई, नई दिल्ली और तिरुवनंतपुरम में इससे दफ्तर हैं। तय तंत्र के बाद भी CBFC पर हमेशा से सवाल भी उठते रहे हैं। वजह यह है कि बोर्ड के सदस्य सही समय पर बैठक तक नहीं कर पाते हैं।
समन्यवय मिश्रा, क्रिएटिव डायरेक्टर, किरण राव प्रोडक्शन:-
फिल्म निर्माता और निर्देशक बार-बार मांग करते हैं कि सर्टिफिकेशन की प्रक्रिया ज्यादा पारदर्शी और साफ-सुथरी हो। सबसे बड़ी शिकायत यह है कि बोर्ड किसी सीन या डायलॉग पर आपत्ति जताते वक्त साफ वजह नहीं बताता। कट सुझाने या फिल्म को खास सर्टिफिकेट देने का फैसला कई बार मनमाना लगता है। इसके अलावा सर्टिफिकेशन में बहुत समय लग जाता है। कई फिल्में रिलीज डेट के करीब तक अटकी रहती हैं, जिससे निर्माताओं को नुकसान होता है। CBFC की ओर से एक तय समय-सीमा और साफ दिशा-निर्देश होने चाहिए, जिससे हर फिल्म एक जैसे नियमों पर परखी जाए।
CBFC के नए सदस्य कौन हैं?
विनोद अनुपम
मनोज जोशी
अभिषेक जैन
रिकी केज
प्रियदर्शन
सुनील शेट्टी
हंसराज हंस
सुप्रिया यारलागड्डा
यतीन्द्र मिश्र
रूपाली गांगुली
प्रीति जिंटा
नीला माधब पांडा
पंकज त्रिपाठी
प्रोसेनजीत चटर्जी
पल्लवी जोशी
निशिगंधा वाड
वामन केंद्रे
रमेश पतंगे
CBFC की कार्यप्रणाली पर सवाल क्यों उठते हैं?
फिल्म अभिनेता अभिमन्यु सरकार ने कहा, 'सेंसर बोर्ड अब फिल्मों को सिर्फ सर्टिफिकेट देने वाली संस्था से कहीं ज्यादा बढ़ गया है। अब नैतिकता के आधार पर बहुत कट-अनकट लगते हैं। निर्देशक, कलाकार का पक्ष जाने बिना कैंची चला दी जाती है, जिसकी वजह से पूरी फिल्म की कहानी प्रभावित होता है। राजनीति खूब चलती है, आलोचना पर कट लग जाता है। 'सतलुज' से 'उड़ता पंजाब' तक में बोर्ड के फैसले हमेशा सवालों के घेरे में रहे। सेंसर बोर्ड के अपने सदस्यों की राय इतनी उलझी हुई है कि स्पष्ट फैसले तक नहीं ले पाते हैं।'
एक अन्य कलाकार ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, 'केरल हाई कोर्ट तक CBFC को कह चुकी है कि उसका काम नैतिकता सिखाना नहीं है। फिल्म के टाइटल, कहानी या प्रस्तुति पर पुलिसिंग करना भी नहीं। संस्कृति की रक्षा के नाम पर सिनेमा को रोकना तो बिल्कुल नहीं है। फिर भी धड़ल्ले से यह काम हो रहा है। जो नीतियां बनानी चाहिए, उन पर बात ही नहीं की जाती है।'
यह भी पढ़ें: 'फुले' से नाराज ब्राह्मण समाज, विवाद के चलते नहीं रिलीज हुई फिल्म

कब विवादों में रही सेंसर बोर्ड की कैंची?
अभिमन्यु सरकार ने कहा, 'दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'सतलुज' कभी कट के साथ रिलीज को कहा गया, कभी रिलीज रोकी गई। फिल्म का मूल नाम 'पंजाब 95' था, जिसे 'सतलुज' किया गया, फिर भी यह रिलीज नहीं हो पाई। CBFC ने रिलीज की इजाजत ही नहीं दी।'
बीजेपी सांसद और अभिनेत्री कंगना रनौत की फिल्म 'इमरजेंसी' पर भी खूब कैंची चली। फिल्म की कहानी प्रभावित हुई। वह 3 कट के बाद दुखी हुईं थी और चाहती थीं कि फिल्म के मूल संस्करण को ही लोगों तक पहुंचाया जाए। जानकी बनाम स्टेट ऑफ केरल के निर्माताओं ने 12 जून 2025 को सर्टिफिकेशन के लिए आवेदन किया था। रिलीज की तारीख 27 जून तय थी।
सामान्य प्रक्रिया में एग्जामिनिंग कमेटी ने फिल्म पास कर दी लेकिन चेयरपर्सन ने रिवाइजिंग कमेटी को भेज दिया। वजह किरदार का नाम 'जानकी' था। जानकी, सीता का एक नाम है, जिसे लेकर आपत्ति थी। 'फुले' फिल्म भी चर्चा में रही है। चाहे पहलाज निहलानी चेयरमैन रहे हों या प्रसून जोशी, सबके कार्यकाल के दौरान एक से बढ़कर एक विवादित फैसले लिए गए, जिसकी वजह से CBFC की किरकरी हुई।
यह भी पढ़ें: मोहन लाल की L2 Empuraan पर विवाद क्यों? रिलीज के बाद लगेंगे 17 कट्स

जरूरत से ज्यादा दखल देता है CBFC?
साल 2016 में 'उड़ता पंजाब' में 90 से ज्यादा कट्स मांगे गए थे। 'पंजाब' शब्द और ड्रग्स के जिक्र तक हटाने को कहा गया। बॉम्बे हाईकोर्ट ने फिल्म को लगभग बिना कट के पास कर दिया और कहा कि वयस्क दर्शकों को बच्चे नहीं समझा जा सकता। 'फुले' में जाति व्यवस्था पर कई कट्स मांग लिए गए। कई फिल्में अस्तित्व तक में भी नहीं आ पाती हैं। सेंसर बोर्ड नीतियों से ज्यादा 'नैतिकता' सिखाता है, जिसकी वजह से निर्देशक और निर्माताओं को जूझना पड़ता है। 
CBFC पर सवाल क्यों उठते हैं?
द हिंदू की एक रिपोर्ट के मुताबिक साल 2021 में फिल्म सर्टिफिकेशन अपीलेट ट्रिब्यूनल (FCAT) खत्म कर दिया गया। अब निर्माताओं को सीधे हाईकोर्ट जाना पड़ता है। फिल्म निर्माता भी इससे नाखुश हैं। फिल्म अभिनेता अभिमन्यु सरकार ने कहा कि अब तो कई स्क्रिप्ट यह सोचकर ही नहीं बन पाती है कि क्या कट जाएगा। ओटीटी प्लेटफॉर्म तक भी अब दबाव में हैं। कई निर्माता और लेखक अब सुरक्षित और हल्की कहानियां ही लिखते हैं। जब तक, आलोचना को स्वीकार करने वाले लोग बोर्ड में नहीं होंगे, CBFC पर सवाल उठते रहेंगे।
समन्वय मिश्रा, फिल्म मेकिंग से जुड़े हैं और किरण राव प्रोडक्शन की एक प्रोजेक्ट का हिस्सा हैं। उन्होंने कहा,'दूसरा बड़ा मुद्दा बोर्ड की आजादी और सदस्यों की नियुक्ति का है। सदस्यों को सरकार चुनती है इसलिए कई आलोचक कहते हैं कि बोर्ड पर राजनीतिक दबाव या किसी खास सोच का असर पड़ता है। बोर्ड में फिल्म इंडस्ट्री, कानून के जानकार और सामाजिक क्षेत्र के अलग-अलग और स्वतंत्र लोग शामिल किए जाएं। इसके अलावा उम्र के हिसाब से सर्टिफिकेट सिस्टम को और बेहतर बनाने, ओटीटी और थिएटर के नियमों में तालमेल बिठाने पर जोर दिया जाए। बोर्ड के फैसले के खिलाफ अपील को आसान और तेज करने की भी जरूरत है।'
और पढ़ें
Copyright ©️ TIF MULTIMEDIA PRIVATE LIMITED | All Rights Reserved | Developed By TIF Technologies
CONTACT US | PRIVACY POLICY | TERMS OF USE | EDITORIAL POLICY | Sitemap




