असम के महान सेनापति लचित बोरफुकन की बहादुरी की कहानी अब पूरी दुनिया देखेगी। असम की सरकार उनके जीवन पर एक बड़ी हिंदी फिल्म बनाने की तैयारी कर रही है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने बताया है कि इस फिल्म को बनाने के लिए '
धुरंधर
' फिल्म के निर्देशक आदित्य धर से बातचीत शुरू हो गई है। सरकार का मकसद यह है कि लचित बोरफुकन की वीरता, उनके त्याग और उन्होंने मुगलों को साराघाट की लड़ाई में कैसे हराया यह बात पूरी दुनिया को पता चले और इस महान योद्धा की कहानी को बड़े पर्दे पर भव्य रूप में दिखाया जा सके।
लचित बोरफुकन असम के सबसे बड़े योद्धाओं में गिने जाते हैं। वे अपनी हिम्मत और देश के लिए प्यार के लिए जाने जाते हैं। उनका जन्म 24 नवंबर, 1622 को चराइदेव इलाके में हुआ था। उनके पिता का नाम मोमाई तमुली बोरबरुआ था जो राजा प्रताप सिंह के समय अहोम सेना के बड़े सेनापति थे। उनकी मां का नाम कुंती मोरन था। लचित घर में सबसे छोटे थे। उन्होंने बचपन से ही लड़ाई की तकनीक, शासन चलाने का तरीका, हिसाब-किताब और अहोम धर्मग्रंथों की पढ़ाई की थी। इन सब चीजों ने उन्हें एक बड़ा नेता बनने के लिए तैयार किया।
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साराघाट की लड़ाई
लचित की सबसे बड़ी जीत 1671 में साराघाट की लड़ाई में हुई थी। उस समय मुगल राजा औरंगजेब ने राजा राम सिंह प्रथम को एक बहुत बड़ी सेना के साथ असम पर हमला करने भेजा था। लचित ने अपनी बुद्धि का इस्तेमाल किया और मुगलों को फंसाने के लिए छिपकर लड़ाई लड़ी। उन्हें ब्रह्मपुत्र नदी की पूरी जानकारी थी। लड़ाई के दौरान वे बहुत बीमार थे फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। जब उनके सैनिक लड़ाई से पीछे हटने लगे तो लचित खुद अपनी नाव पर बैठकर लड़ने पहुंच गए और सैनिकों को देश के लिए जान देना सिखाया। उनका यह हौसला देखकर अहोम सेना ने मुगलों को हरा दिया और उन्हें असम से बाहर निकाल दिया।
फिल्म की प्लानिंग
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने बताया कि सरकार इस फिल्म को लेकर बहुत गंभीर है। उन्होंने बताया कि 'धुरंधर' फिल्म बनाने वाले आदित्य धर से फिल्म के बारे में चर्चा हुई है। आदित्य धर के अगस्त महीने में असम आने की उम्मीद है। मुख्यमंत्री ने साफ कहा कि अगर किसी वजह से आदित्य धर यह फिल्म नहीं बना पाते हैं तो सरकार दूसरे बड़े निर्देशकों से बात करेगी। यह काम असम सरकार के 2026-27 के बजट का हिस्सा है जिसमें लचित बोरफुकन और कुशल कोंवर जैसे वीरों पर फिल्में बनाई जानी हैं। अभी तक आदित्य धर की तरफ से कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं आई है।
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साराघाट की जीत के करीब एक साल बाद लचित बोरफुकन का निधन हो गया। साल 1672 में जोरहाट के पास हूलुंगापारा में उनकी समाधि बनी, जिसे 'लचित मैदम' कहते हैं। उनकी वीरता को याद करने के लिए हर साल 24 नवंबर को पूरे असम में 'लचित दिवस' मनाया जाता है। उनकी लीडरशिप को सम्मान देने के लिए नेशनल डिफेंस एकेडमी (NDA) में हर साल उस कैडेट को 'लचित बोरफुकन गोल्ड मेडल' दिया जाता है जो ट्रेनिंग के दौरान सबसे अच्छा लीडर बनकर दिखाता है।