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जमात-ए-इस्लामी की हार, BNP की प्रंचड जीत, बांग्लादेश में कैसे हुआ? इनसाइड स्टोरी

बांग्लादेश में 12 फरवरी 2026 को हुए ऐतिहासिक आम चुनाव और जनमत संग्रह के नतीजे आ गए हैं। शेख हसीना सरकार के पतन के बाद अब तारिक रहमान युग की शुरुआत हो रही है।

TARIQUE RAHMAN

बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के चीफ तारिक रहमान। Photo Credit: PTI

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बांग्लादेश में 12 फरवरी 2026 को हुए आम चुनावों के बाद अब बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की सरकार बनने जा रही है। मोहम्मद यूनुस के छोटे से शासनकाल के बाद अब देश की बागडोर, तारिक रहमान के हाथ में आने वाली है। अगस्त 2024 में शेख हसीना के अपदस्थ होने के बाद बांग्लादेश में जारी अस्थिरता, अब जाकर थमी है। 

बांग्लादेश में करीब 60 फीसदी मतदाताओं ने वोट डाला। चुनाव के साथ ही जुलाई नेशनल चार्टर पर रेफरेंडम भी हुआ, जिसमें संविधान में बड़े बदलावों को मंजूरी दी गई। प्रधानमंत्री के लिए दो कार्यकाल की सीमा, द्विसदनीय संसद, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, महिलाओं और युवाओं के लिए बेहतर प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दे, इस जनमत संग्रह में शामिल थे। रेफरेंडम में करीब 68 फीसदी लोगों ने हां में वोट किया।

बांग्लादेश में अब लोग संरचनात्मक सुधार चाहते हैं। बांग्लादेश की संसद में कुल 300 सीटें हैं। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की अगुवाई वाले गठबंध ने बहुमत हासिल किया है। BNP और उसके सहयोगियों ने 212 सीटें जीतीं हैं। यह दो-तिहाई से ज्यादा है।

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BNP की प्रचंड जीत और सत्ता में वापसी

तारीक रहमान के नेतृत्व वाले बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी गठबंधन ने 300 सदस्यीय संसद में 212 से 216 सीटों के साथ भारी बहुमत हासिल किया है। इस जीत के साथ BNP लगभग 20 साल बाद फिर से सत्ता में लौट रही है। पार्टी के 60 वर्षीय अध्यक्ष तारीक रहमान का अगला प्रधानमंत्री बनना तय है, जिन्होंने खुद दो सीटों ढाका-17 और बोगरा-6 से जीत दर्ज की है।
 

'जुलाई नेशनल चार्टर' पर जनमत संग्रह

चुनाव के साथ ही संविधान संशोधन के लिए एक जनमत संग्रह भी कराया गया। लगभग 60 फीसदी मतदाताओं ने 'जुलाई नेशनल चार्टर' के पक्ष में मतदान किया। इस चार्टर के तहत अब बांग्लादेश के राजनीतिक ढांचे में बड़े बदलाव होंगे, जिनमें शामिल हैं-

  • प्रधानमंत्री के लिए अधिकतम दो कार्यकाल की सीमा
  • न्यायपालिका की स्वतंत्रता और द्विसदनीय विधायिका
  • महिलाओं और युवाओं के लिए बेहतर प्रतिनिधित्व                                                                                                                     

 जमात-ए-इस्लामी दूसरी बड़ी ताकत

शेख हसीना की 'अवामी लीग' के चुनाव से बाहर रहने की वजह से जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाले 11 दलों के गठबंधन ने मुख्य विपक्षी की भूमिका निभाई। जमात गठबंधन ने 77 सीटें हासिल की हैं। जमात ने अकेले 68 सीट हासिल की हैं, जो इस पार्टी का अब तक का सर्वश्रेष्ठ चुनावी प्रदर्शन है। नए बांग्लादेश की राजनीति में रूढ़िवादी और इस्लामी ताकतों का प्रभाव बना रहेगा।

यह भी पढ़ें: बांग्लादेश चुनाव: 'सेवन सिस्टर्स' को अलग करेंगे,' कहने वाले नेता का क्या हुआ?

छात्र नेताओं की करारी हार

हसीना विरोधी आंदोलन का चेहरा रहे छात्र नेताओं की पार्टी नेशनल सिटीजन पार्टी (NCP) को जनता ने नकार दिया है। 30 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली इस पार्टी को मात्र 6 सीटों पर ही जीत मिली। जमात-ए-इस्लामी के साथ उनके चुनावी गठबंधन को भी इस हार की एक बड़ी वजह माना जा रहा है।

भारत के साथ संबंधों का नया दौर

चुनावी नतीजों के बाद भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तारीक रहमान को बधाई दी है। नए प्रशासन के सामने भारत के साथ संबंधों को फिर से पटरी पर लाने की चुनौती होगी। सीमा सुरक्षा, जल बंटवारा और शेख हसीना के भारत में प्रवास जैसे संवेदनशील मुद्दों पर बीएनपी का रुख, मोहम्मद यूनुस की तरह आपत्तिजनक है। 

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BNP की जीत क्यों हुई?

वैश्विक राजनीति पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि तारिक रहमान की वापसी ने काफी हद तक यह तय कर दिया था कि बांग्लादेश के लोग उन्हें ही बागडोर सौंपने वाले हैं। शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग के चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध था। इसके चलते अवामी लीग का पारंपरिक वोटर और सत्ता विरोधी लहर का पूरा लाभ देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बीएनपी को मिला। छात्र आंदोलन और हिंसा के बाद जनता एक मजबूत और अनुभवी पार्टी चाहती थी, जिसके पास सत्ता का अनुभव रहा हो।

जमात इस लिस्ट से बाहर थी, बीएनसी के पास यह मौका था। नए छात्र दलों के पास शासन का अनुभव नहीं था, इसलिए लोगों ने पुराने नेतृत्व पर भरोसा जताया। बांग्लादेश में मुख्य मुकाबला बीएनपी और कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी के बीच था। उदारवादी और महिला मतदाताओं ने जमात की कट्टर विचारधारा के बजाय बीएनपी की थोड़ी उदार राजनीति पर भरोसा जताया। तारीक रहमान ने संविधान संशोधन की राह दिखाई, जिस पर जनता ने यकीन किया। उनके वादों पर जनता ने भरोसा जता दिया।


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