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गलवान झड़प के 7 दिन बाद चीन ने किया था न्यूक्लियर टेस्ट, 6 साल बाद खुलासा

चीन ने आज से छह साल पहले परमाणु परीक्षण किया था। इसका खुलासा अब अमेरिका ने किया है। गलवान झड़प के सात दिन बाद ही गुप्त तरीके से चीन यह परीक्षण किया था।

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डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग। ( Photo Credit: PTI)

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भारत और चीन के सैनिकों के बीच 15 जून 2020 को गलवान में झड़प हुई थी। इसमें 20 भारतीय जवानों ने वीरगति को प्राप्त किया था। वहीं चीन को भी अपने 40 सैनिक खोने पड़े थे। घटना के करीब सात दिन बाद यानी 22 जून 2020 को चीन ने एक गुप्त परमाणु परीक्षण किया था। इसका खुलासा अमेरिका ने खुद किया। इसके अलावा अमेरिका ने चीन और रूस पर न्यू START संधि के उल्लंघन का आरोप लगाया। अमेरिकी विदेश उप सचिव थॉमस जी डिनानो का कहना है कि चीन ने परमाणु परीक्षण में नई डिजाइन तकनीकों का इस्तेमाल किया, ताकि अंतरराष्ट्रीय निगरानी से बचा जा सके।

 

अमेरिकी विदेश उप सचिव थॉमस जी डिनानो ने कहा, चीन ने न्यूक्लियर एक्सप्लोसिव टेस्ट किए हैं। इसमें सैकड़ों टन की तय क्षमता वाले टेस्ट की तैयारी भी शामिल है। चीन ने अपनी गतिविधियों को दुनिया से छिपाने की खातिर डीकपलिंग का इस्तेमाल किया। यह भूकंपीय निगरानी की प्रभावशीलता को कम करने का एक तरीका है। उन्होंने आगे खुलासा किया कि चीन ने 22 जून 2020 को ऐसी ही क्षमता वाला एक परमाणु परीक्षण किया था।

 

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बता दें कि अमेरिकी विदेश विभाग ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस दावे के करीब तीन महीने बाद चीन के परमाणु परीक्षण का खुलासा किया, जिसमें 31 अक्टूबर को ट्रंप ने चीन और पाकिस्तान पर परमाणु परीक्षण करने का आरोप लगाया था। यह भी ऐलान किया था कि अमेरिका भी अन्य देशों की तरह परमाणु परीक्षण शुरू करेगा। हालांकि चीन ने गुप्त तरीके से परमाणु परीक्षण करने के अमेरिकी दावे का खंडन किया।

 

 

 

 

अमेरिकी विदेश विभाग ने कहा, 'न्यू START संधि 2010 में साइन की गई थी। अब 2026 में वॉरहेड्स और लॉन्चर पर इसकी लिमिट काम की नहीं रही, जब एक परमाणु शक्ति अपने हथियारों का जखीरा इतनी तेजी और बड़े पैमाने से बढ़ा रहा है। यह आधी सदी से अधिक समय में नहीं देखा गया है। दूसरा देश न्यू START की शर्तों से बिना किसी रोक के न्यूक्लियर सिस्टम की एक बड़ी रेंज को बनाए रख रहा है और डेवलप कर रहा है।'

चीन के न्यूक्लियर हथियार न्यू START संधि में नहीं

विभाग ने आगे बताया कि अमेरिका की लगभग सभी तैनात न्यूक्लियर फोर्स न्यू START संधि के तहत थीं, जबकि रूस का बहुत बड़े जखीरे में से सिर्फ एक छोटा सा हिस्सा ही इसके अंतर्गत आता था। इस संधि के तहत चीन के एक भी न्यूक्लियर हथियार को कवर नहीं किया गया था। अब 2010 की राजनीतिक-मिलिट्री परिस्थितियों और उनसे हुई संधि की पाबंदियों से आजाद होकर दूसरे देशों के अस्थिर करने वाले बर्ताव के जवाब में अमेरिका आखिरकार ऐसे कदम उठा सकता है, जिससे अमेरिकी लोगों और हमारे सहयोगियों की तरफ से प्रतिरोध को मजबूत किया जा सके।

 

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अब नए सिस्टम की जरूरत है

अमेरिका ने न्यू START की जगह नई संधि बनाने की वकालत की। उसका मानना है कि इसमें चीन के परमाणु हथियारों को भी शामिल किया जाए। अमेरिकी विदेश विभाग ने कहा, 'इन सभी वजहों में रूस द्वारा लगातार नियमों का उल्लंघन, दुनियाभर में हथियारों के जखीरे में बढ़ोतरी और न्यू START के डिजाइन और लागू करने में कमियां को देखते हुए अमेरिका के लिए यह जरूरी है कि वह एक नए सिस्टम की मांग करे जो आज के खतरों से निपटे, न कि बीते समय के खतरों से।'


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