इजरायल में चुनाव आते ही नेताओं के भाषण और सरकारी आयोजनों को लेकर कानून सख्त हो जाता है। हाल ही में सेना के एक ग्रेजुएशन प्रोग्राम से यह बहस फिर छिड़ गई है कि क्या प्रधानमंत्री या मंत्री चुनाव के वक्त सरकारी मंचों का इस्तेमाल कर सकते हैं? निष्पक्षता बनाए रखने के लिए अटॉर्नी जनरल के आदेश पर सैन्य कार्यक्रम का सीधा प्रसारण ही रोक दिया गया। ताकि इसका चुनावी फायदा न उठाया जा सके।
यह पूरा मामला 21 अक्टूबर 2026 का है जब दक्षिणी इजरायल के बहाद-1 सैन्य प्रशिक्षण संस्थान में एक पासिंग आउट परेड का आयोजन होना था। इसमें प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और रक्षा मंत्री इजरायल काट्ज मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होने वाले थे। चुनाव की सरगर्मी को देखते हुए सेना ने कानूनी सलाह मांगी और अटॉर्नी जनरल के कार्यालय के निर्देश पर लाइव प्रसारण को पूरी तरह रोक दिया।
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क्या है इजरायल का चुनावी कानून?
इजरायल में चुनाव प्रचार और सरकारी संसाधनों के इस्तेमाल पर Knesset Elections Law (Propaganda Methods), 1959 के तहत कड़ी पाबंदियां हैं। इसके अंतर्गत कानून की धारा 2A साफ कहती है कि चुनाव जीतने या प्रचार करने के लिए सरकारी पैसे, संपत्ति या संस्थानों का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। इसके अलावा चुनाव से ठीक 60 दिन पहले टीवी और रेडियो पर चुनावी विज्ञापनों और प्रचार सामग्री के प्रसारण पर विशेष बंदिशें लागू हो जाती हैं। प्रधानमंत्री या मंत्रियों को सरकारी काम करने या भाषण देने से नहीं रोका जाता लेकिन अगर वे उस मंच से वोट मांगते हैं या विरोधियों पर निशाना साधते हैं तो इसे गैर-कानूनी माना जाता है।
पहले भी उठे हैं सवाल
सरकारी संसाधनों के गलत इस्तेमाल का यह पहला मामला नहीं है। अक्टूबर 2026 में ही प्रधानमंत्री के एक बयान को सरकारी सोशल मीडिया अकाउंट्स से शेयर कर दिया गया था। कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद उस पोस्ट को हटाया गया और केंद्रीय चुनाव समिति ने इसे सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग माना था।
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समारोह के सीधे प्रसारण को रोकने का यह फैसला दिखाता है कि इजरायल में चुनावी निष्पक्षता और सरकारी पदों की मर्यादा को लेकर कानून कितना सख्त है। हालांकि अधिकारियों ने पीएम को भाषण देने से नहीं रोका था और न ही उन्होंने वहां कोई चुनावी भाषण दिया। ऐहतियात के तौर पर लाइव टेलीकास्ट बंद करके यह सुनिश्चित किया गया कि सरकारी और सैन्य मंचों का फायदा चुनाव में न उठाया जा सके।