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क्या भारतीय संविधान देगा पाकिस्तानी महिला को न्याय? अनुच्छेद 226 को समझिए

भारत में एक पाकिस्तानी हिंदू कपल की शादी-तलाक का मामला चर्चा में है। इस केस में पाकिस्तानी महिला ने हाई कोर्ट में अपील दायर की है।

High court of MP

इंदौर बेंच, Photo Credit- MP High Court

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भारत में इन दिनों एक पाकिस्तानी हिंदू दंपति की शादी और तलाक से जुड़ा मामला चर्चा में है। विक्रम नागदेव और उनकी पत्नी निकिता नागदेव, दोनों पाकिस्तानी नागरिक हैं। दोनों ने पाकिस्तान में शादी की थी लेकिन भारत आने के बाद लड़की को उसके ससुराल वालों ने छोड़ दिया। इसके बाद निकिता ने न्याय के लिए इंदौर हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। उन्होंने कोर्ट में जो अपील की है वह संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत आएगी। इस याचिका के बाद यह सवाल उठता है कि क्या इस प्रावधान के तहत कोई व्यक्ति अदालत में न्याय की मांग कर सकता है या नहीं।

 

निकिता की ओर से याचिका दाखिल किए जाने के बाद गृह मंत्रालय ने भी मामले की जांच शुरू कर दी है। इस मामले की सुनवाई इसी हफ्ते अदालत में होनी है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि एक पाकिस्तानी लड़की को भारत में न्याय कैसे मिलेगा?

 

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क्या है पूरा मामला?

5 साल पहले पाकिस्तान के कराची में विक्रम नागदेव और निकिता नागदेव की शादी हुई थी। विक्रम नागदेव एक बार निकिता को भारत लेकर भी आए लेकिन एक महीने के बाद ही वापस भेज दिया। तब से निकिता अपने पति के पास लौटने का इंतजार कर रही थी। निकिता को पता चला कि विक्रम दिल्ली की एक लड़की से शादी करने वाला है और दोनों ने सगाई कर ली है और 10 मार्च 2026 को शादी करने की तैयारी में है।

 

निकिता फिलहाल पाकिस्तान में हैं लेकिन उन्होंने स्थानीय पंचायत (इंदौर) में शादी रोकने की अपील की। इसके बाद पंचायत ने इस मामले में इंदौर कलेक्टर को पत्र लिखकर लड़के को देश से निकालने की सिफारिश की है। दोनों जगहों से न्याय न मिलने के बाद निकिता ने हाई कोर्ट में शरण ली है। आपको बता दें कि निकिता ने कोर्ट में जो याचिका दायर की है वह संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत आएगी। 

 

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 226 पाकिस्तानी नागरिकों सहित सभी विदेशी नागरिकों पर लागू होता है। ऐसा इसलिए क्योंकि यह हाई कोर्ट को न केवल मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए बल्कि किसी अन्य वजहों से रिट जारी करने की शक्ति देती है।

 

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क्या है आर्टिकल 226?

यह अनुच्छेद भारत के सभी हाई कोर्ट को अपने क्षेत्राधिकार के भीतर किसी भी व्यक्ति, ऑथोरिटी या यहां तक कि सरकार को भी निर्देश, आदेश या रिट जारी करने का अधिकार देता है। यह शक्ति दो प्रमुख उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल की जाती है:

  • संविधान के भाग III में दिए गए नागरिकों के मौलिक अधिकारों को लागू करने के लिए। यह शक्ति सुप्रीम कोर्ट के अनुच्छेद 32 के बराबर है।
  • इसका मतलब है कि हाई कोर्ट मौलिक अधिकारों के अलावा किसी भी अन्य कानूनी अधिकार या पब्लिक ड्यूटी के उल्लंघन के मामले में भी रिट जारी कर सकता है। यह अनुच्छेद 32 से अधिक शक्ति हाई कोर्ट को देता है।

रिट 5 तरह के होते है जिसके तहत हाई कोर्ट आदेश जारी कर सकता है-

  • Habeas Corpus (बंदी प्रत्यक्षीकरण)- किसी व्यक्ति को अवैध रूप से हिरासत में लिए जाने पर उसे न्यायालय के सामने प्रस्तुत करने का आदेश।
  • Mandamus (परमादेश)- किसी को भी उसके कानूनी कर्तव्य का पालन करने का आदेश दिया जा सकता है।
  • Prohibition (प्रतिषेध)- अधीनस्थ न्यायालय को उसके क्षेत्राधिकार से बाहर जाने से रोकने के लिए जारी किया जाता है।
  • Certiorari (उत्प्रेषण)- अधीनस्थ न्यायालय के आदेश या निर्णय को रद्द करने के लिए या मामले को हाई कोर्ट में ट्रांसफर करने के लिए जारी किया जाता है।
  • Quo-Warranto (अधिकार पृच्छा)- किसी व्यक्ति से यह पूछना कि वह किस कानूनी अधिकार से किसी पद पर बैठा हुआ है।

 

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लागू होने के कारण

अनुच्छेद 226 मौलिक अधिकारों तक सीमित नहीं है, जैसा कि अनुच्छेद 32 है। यह हाई कोर्ट को किसी भी कानूनी अधिकार के उल्लंघन या किसी सरकारी संस्था को अपने कानूनी कर्तव्य का पालन न करने के खिलाफ राहत देने की अनुमति देता है। विदेशी नागरिक भारत में रहते हुए या देश में आने के बाद से कुछ कानूनी अधिकारों और मानवाधिकारों के हकदार होते हैं और इन अधिकारों के उल्लंघन के के लिए वे अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट जा सकते हैं।

 

भारतीय संविधान के मौलिक अधिकार को दो श्रेणी में बांटा गया है:

  • केवल नागरिकों के लिए जैसे अनुच्छेद 15, 16, 19, 29, 30। पाकिस्तानी नागरिक इन अधिकारों के उल्लंघन के लिए 226 का प्रयोग नहीं कर सकते।
  • सभी 'व्यक्तियों' के लिए जैसे अनुच्छेद 14 (कानून के सामने समानता), अनुच्छेद 20 (किसी भी अपराध के संंबंध में जब तक की दोष की सिद्धि नहीं हुई हो तब तक बचाव) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण)।
  • यदि भारत में किसी पाकिस्तानी नागरिक के जीवन, स्वतंत्रता या कानून के समक्ष समानता के अधिकार का उल्लंघन होता है तो वे निश्चित रूप से अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर कर सकते हैं।

क्या सीमाएं हैं?

यह जानना जरूरी है कि अनुच्छेद 226 लागू होते हुए भी पाकिस्तानी नागरिक कई अधिकारों का दावा नहीं कर सकते जिसके कारण उन्हें कोर्ट से राहत नहीं मिल पाएगी। जैसे-

  • विदेशी नागरिक, चाहे वे पाकिस्तानी ही क्यों न हों, भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(1)(e) के तहत भारत में रहने और बसने के मौलिक अधिकार का दावा नहीं कर सकते।
  • भारत सरकार की विदेशियों को देश से बाहर निकालने की शक्ति निरंकुश और असीमित है। हालांकि, यदि निष्कासन मनमाना या दुर्भावनापूर्ण है तो इसे चुनौती दी जा सकती है लेकिन नागरिकता अधिकार के रूप में नहीं।
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