बराबर मौका और उचित बंटवारा, समाजवादी नीति ने वेनेजुएला जैसे कितने देश डुबा दिए?
समाजवाद समानता और संसाधनों के समान वितरण की विचारधारा है। इतिहास में अत्यधिक सरकारी नियंत्रण के साथ इसके पूर्ण लागू से कई देशों को आर्थिक-सामाजिक नुकसान भी हुआ।

प्रतीकात्मक तस्वीर, AI Sora
समाजवाद एक ऐसी विचारधारा है जिसका मूल उद्देश्य समाज में समानता लाना और संसाधनों का समान रूप से बंटवारा करना है। कार्ल मार्क्स और व्लादिमीर लेनिन की नीतियां आधुनिक इतिहास की सबसे प्रभावशाली समाजवादी सोच मानी जाती हैं। कार्ल मार्क्स को समाजवाद का जनक कहा जाता है जबकि लेनिन ने इन सिद्धांतों को व्यवहार में उतारते हुए दुनिया का पहला समाजवादी देश सोवियत संघ स्थापित किया। इतिहास बताता है कि जब समाजवाद को पूरी तरह और अत्यधिक सरकारी नियंत्रण के साथ लागू किया गया, तो कई समृद्ध देश आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर हो गए।
कई देशों में समाजवाद असफल रहा क्योंकि केंद्रीकृत योजना प्रणाली प्रभावी नहीं थी। आर्थिक स्वतंत्रता की कमी, बढ़ती नौकरशाही, भ्रष्टाचार और बाजार की ताकतों से तालमेल न बैठ पाने के कारण आर्थिक ठहराव और जनता में असंतोष बढ़ा। इसी वजह से सोवियत संघ, पूर्वी यूरोप और वेनेजुएला जैसे कई समाजवादी देशों का पतन हुआ।
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आर्थिक पतन के मुख्य कारण
समाजवादी व्यवस्थाओं में अक्सर कुछ बुनियादी कमियां देखी गई हैं जो अंततः देश की अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचाती हैं। जब सरकार सब कुछ नियंत्रित करती है, तो निजी फायदे की प्रेरणा खत्म हो जाती है। इससे लोग नया सोचने या कड़ी मेहनत करने के बजाय केवल सरकारी निर्देशों पर निर्भर हो जाते हैं।
केंद्रीय योजना अक्सर बाजार की वास्तविक मांग को समझने में विफल रहती है। इसके परिणामस्वरूप या तो सामान की भारी कमी हो जाती है या फिर जरूरत से ज्यादा उत्पादन जिससे बर्बादी होती है। सत्ता का सारा केंद्र सरकार के पास होने से भ्रष्टाचार बढ़ता है। आम जनता के बजाय केवल सत्ता के करीबी लोग ही संसाधनों का लाभ उठाते हैं। कई लोकलुभावन योजनाओं/ फ्रीबीज पर इतना खर्च कर दिया जाता है कि देश का खजाना खाली हो जाता है जिससे महंगाई बेकाबू हो जाती है।
देशों के उदाहरण
वेनेजुएला: वेनेजुएला कभी दक्षिण अमेरिका का सबसे अमीर देश था लेकिन ह्यूगो चावेज और निकोलस मादुरो की नीतियों (जैसे उद्योगों का राष्ट्रीयकरण, मूल्य नियंत्रण और तेल पर अत्यधिक निर्भरता) ने इसे दुनिया की सबसे खराब मुद्रास्फीति (Hyperinflation) और गरीबी के गर्त में धकेल दिया।
जिम्बाब्वे: हालांकि जिम्बाब्वे पूरी तरह समाजवादी देश नहीं था लेकिन रॉबर्ट मुगाबे की 'भूमि पुनर्वितरण' नीतियों और अंधाधुंध नोट छापने की प्रवृत्ति ने देश को तबाह कर दिया। यहां मुद्रास्फीति इतनी बढ़ गई थी कि एक ब्रेड के पैकेट के लिए भी लाखों जिम्बाब्वे डॉलर देने पड़ते थे।
सोवियत संघ (USSR): 1991 में सोवियत संघ का विघटन इस बात का सबसे बड़ा ऐतिहासिक प्रमाण माना जाता है कि 'कमांड इकोनॉमी' (जहां सरकार तय करती है कि क्या और कितना उत्पादन होगा) लंबी अवधि में विफल हो सकती है। वहां भारी उद्योगों पर ध्यान दिया गया लेकिन आम जनता के लिए बुनियादी वस्तुओं की हमेशा किल्लत बनी रही।
उत्तर कोरिया: उत्तर कोरिया 'जुचे' नामक एक आत्मनिर्भर समाजवादी विचारधारा का पालन करता है। परिणामतः, यह देश दुनिया की सबसे बंद अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, जहां लोग अक्सर अकाल और बिजली की भारी कमी का सामना करते हैं, जबकि इसका पड़ोसी दक्षिण कोरिया दुनिया की महाशक्ति बन चुका है।
क्यूबा: यहां शिक्षा और स्वास्थ्य ने अच्छे परिणाम दिए लेकिन आर्थिक रूप से यह देश दशकों तक स्थिर रहा। सरकारी नियंत्रण और निजी व्यापार पर पाबंदियों के कारण वहां लोगों को सामान्य जरूरतों के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है।
पूर्वी जर्मनी जिसका बाद में पश्चिमी जर्मनी में विलय कर दिया गया था। इसका कारण आर्थिक स्वतंत्रता की कमी और लोगों के आने-जाने पर पाबंदी के कारण लोगों में भारी असंतोष होने लगा।
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सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव
- आर्थिक विफलताओं को छिपाने के लिए अक्सर सरकारें जनता की आवाज दबाने लगती हैं, जिससे लोकतंत्र खत्म हो जाता है।
- जब योग्य लोगों को उनकी मेहनत का फल नहीं मिलता तो वे देश छोड़कर चले जाते हैं जिसे ब्रेन ड्रेन कहा जाता है। वेनेजुएला से हाल के वर्षों में लाखों लोग पलायन कर चुके हैं।
- समाजवाद का वादा 'मुफ्त' सुविधाओं का होता है लेकिन अंत में अस्पतालों में दवाइयां और दुकानों में राशन तक खत्म हो जाता है।
उन देशों का क्या जिन्होंने अपनी नीति बदली?
कुछ देशों ने समाजवादी संकट को भांपते हुए समय पर 'बाजार सुधार' अपनाए और बच गए। जैसे-
चीन: 1970 के दशक तक चीन की हालत बहुत खराब थी (माओ की नीतियों के कारण) लेकिन फिर उन्होंने अपनी अर्थव्यवस्था को पूरी दुनिया के लिए खोला और आज वे दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हैं।
भारत (1991 से पहले): भारत में भी 'लाइसेंस राज' और समाजवादी झुकाव के कारण आर्थिक विकास की गति बहुत धीमी थी। 1991 के आर्थिक सुधारों (LPG) ने भारत को बड़े संकट से बाहर निकाला।
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